काका ?"
“जंगली भैंसा। जंगली भैंसा है के अरना कहै छै । दुक्खी बाबू, तों श्यामसुन्दर घोष के एक लम्बा कविता के बारे में नै जानतें होभी, तें जानी लें - ओकरों नाम 'अरण्यायन' छेकै ?"
"ई अरण्यायन माने की होलै ?"
“ अरण्यायन - मेंदू शब्द छै-अरण्य आरो अयन । अरण्य माने होलै जंगल - वॉन आरो अयन माने घोर - तें जंगल के घोर तें नहिये नी हुऍ पारें, घोर तें आदमी के होय छै, तें अरण्यायन के माने होलै - जंगल रों प्रदेश आरो अरना यहा अरण्य से निकललों शब्द छेकै । है जे तोरों अंग प्रदेश छौं, ई कभियो घनघोर जंगल से भरलों छेलै - गंगा के दक्खिनी भाग जंगलतरी कहावै आरो गंगा के उत्तरी भाग - बीजू वन, मानें विजन वन, मतलब कि जे जंगल में आदमिये नै रहें आरो दोनो वॉन मिली के खाको वन कहावै छेलै-खाको वन, बुझलौ ?”
"नै ।"
“खाको वन मानें - खूब घनघोर जंगल । ई जंगल में विशाल-विशाल हाथिये नै, घोड़ो भी रहै, आरो है जे अरना देखी रहलों छौ नी - ई तें जंगलतरी के निवासिये छेलै । देखै छौ, केन्हों हाथिये रं मस्त चाल छै । जो ई झुंड में होतियै, तें लगतियै, छोटों-छोटी पहाड़ मिली के हिलतें -डुलते रहें । बड़ी बरियो जानवर होय छै । ठिक्के बोलली - टुन्नी राकसिन के बेटा, ओकरौ से बेसी बरियो - खूंखार | शिकारी के देखी लें, तें बिना मारलें छोड़ें नै, मरलो पर नै छोड़े-घंटो शिकारी के खूरों से रौंदतें रहै छै ।"
"तें, हुन्ने नै जइयों, काका ।” दुक्खी सहमतें बोललै । " अरे ऊ ऊपर थोड़े आवें पारतै । नीचें होतियै तें नी । देखे छौं, एकरों माथों पर बाल आरो ठेहुनों पर होने बाल के गुच्छों - यही तें एकरों खास पहचान छेकै ।
"तोहें जब बड़ों होय जैवौ, तें सुरेन्द्र प्रसाद यादव के एक ठो