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Page:Rishyaskhsring (Dr. Amrendra).pdf/11

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अनंगिनी प्रथम अंक (लताओं - पुष्पों, चित्रों से सुसज्जित एक कुटीर, जिसके बाहर अलग-अलग गढ़े शिला-खंडों पर आभूषणों-वस्त्रों में सजी नर्तकियाँ संवादरत हैं) ठहरो, तन-मन-प्राण बाँध लूँ, तब आगे फिर कहना, कैसे तुम पहुँची उस गिरि पर निर्भय बनी अकेली; मुझको तो विश्वास अभी भी होता नहीं सहेली, बिना नृत्य - गायन के तरी पर आगे बढ़ते रहना ! हँसना भी तो अधरों में ही; जैसे, कुसुम-हँसी हो, कहने में; पल्लव हिलने ही भर का दृश्य अनोखा; वेणुवनों में मलयानिल के चलने का हो धोखा ; लगता होगा; साँस कहीं ग्रीवा में दबी- फँसी हो ! रतिसेना जो कुछ तुमने कहा, सही है; क्या कुछ इसमें शक है, निर्भयता भय के हाथों में अब भी ज्यों बंधक है। रह-रह सिहर उठै प्राणों तक अब भी याद उसे कर, भीषण लहरें बहा रही हों; जैसे, बोहित जर्जर ! वह तो साथ रही रतिमाता निगरानी में पलपल, बाँहों में भर लिया तुरत ही, उठी कहीं जो हलचल; ऋष्यशृंग 11