एक दाफी माय के देखलें छेलै, तें माय फेनु से कहानी के आगू बढ़ाय देलकै, “जब बहेलियां हीरामन के देखलकै, तें डरों से दोनो जीव काँपी गेलै कि राजा सोचते, चोराय के वैं सुग्गा लै आनले छियै, से बहेलियां झट सना सुग्गा लैके चंपापुर आवी गेलै आरो राजा लुग पहुँची के सब बात सुनावैवाला ही छेलै कि सुगवां अपन्हें सें सब बात सुनाय देलकै । सब बात सुनी के राजा फेनु बहेलिया के ढेर सिनी धोन दैके विदा करलकै ।
“जबें रात होय गेलै, तें हीरामनें राजा से कहलकै, 'हे राजा, जेन्हों तोरों सोभाव छौं, होने सोभाव सात समुन्दर - तेरह नद्दी के पार वाली ऊ राजकुमारियो के छै। तोरों तें बीहा वही कुँआरी रानी सें होतियौं, तें अच्छा । ओकरों नाँखी सुन्दर ई दुनियाँ में मुश्किले सें मिलें पारें । पता नै, कोन व्रत पालै में ऊ रानी अभियो तांय कुमारी है ।
“जबें राजा सुग्गा से ई बात सुनलकै, तें पुछलकै - सात समुन्दर - तेरह नही पार ऊ कौन देश छेकै ? तें, सुग्गां ऊ देश के नाम बताय देलकै । देश के नाम जानी के राजा वहाँ तांय जाय के रस्ता पुछलकै, तें हीरामन सुग्गां कहलकै कि वहाँ तांय खाली पाक शीराजे घोड़ा पहुँचावें पारें आरो वैं यहू बतैलकै कि राजा के घुड़शाला है में एकठो ऊ घोड़ा है ।
" सुग्गा के बतैला पर राजा के घोड़शाला के एक ठो कोना में पड़लों मरियल र पाक शीराज घोड़ा के छों महीना तांय खिलैलों -पिलैलों गेलै, तबें पाँख ओकरों दोनो पुट्ठों से निकली ऐलै आरो वही घोड़ा पर राजा बैठी के सात समुन्दर, तेरह नही पार करै लें उड़ी चललै । हीरामन सुग्गा ओकरों आगू- आगू उड़लों जाय रहलों छेलै ।
"पाक शीराज उड़लों जाय रहल छेलै । राजा ओकरों पीठी पर बैठले- बैठले देखलकै - नीचें कतें - कतें नदी बही रहलों छै, ऊँच्चों-ऊँच्चों पहाड़ खाको जंगल से भरलों छै; ताड़ गाछ एतें बड़ों-बड़ों; जेना हाथी सूँढ़ उठाय - उठाय के राजा के प्रणाम करी रहल छै ।" कि तखनिये दुक्खीमाय के लगलै - दुक्खी के बायां हाथ ससरी के कमर से नीचें