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Page:Rishyaskhsring (Dr. Amrendra).pdf/8

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आत्मकथन

काव्य-सृजन काल में क्या कवि सचमुच ऋषि की भूमि पर होता है? क्या उस समय काल अपने समस्त प्रसार को समेटकर कवि के सम्मुख विन्दु रूप में उपस्थित हो जाता है, जिससे कि वह काल के अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ देख सके, फिर वह जो लिखे, वह किसी काल विशेष के लिए नहीं, वह सब समय के लिए दिखे, काल का कोई भी खंड हो, वह उसमें अपनी प्रतिच्छाया देख सके ? अगर यह सच भी है, तो कवि का ऋषि-पद पर होना कुछ काल विशेष के लिए ही संभव है, बस सृजन - काल तक ही । कवि का ऋषिव स्थाई हो भी कैसे सकता है, जैसे कि वह हमेशा कवि भी नहीं बना रह सकता। बस इतना कहा जा सकता है कि प्रज्ञा की एक विशेष अवस्था में रचित वह कृति, किसी विशेष सिकुड़े काल-खंड को नहीं, बल्कि काल के विस्तार को आभाषित करती रहती है। मैंनें जब ऋष्यश्रृंग काव्य-रूपक रचने की बात सोची थी, तब उसका विस्तार एक डेग भर का था, यानी अंग प्रदेश के ऋष्यश्रृंग को, अंग की कामवालाओं द्वारा चंपा तक ले आना और इस तरह दुर्भिक्ष का दूर हो जाना, लेकिन काव्य के जैसे ही कुछ छंद उतरे, तो इसने विस्तार लेना शुरू किया। दशरथ की चिंता, उनका अंग प्रदेश आना, अवध के दशरथ के लिए ऋष्यशृंग का पुत्रेष्टि यज्ञ, शांता का सहयोग, अंग-अवध की संस्कृति और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष को देखने की लघु लालसा, बहुत कुछ उतरते चले गये, पर सब कुछ इस तरह कि अदेखे स्रोत महानदी से मिलते जा रहे हों, और मैं विवश-सा उन बातों को समेटने में लगा रहा, जो चंपा में सावन