दोहराय है। हेकरा कही छै बाल मनोविज्ञान के खाँटी पकड़ । आरो देखों कि आयकाल के बच्चा के हमरा सिनि नञ मातृभाषा सिखाय छियै, नत्र हिंदी, खुश होय छियै कि बच्चा मम्मी आरो पापा बोलै छै । मालगुजारी - कर नञ बुझी के बच्चा टैक्स बुझे छै। कैन्हों इशारा करी देले छै ! आरो एक बड़ों बात, कि जहाँ कुछ एन्हों बात आबी जाय छै जेकरा पर विज्ञान के हामी नञ हुअ पारें, तें डॉक्टर अमरेंद्र जी बड़ी सावधानी से हौ विषय पर जोर नञ दै कें कही है कि पुराणों ने यह कही है। आरो तेरह नही तें हुनी भौतिक गिनाय दै छै, मतर सात समुंदर के आत्मिक, मानसिक व्याख्या करी के सोच-समझ के महत् पर जोर दै छै । हमरा साहित्य के गूढ़ बात समझें में नञ आवै छै, मतर दिमाग लड़ाय के जे बाल-मन आदमी में जिनगी भर रही है, वै मनों के खुल्ला छोड़लियै आरो होकरा जे लागलै, से यहाँ लिखी लेलियै । मतर है कहै में हमरा जरियो टा हिचक नञ छै, कि है उपन्यास पढ़ला के बाद हमरे भीतर के बच्चा के इच्छा जागी गेलों छै, कि डॉ. अमरेन्द्र जी के है उपन्यास तें बेरी-बेरी पढ़बे करियै, बच्चा बास्तें हिनकों लिखल सब ठो किताब पढ़िए के बड़ों हुआ। आरो जिनका हाथों में है उपन्यास, 'सात समुंदर - तेरह नद्दी' जैतै, हुनखौ ऐन्हें लागतें । है हम्में लिखी के धरी रैल्हों छियै । अब भी अस्वस्थ हूँ । पर डॉ. अमरेंद्र जी लिखित अद्भुत बाल- उपन्यास पढ़ते और समझते १२ घण्टों की रेलयात्रा कर पटना आ गया हूँ। बात खत्म करने के बाद ही अस्वस्थता महसूस हुई है, पर थोड़े आराम से वह भी दूर हो जाएगी । - अरुण कुमार पासवान २३ अगस्त, २०२२ (दिल्ली) सात समुन्दर - तेरह नही ७७
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