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Page:Saat Samundar Terah Naddi (Dr. Amrendra).pdf/29

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सेर के एक मौन - जों एक टन में होलै पच्चीस मॉन, तेंदू टन के पचास मन । तबें ढाई मॉन के कतें होलै ? बारह, तेरह मॉन आरो जोड़ी दौ ।"

"तवें तें ई बड़ी खतरनाक होते होते ?"

"होवे करै छै" ई कही के देवदूत दस बाँस नीचें उतरी गेलों छेलै, "देखे नै छौ, नाँकी के ऊपर आगू उठलों सींग । है पाँच फूट सें कम नै हो । तोहें तें यही सोचतें होभौ कि ई सींग हड्डी के बनलो हो । से नै, ई जमलों बाल के सींग छेकै - बड्डी मजबूत होय छै-सीधे शिकार के पेट में घुसाय के उलटी दै छै । मतर एतें बरिया रहला के बादो ई शुद्ध शाकाहारी जीव छेकै ।"

" जर्बे एतें बरियों ताकतवाला जीव छेकै, तें खर-पतवार में केकरों डरों से नुकैले होलों है ?"

“कीड़ा के डरों से ।” देवदूत हँसते हुऍ बोललै ।

“ बूबू-डरों सें ?" दुक्खियों के हँसी आवी गेलै ।

" हों, बूबू-डरों सें । है जे एकरों पेटों पर चमड़ा देखै छौ, छै तें बड़ी मोटों आरो मजबूत पर ई कै तहों सें बनलों छै । ठीक सें देखौ ! हम्में जरा आरो नीचें होय जाय छियौं ।” ई कही देवदूत एक बारिये पाँच बाँस नीचें होय गेलै ।

दुक्खीं आँख गड़ाय के देखलकै आरो बोली पड़लै, “ठिक्के कहै छौ, काका, एकरों चमड़ा तें तहैलों लगै छै ।"

“ आरो जानै छौ, ई तह एकरों वास्तें काले छै । एक-एक तह में सैकड़ो बूबू घुसी के एकरा परेशान करते रहै छै आरो यही लें ई कीड़ा सिनी से बचैलें दलदल में घुसलों रहे है । अरना भैंसो यही लें कादो- दलदल में घुसलों रहै छै, दोनो के दुख एक्के रं।" ई कहते-कहतें वैं अपनों पंख के फैलैलकै आरो सुर सना बीस बाँस ऊपर-ऊपर होय के आगू दिस बढ़ें लगलै ।

दुक्खी कुछ पुछवे करतियै कि देवदूत पहिले पूछी बैठलै, " जानै छौ, ई कोन जग्वों छेकै ?"