तें वैं हरिण के पीछा करवों छोड़ी के, राजकुमारियो के अपनों घोड़ा पर बिठैलकै आरो वहाँ से निकली गेलै । तीन दिनों सें फले पर जीवी रहलों राजा मुकाबलो तें ने करें पारै छेलै - कमजोरे एते नी होय गेलों छेलै ।" “ त की होलै ?" दुक्खी के स्वर एकदम दबी गेलों छेलै । "मतुर राजकुमारी छेलै चतुर । " देवदूत के ई बात सुनहैं, दुक्खी के चेहरा फेनू कुछ अच्छा हो के उम्मीद करी, चमकी गेलों छेलै, तें पुछलकै, “तबें की होलै ?" “ऊ राजा जेन्हैं राजकुमारी के लैके आपनों देस ऐलै, राजकुमारी कहलकै, कि ऊ इखनी शिव-पार्वती के छमाही व्रत पर है । यै बीचों में कोय ओकरा से न मिलें, राजाहौ नै । ओकरों वास्तें अलग महल रहें, ओकरों पाँच कोठरी सब प्रकार के अन्न से भरलों-पुरलों रहें ।” देवदूतें चुटकी बजैतें आगू कहलें छेलै, “राजकुमारी पावी के राजा एन्हें खुश छेलै कि वैं जे-जे कहलकै, तुरंत पूरा करतें गेले । राजकुमारी नया महल में अकेले रहें लागली आरो रोज भोरे-शाम दासी सिनी से छत पर अन्न सब बिखरवाय दै ।" "से कैन्हें ?" " ताकि द्वीप - द्वीप से चिड़ियाँ वहाँ अन्न खाय लें आवें पारें । राजकुमारी के विश्वास छेलै- ऊ चिड़ियाँ सिनी में कोय-न- कोय दिन हीरामन होते । " " ते ऐलै ?" दुक्खी के बेसब्री के कोय ठिकानों नै छेलै । " तुरत ते नै ऐलै, केना ऐतियै- ऊ तें अपनों आन्हरों राजा के देखभाल करें में लगलों रहै ।" "तें की राजा अन्हरों होय गेलों छेलै, ऊ कना ?" "ई तें कोय नै जानै पारलकै, कि है होलै केना । कहानी तें यहाँ छै कि जंगल के कोय गाछ के पत्ता आँखी से छुआय गेलै, आरो देख-देख राजा के आँखी के रौशनी खतम होय गेलै । " " त की होलै ?" ६८ सात समुन्दर - तेरह नद्दी
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