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Page:Saat Samundar Terah Naddi (Dr. Amrendra).pdf/23

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कुछवे नै हुऐ है । की बुझलौ ? पुरनका लोग भूलों से एक्के रं रूप-रंग के कारणें घड़ियालो के बोचे कहै ।"

“बुझी गेलियै । की एकरों छातियो दिस हेने काँटों निकललों रहै छै, जेन्हों पीठी पर छै ?"

" नै, पेटो दिस तें एकरों चमड़ा सपाट रहै छै; कुछ-कुछ पीरों रंग लेलें आरो उजरों छाती - पीठ । कभियो अंग प्रदेश के गंगा में ई खूब मिलै छेलै । मतर एकरों यहा मोटो खाल के कारण एकरों एन्हें शिकार हो कि एकरों वंशे खतम होय गेलै । आबें यही से यहाँ नद्दी में शायते पैलों जाय छै ।"

देवदूतें एक दाफी फेनू दुक्खी के देखलकै, जेकरों मुँह हठासिये मनझमान पड़ी गेलों छेलै । तें, ओकरा ई समझे में देरो नै लगलै कि दुक्खी के मुँह मलीन कैन्हें पड़ी गेलों छै; कहलकै, "तोहें घड़ियाली लोर बहाय के बात जरूरे सुनले होभौ - केकरौ - न- केकरौ सें ?” देवदूत नॅ ओकरों ध्यान आपनों दिस करै वास्तें ही फेनु से कहले छेलै, “सुनले छौ की नै ?"

“हों एक दाफी लेमनचुस लें कानी रहलों छेलियै, तें बाबूं कहले छेलै - घड़ियाली लोर नै नी बहावें । "

"तें, एकरों माने तोहें बुझलें छेलौ ?

“एकरों माने तें यही नी होलौ कि लोर के मोटों-मोटो बूंद गिरैवों ।” दुक्खीं देवदूत दिस देखतें कहलकै, तें ओकरा ई उत्तर पर एक दाफी फेनु हँसी आवी गेलों छेलै आरो हँस-हँस कहलें छेलै, “नै दुक्खी लाल, एकरों माने ते आरो कुछ होय छै । एक बात तोहें जाने छौ कि घड़ियाल के आँखी पर तीन पलक रहै छै । सबसें ऊपरलका सुक्खा पॉल के तर करै वास्तें घड़ियाल के आँखी सें रसें - रसें पानी रिस्तें रहै छै, यही से लागै छै कि घड़ियाल चौबीसो घंटा कान है रहै छै, तें घड़ियाली लोर के मतलब होलै - दिखावटी कानवों ।”

देवदूत के बात सुनी के दुक्खियों के हँसी आवी गेलै । ओकरों मन बहलवों भर के देर छेलै कि देवदूतें अपनों पंख के गति