भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे

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रचनाकार -'अमानत' लखनवी

                                                                                                                                                 भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे कहते हैं
मस्ती में नहीं ग़ाफ़िल हुश्यार इसे कहते हैं

गेसू इसे कहते हैं रुख़सार इसे कहते हैं
सुम्बुल इसे कहते हैं गुल-ज़ार इसे कहते हैं

इक रिश्ता-ए-उल्फ़त में गर्दन है हज़ारों की
तस्बीह इसे कहते हैं ज़ुन्नार इसे कहते हैं

महशर का किया वादा याँ शक्ल न दिखलाई
इक़रार इसे कहते हैं इंकार इसे कहते हैं

टकराता हूँ सर अपना क्या क्या दर-ए-जानाँ से
जुम्बिश भी नहीं करती दीवार इसे कहते हैं

दिल ने शब-ए-फ़ुर्क़त में क्या साथ दिया मेरा
मोनिस इसे कहते हैं ग़म-ख़्वार इसे कहते हैं

ख़ामोश 'अमानत' है कुछ उफ़ भी नहीं करता
क्या क्या नहीं ऐ प्यारे अग़्यार इसे कहते हैं