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Page:Saat Samundar Terah Naddi (Dr. Amrendra).pdf/16

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एकटा लड्डुओ ऊपरी सें, से ओकरों मन अलगे से खिललों दिखाय छेलै - नै तें शिवरात्रि के नाम सुनहैं ओकरों रोइयाँ - रोइयाँ भुटकी आवै छै।

बाप रे बाप, एक तें अन्हरिया रात, ओकरा पर, देहों में करिया रंग पोतलें नंग-धडंग - सन गामों के लोग, कोय शंख फूकै छै, तें कोय सिंघी, कोय झाल पीटी रहल छै, तें कोय हथेलिये पर हथेली पीटी रहल छै - सब के चेहरा भूतों से भयंकर - दुक्खी मनेमन सोचै छै आरो माय लुग घुसकी आवै छै । बोलै छै कुछुवे नै, मतर दुक्खी - माय सब कुछ बुझी जाय छै, तें पूजा-पाठ के काम छोड़ी के सीधे पुरवारी घरों में ओकरा लैकें आवी जाय है । तोशक आरो चादर के झाड़े छै, फेनु अँचरा से दुक्खी के तरवा पोछी के बिछौना पर लेटा दै छै । लेटाय भर के देर छेलै कि आपन्हौं ओकरे बगले में कुहुनिया बल्लों झुकी गेलै, दोनों गोड़ के पासी के बाहर रखतें ।

दुक्खी जत्तें जल्दी सुती जाय, ओतें अच्छा - सें वैं अपनों दायाँ तरहत्थी ओकरों कपारों पर, आरो बीचों-बीचों में आँखियो पर फेरते खिस्सा कहें लगलै, “ऊ दिन बहेलिया जंगल तें गेलै, मतर एक्को टा चिड़िया ओकरों लसौटा में ने ऐलै ।"

"ई लसौटा की होलै, माय ?" दुक्खीं आँख ऊपर करी के पुछलकै।

“लसौटा, बाँसों के जाल बूझों ।"

" ओऽऽऽ । तबें ?" आँख झुकैतें कहलकै ।

"हारी - पारी जबें वैं अपनों जाल समेटी घर लौटे के बात सोचलकै तें देखै छै, ओकरों जालों में एकटा बित्ता भरी के छोटों रं सुग्गा फँसों होलों है । वैं आय तक हेनों सुग्गा नै देखले छेलै, से खुश होय के ओकरा घर ले आनलकै । जब बहेलियां के कनियैनी ऊ सुग्गा के देखलकै, तें कहलकै - ' एकरा उड़ाय दौ, हम्में तें एकरा दानाहौ-पानी नै दिएँ पारवै, घरों के हेने हाल छै । जंगल में रहतै, तें केन्हों के पोसैये जैतै ।' जबें सुग्गां, ऊ जनानी के ई बात सुनैलकै, तें