आवी गेलों है । तें, ओकरा समझ में आवी गेलै कि दुक्खी के नींद आवी गेलों छै ।
ऊ हौले से उठले आरो दुक्खी - बाबू के गमछा अलगनी सें उतारी के ओकरों ऊपर, कंधा से लैक ऐड़िया तांय, फैलाय देलकै । एक दाफी ओकरा लगलै; जेना दुक्खी के ठोर कँपकँपैतें रहें, कुछ बोलते रहें, मतर ऊ बातों पर बिना कोय विशेष ध्यान देलें ऊ ऐंगना दिस निकली ऐलै, ई सोची के कि बच्चा सिनी के साठी माय हेने के हंसते-खेलते रहै छै ।
मतर ओकरा की मालूम छेलै कि दुक्खी सपना में ठिक्के केकरो से बात करी रहलों छेलै । पाक शिराजी के बात सुनते-सुनते ओकरों मॉन होय गेलों छेलै - आकाशों में उड़े के । सरंगों से धरती केन्हों लगते होते - दुक्खीं मनेमन सोचले छेलै आरो नीने में वैं देखलें छेलै कि ऊ दौड़ी के हौ संदूक के नगीच जावें लगलों छेलै - कलें - कले कि धरतियो के ओकरों गोड़ों के आवाज के पता नै लागें ।
ऊ अभी संदूक नगीच पहुँचलो नै छै कि देखलकै, संदूक के मुँह अपने आप खुलें लगलों छै आरो ओकरा से गुल्लक बाहर निकली ऐलों छै। गुल्लक के बाहर निकलहैं संदूक कलें - कलें बंद होय गेलों छेलै ।
दुक्खीं ई सब कुछ देखलें छेलै, मतर डरलों नै छेलै, जरो टा नै; जेना ओकरा ई सब बात होय के पहले से आभास रहें । अभी ऊ गुल्लक में कुछ बोलतियै कि वैं देखलकै - गुल्लक के मुँह बित्ता भर फैली गेलॉ छै, आरो ओकरा से आँखी के सुख दैवाला रौशनी फूटें लगलों छै जे सौंसे कोठरी में देख हैं- देखत्हैं फैली गेलै ।