“माय यहू बोलै छै कि कोशी से एक राकस बीहा करै लें चाहे छेलै।"
“हों, यहू कथा छै। कहै छै, रानू नाम के एक बलशाली राकस कोशिये किनारा में रहै छेलै । जब कोशी हिन्ने हुन् घुमी फिरी रहलों छेलै, तें ऊ राकस के नजर वैं पर पड़ी गलै । पड़ी गेले, तें कहलकै- तोरा हमरा से बीहा करे लें पड़थौं । भला ऊ राकस के बात के उठैतियै, से कोशी 'हौं' करी देलकै, मतुर एकटा शर्तों राखलकै कि जो राते भर में वैं ओकरों दोनों किनारी के बांधों से बांधी देते, तभिये कोशी ओकरा से बीहा करतै । "
“ त ?” दुक्खी के उत्सुकता हठासिये एतना बढ़ी गेलै कि कुछ आरो नै बोले पारलै ।
“तबें ? तबें तें राकस कोशी के दोनों किनारी के, पचास मन के कुदाल लै के, बाँधना शुरू करलकै । लागे लगतै कि आध रात नै पुरतै कि दोनों किनारी ओरी से लैके आखरी तांय बन्हाय जैतै । बेकल होली कोशी देवता के पास पहुँचली आरो सब टा कथा सुनैलकी ।"
"तबे ?"
“तबे ? तबे देवता के कुछ तें करनाहै छेलै, से ब्रह्माजीं आधे रात में मुर्गा नांखी जोर-जोर के चार-पाँच दाफी बांग लगाय देलकै । राकस रानू सोचलकै - आय, भोर होय गेलै, से बाँध बान्हवों छोड़ी देलकै । हौ तें भोरे ओकरा पता चललै कि देवतां ओकरों साथ छल करलें छै । मतर तबें ऊ करै की पारतियै ? बाजी तें हारी चुकलों छेलै ।"
देवदूत से खिस्सा सुनी के दुक्खी के लगलै जना कोय ओकरा गुदगुदी लगाय दे रहें । ऊ खिलखिलाय के हँसी पड़लै । बोलले, "ठीक होलै"
" एक बात जानै छौ, दुक्खी बाबू, ई कोशी नदी में हेनों कोन मछली छेकै, जे नै मिलै छै । ओतें नाम तें शायत कोय जानतौ नै होते ।"