“ओऽऽऽ, अच्छा ।” दुक्खीं बड़ी मासूमियत से कहलें छेलै ।
“ आरो ई जानी ला, ई कभियो बरसै नै छै, हुम-घुमड़े भले "तें, जे बरसै छै, ऊ कौन मेघ होय छै ?"
"ऊ वर्षामेघ कहावै छै; ऊ तें एकरो से ऊपर में रहै छै - सात हजार फीटों से ऊपरे । यानी लगभग सवा कोस सें कुछ ऊपर । गज के हिसाबों से समझों तें दू हजार तीन सौ तैंतीस गज के करीब होते ।"
“बाप रे, बाप, की बोलै छौ, काका !" अचरज से दुक्खी " हों, आरो एकरौ से ऊपर एक मेघ आरो होय छै, जे बीस सें तीस हजार फीट ऊपर यानी पौने तीन कोस ऊपर बूझों आरो गज के हिसाब से दस हजार गज ऊपरे रहै छै, ओकरा वैज्ञानिक पक्षाभ यानी आँ वाला मेघ बोलै छै । यहा मेघ जमी के ओला बनी-बनी के बादल संग बरसतें रहै छै ।"
"ओऽऽऽ, तें ओतें ऊपर नै जाना है । ओला, माथा पर तें ढेपे हेनों खट-खट लागै छै ।
" नै, ओतें दूर जाना है छै कथी लें। आबें तें हम्मे आरो कुछ नीचें उतरी रहलों छियै ।” आरो ई कही के देवदूत एकबार गिये सरसराय के नीचे उतरले, तें दुक्खी के सौंसे बदन गुदगुदी से भरी उठलै ।
“दुक्खी बाबू, तोरा कुछ सुनाय पड़ी रहलों छौं ?” देवदूत एक क्षण हवाहै के बीच रुकर्ते बोललै, “हों, जना कोय हौले-हौले ढोलक बजैते रहै आरो बुझावै छै; जेना जनानी सिनी कुछ-कुछ गावियो रहलों है ।"
“एकदम ठीक । बैशाख के महीना चली रहल छै नी । फसल कटाई के उपलक्ष में आसाम के वनवासी सिनी धारी बनाय - बनाय के नाची - गावी रहल छै, ढोलकी बजाय रहलों है । बसंत के ई उत्सव के