"इस्स, है नै बोलों । हम्मू ढेरे नाम जानै छियै, बतैय्यौं ?"
" हों - हों, बतावों ।”
" रेहु, कतला, गरय, झिंगा, पोठिया, गैंची, आरो, आरो, आरो" वैं अपनों दिमागों पर जोर देतें जोर से बोलले, “अरियाठीईई ।” “वाह ! तोहें तें ढेरे नाम जानै छौ, मतर कोशी नदी में तें एकरौ से बेसी मछली रहें तैरै छै !"
" एकरौ से बेसी” दुक्खी के आँख फैली के रही गेले आरो बोलले, “की तोहें ऊ सिनी के नाम जानै छौ ? हमरा बतावें पारौ ?”
" कैन्हें नी ! कहीं तें कविता के रूपों में बतैय्यौं । ऊ नामों के एक ककहरा हम्मे बनैले छियै । बीचों-बीचों में कैएक अक्षर के नाम नै ऐतै, कैन्हें कि ऊ नामों के मछरी हमरा अब तांय नै मिललै ।
"कोय बात नै छै ।"
“तें सुनों :
अ सें अरिया - अन्हाई - दू
क सें कतला, कवई, काँटी
कुमरी, कोटरा, कोशिया, कुरा - नामी सात ।
ख से खगरी, खर्रा, खेसरा,
खुदी, खरीका - नामी पाँच ।
ग से गैंची, गोहली, गरहन,
गोही, गंगजली - ई पाँच
घसें घाली घ में नामी
च से चेंगा, चंदा, चेचरा - तीन
ज से जोगना; जे रं एक
ट से टेंगटा, टेगरा - दू
त सें तिलुआ, तिलची, तुरिया - तीन
द से दुरही, देसरी - दू
ध से धानी, धुनका - दू
न से नेंगरा, निरकों-दू