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Page:Rishyaskhsring (Dr. Amrendra).pdf/9

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की गंगा की तरह उतर रही थीं।

इस काव्य - रूपक को यूं तो मैंने सन् 2019 ई. के अप्रैल के मध्य में ही कर लिया था, जिसको रचना भी, इसी वर्ष की वसंत पंचमी यानी 29 जनवरी को शुरू किया था। पंचम अंक के आखरी कुछ छंदों को 19 अप्रैल की रात में लिखा था।

दोबारा देख जाने में आलस्य, दो-चार डायरियों में काव्य के बिखरे होने के कारण उन्हें संगति देने की दिक्कत, फिर भाव-विचार को पकड़ने में लिखावट की अस्पष्टता, वह भी कहीं-कहीं नहीं, पग-पग पर देखता, तो मन यही होता, बाद में कभी देख लूँगा, और समय निकलता ही गया। यह तो मध्य मार्च 2020 ई. को नमस्कार कि देश भर के साथ मेरे भी बंदी होने की अवधि T शुरू हुई और 'ऋष्यशृंग' काव्य-रूपक की मुक्ति के दिन आए । सब कुछ व्यवस्थित किया, जो समझ में नहीं आया, उसे हटा दिया, कुछ जोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं था, यह समय चाहता और मैं समय देने को तैयार नहीं हूँ, क्योंकि समय ही ऐसा है। बस एक ही इच्छा प्रबल है कि इसे अपने से मुक्त कर लोक को समर्पित कर दूँ।

परसों पाँच अगस्त है, राम की जन्मभूमि पर शिलान्यास का दिन । यह मात्र कोई संयोग है, या अचेतन मन की ही कोई इच्छा, कि अपने इस काव्य को जोड़-घटाव के किसी संभावित वनवास से मुक्त कर रहा हूँ । पांडुलिपि प्रकाशक को आज ही सौंप दूंगा, ताकि लोक को यह प्राप्त हो सके, श्रृंखलाबद्ध बंदी के बावजूद ।

सम्पर्क : लाल खां दरगाह लेन, सराय, भागलपुर, बिहार- ८१२००२ मो. ६६३६४५१३२३, ८३४०६५०६७६ - अमरेन्द्र रक्षाबंधन, ०३ अगस्त २०२०ई.