उठले, “देवदूत काका, हो देखों दरियाई घोड़ा वहाँ छै ?"
"नै दुक्खी लाल, ई दरियाई घोड़ा नै छेकै, ई तें घड़ियाल छेकै, जेकरा तोरा सिनी बोचों कहै छै ।"
"ओऽऽऽ, अच्छा ! तें, यहा बोचों छेकै ?"
“हों यहा बोचों छेकै । तोरा जरूरे माय नें बिहुला के कहानी सुनैलें होथौं कि जर्बे नाव पर बैठली बिहुला बोचासैनी घाट पहुँचलों छेलै, तें ढेरे बोचों ऊ नाव के घेरी लेलें छेलै ।” देवदूतें एक दाफी ओकरों दिस देखी के अपनों गति एकदम कम करी देलें छेलै ।
“मतर देवदूत काका, कुछ लोग बोलै छै कि जे बिहुला माय के नाव रोकले छेलै, ऊ बोचे जातिये के कोय दूसरों राकस रहै ।"
"तोरो कहै के मतलब मगरमच्छ से छै की ?"
“हों, यहा कहै छेलै जोतिष बाबा । हुनक मोताबिक, घड़ियाल अपनों देस के चानन, कोशी, गंगा में हुऍ नै पारें, घड़ियाल माने उज्जैन के नदी में पैलों जायवाला जलचर । उजानी उज्जैन के ही छोटों नाम छेकै, यही सें हुनी बिहुला के उज्जैन के ही मानै छेलै ।”
"तोरों जोतिष काका अनुमान से हेनों सब बोलै छौं । बोचों मीट्ठों पानी के बीच जीयैवाला जलजीव छेकै आरो ई आदमी वास्तें खतरनाको नै हुऐ छै । यही से ओतें - ओतें बोचें बिहुला के नाव घेरी लेलकै, मतर कहाँ कुछ करलकै? मगरमच्छ होतियै, तें नाव उलटाय के हानियो पहुँचावें पारे छेलै । मतर हेनों नै हो । कभियो तोरों अंगप्रदेश के नद्दी में ई घड़ियालो कम नै पैलों जाय छेलै ।”
"देखो-देखों, देवदूत काका, बोचों के हाथी रं सूँढ़ो छै आरो सूँढ़ों पर गेंद नाँखी की हिलियो रहलों छै ।"
दुक्खी के बात सुनी के देवदूत के हँस्सी आवी गेलै, आरो हँसते-हँसतें ही कहलकै, “अरे, नै नै । ऊ सूँढ़ नै छेकै । मगरमच्छ आरो बोचों में यहा तें अंतर होय छै, ई घड़ियाल के थूथन छेकै, एकदम लम्बा- हाथ, दू हाथ लंबा आरो थूथन पर जे गेंद नाँखी देखें छौ, ऊ गेंद नै, ऊ माँस रों बड़ों पिंड छेकै । मगरमच्छ के दोनों मे