आरो एतना बोलना छेलै कि देवदूत तेज पछिया हवा नाँखी उत्तर दिस बढ़ी गेलै । दुक्खी के कानों में कुछ होने सरसराहट बुझेलै, जेना गुड्डी एकबारगिये ओकरों कानों से सट्टी के उड़लो रहे ।
कुछुवे देरी में देवदूत पर्वत के एक चोटी पर उतरलों छेलै आरो चोटी पर उतरना छेलै कि चारो दिस रौशनी फैली गेलै । दुक्खी के मन होलै कि काका सें पूछी के एक दाफी चोटी के हिन्ने हुन्ने चक्कर मारी आवौं, मतर ओकरों मॉन तें सात सागर के जाने लें बेकल होय रहल छेलै, से नीचें उतर आरो चोटी के चौरस पथलों पर बैठन्हें पुछलकै, “तें, तोहें सात सागर के बारे में बतावैवाला छेलो, काका ।"
“ बताय छियौं, बताय छियौं, मतुर बतावै के पहिले हमरों सवाल के जवाब दौ कि तोहें दूध पीयै छौ की नै ?"
“घरों में दू-दू देशला गाय छै, केना नै पीवै ?”
" ठीक छै, तबें तें दहियो खैथैं होभौ ?"
तखनी प्रश्न के उत्तर नै दै के दुक्खीं भीतरे - भीतर हँसलों छेलै।
“ आबे पहिले यही बतावों कि तोहें भीतरे - भीतर मुसकी कैन्हें रहलों छों ?" देवदूतें कहलकै ।
“एक ठो कविता याद करी के, जे हम्मे रोजे अपनी गाय के सुनावै छियै । "
" गाय के सुनावै छौ ! हौ कोन कविता छेकै ? पहिलें तोहें ही कविता सुनाया, तबें बाकी सब सवाल-जवाब ।”
देवदूत से ई बात सुनना छेलै कि दुक्खीं बोलले, “तें ठीक है, मतर बीचों में टोकियो - टाकियो नै, सरपट सुनैभौं” आरो वैं घोकलों कविता कहवों शुरू करी देलकै :
हमरों माय, गाय माय
कहना है तोहरा कुछ आय
की होते तोरा सें छिपाय, हम्में छियै तीन भाय