बढ़ाय देलकै आरोऊ धरती के कुछ आरो ऊपर उठी गेलै ।
मतर दुक्खी - मोंन तें बस बोचों में ही उलझलों छेलै । सोचें लगले छेलै, कि फेनु से बोचों के नहीं सिनी में नै बसैलों जावें पारे ? कैन्हें नी बसैलों जावें पारें । जबें अपनों गंगा में सोंस बचावै वास्तें सब लगलों छै, तें बोचों वास्तें कैन्हें नी सब लगतै । सोंस के बारे में केन्हों- केन्हों बात ऊ दिन गुरु जी इस्कूली में बताय रहलों छेलै । ई सोंसो तें घड़ियाले के कोय जात छेकै- वैं मने - मन ई सब सोचलकै ।
हौ तें ओकरों ध्यानो नै टुटतियै, जो ओकरों नगीच से ऊ कौआ उड़ी के फेनु अपनों दिस लौटी नै जैतियै ।
“ की होलै दुक्खी लाल ?” देवदूतें बिना मुँह घुमैले पुछलें छेलै, तें ऊ बोलले, “कौआ छेलै, मतर ई कौआ यहाँ केना आवी गेलै, काका ?"
"अरे, ई घरे से पिछुवैलों आवी रहल छेलै । आदमी के बस्ती नै पावी के लौटी गेलों होते ।”
“मतर ऊ तें एकदम कारो कौआ छेलै । एक दाफी ऐंगना में हेने कौआ आवी गेलों छेलै, तें मांय बोललों छेलै, 'भगाव, भगाव ! डोमकौआ छेको, केकरो में लोल दै देलकौ, तें फेकैलें पड़तौ ।' काका, मांय हेनों कैन्हें बोललों छेलै ?"
“पता नै, के हेनों पहिलो दाफी बोली देले छेलै आरो तभिये सें ई नाम लोगों में प्रचलित है । तोहें देखले होभौ, भले एकरों रंग करिया मजीठ रहें, मतुर वै रंग में केन्हों चमक छै, ओकरों लुग तें सफेदो माँत होय जाय ।"
" ठीक बोललौ, सादा कौआ में आकारों में बड़ों, लोलो बड़ों, ई तें गिद्ध के बच्चे रं लगै छै, रंग भले कारों रहें ।”
"ठिक्के कहलौ तोहें, यही से गिद्धे सिनी के बीच ई बेसी देखलों जाय छै, वही बीचों में ई करियल मौज-मस्ती उड़ावै छै, यही लें गाँव-घरों में नहिये के बराबर दिखावै छै । एक बात जाने छौं, जेकरा लोगें कागा बोलै छै, दरअसल असली कागा तें यहा छेकै । एक युग