उपन्यास छै- भदवा चन्दर - ओकरा पढ़ियों । वैमें जे भैंसा बैलगाड़ी पर झपटै छै, ऊ अरना जातिये के छेकै, तबें गाँव में रही गेला के कारणें ई जंगली अरना रं नै रही गेला छै, तहियो छेकै तें अरनाहै जाति के संतान । है जे इखनी दलदल में लेटलों छौं, राति बुलै-चरै लें निकलै छै । देखै छौ, केन्हों हाथ भरी के पुछड़ी हिलाय - हिलाय के हमरा सिनी दिस देखी रहल छै-लाल-लाल आँख से, मतर डरियो नै, ऊ हमरा से कोस भरी नीचें जंगल में छै ।"
“अच्छा काका, तोहें बोलली कि गेंडा हमरों प्रदेश में छेलै-की अभियो ऊ मिलै छै ?"
“दुक्खी, तोहें, गैंडा के कभियो देखलें छौं ?"
" नै, किताबों में देखले छियै ।"
"तें, कोय बात नै, हम्में तोरा गैंडा देखावै छियौं, खाली है पाँचवों नदी पार करना है ।" आरो ई कही के देवदूत तेज पुरवा हवा नांखी हें लगलै ।
दुक्खी कभियो सरंग देखै, कभियो जंगल, कभियो पहाड़, कभियो नाग साँप नाँखी सरसरैर्ते नद्दी के, तें कभियो नगाड़ा साथें तुरही बजैंतें पहाड़ के ऊपरे - ऊपरे बुलतें मेघ सिनी के । वैं बादल के सीधे नीचे उतरतें देखलकै, तें ओकरों नजर नीचे हैं होतें चललों गेलै । आ ओकरों नजर बादल से हटी कॅ, बड़ी वेग से बही रहलो नही किनारी के मरद - मरद भरी ऊँचों खर-पतवार के बीचों में हाथी रं दलदल में धँसलों जानवर पर पड़लै, तें ऊ देवदूत दिस बिना देखले बोलें लगलै, “देवदूत काका, हौ देखौ, खर-पतवार में मटमैलों रं की बूली रहल छै- बिना सूँढ़वाला हाथी छेकै । "
देवदूतो बिना नजर नीचें करल्है मुस्कैर्ते बोलले, “हौ, बिना सूँढ़वाला हाथी नै छेकै, गेंडा छैकै जेकरा तोहें गेंड़ा कहै छौ । नद्दी आरो दलदलीय जमीन पर रहैवाला जीव । है जे हाथी हेनों दिखाय रहलों छै, जाने छौ ई दू टन से लैके अढ़ाय टन के हुऍ पारें । मोटा-मोटी समझों कि पचास मन भारी । एक टन में एक हजार सेर बुझों आरो चालीस