"तें, तिब्बतो में ई ब्रह्मपुत्रे कहावै छै ? तोहें तें बोलै छौ कि गंगा आन-आन जग्घों में आन-आन नामों से बहै छै ।"
"तोहें ठिक्के सवाल करलौ । ब्रह्मपुत्रो के साथ वही बात है, तिब्बत में ई सांगपो नदी कहावै छै, जब भारत के अरुणाचल में आवै छै, तँ यही नद्दी दिहांग नदी कहावै छै, जब कि आसाम में आवी के ब्रह्मपुत्र आरो बंगला देश में जैहैं यही नदी जमुना नदी कहावें लागै छै । हों, यहू नदी पद्मा कहावैवाली गंगा है में जाय के जरूरे मिली जाय है।"
" तें एकरों मतलब होलै कि सब नही एक दूसरा सें मिली के बहुत दूर-दूर तांय बहतें रहै छै ।”
"तहीं सें तें नदी सिनी बचल होलों है, जों कोय नदी दोसरों नदी से कटी जाय छै, तें ऊ धीरे-धीरे खतम होय जाय छै, आकि मरनद्दी बनी के रही जाय छै ।"
“हों, ई बात एक दिन बाबुओ लाल काका के समझाय रहलों छेलै ।"
“हुन्ने हो देखों, हौ नदी, वहू यहाँकरों नामी नदी छेकै “सुवनसिरी नदी ।" बाते -बात में देवदूत कुछु आरो ऊपर उठी गेलों छेलै ।
"की यहू नदी तिब्बते से निकलै छै ?"
" एकदम ठीक अनुमान लगैलौ, तोहें । यहू तिब्बते से निकलै । ई तिब्बत में हिमालय के उत्तर से निकली अरुणाचल होतें आसाम आवै छै, आरो यहू नदी फेनू ब्रह्मपुत्र में ही मिली जाय जैतै । हौ, वहाँ देखो, केन्हों एकरों धार ब्रह्मपुत्र में मिली रहलों छै, हौ जिला लखीमपुर कहावै छै - जहाँ ई दोनो नद्दी मिलै छै ।"
“वाऽऽऽह ! केन्हों सुन्दर दृश्य है !” आय चित्रशाला वाला रज्जु काका होतियै, तें धाँय-धाय सौ फोटो खिचवाय लेतियै । जानै छौ काका, हुनको हेनों फोटो खिचवैय्या इलाका भरी में नै छै । मोटों-मोटों कहानियो लिखे छै हुनी । ई देखतियै, तें कहानियो यै पर लिखी