द्रग्शम्तकभ:१२
सूर सुषा प्याली उभय। बरी चंद में लाय।
ताहि पान हित असुर शठ। तामें बैठे आय॥४२॥
त्रिपुर रूप विविकुँड के। प्रभा कटोरी ऐन।
किषो जंत्र जग मोहने। के प्यारो के नेन॥४३॥
तेरे नेनन की तुला। तोल्यो मन अरु प्रान।
स्वास समीरहु के लगे। रहतजु एक समान॥४४॥
हरि सत विषि रज ईश तस। इक इक गुन आधार।
प्यारी तो द्रग गुनति हूँ। क्यों न करे भब पार॥४५॥
मोन केत के मीन तें। सरस प्रिया के नेन।
बात बात सब करत यें। दे दे सुंदर सेन॥४६॥
झख चख बिन पग चलत चल। पें दूग की सम नाहिं
उनको नर मारत रहे। ये नर हने स चाहि॥४७॥
इक इक रंग के मीन बहु। द्रग त्रे रंग रंगीन।
ये मारे अरु जिबाइ ले। वे इन गुनन विहीन॥४८॥
झख जल में जल चखन में। वे जल चपल दिखाय।
ये बिन जल चंचल रहे। ये गुन सरस सुहाय॥४९॥
रिस मुद मेल अमेल की। कहँ कमलन तें सेन।
ये गुन गन अनगिन भरे। प्यारी तेरे नेन॥५०॥
रतिहूतें अद्रभुत लखे। प्यारी तेरे नेन।
छेरषि सोपी उलटि कें। हरि धरि पूजत मौंन॥५१॥
ललची हँसि ता शोक मय। रिसी उछाहो पीन।
डरी संकुचित चकित सम। चितवनि नव रस लीन॥५२॥
रात मुदें दिन में खुले। यां तें कमल बने न।
निस दिन प्रफुलित रहत है। प्याररि तेरे नौन॥५३॥
प्यारी तेरे द्रगन में। बसत मंत्र ये चार।
आकषरन सु उचाटिबो। मोहन, मारन, त्यार॥५४॥
चंचलाइ तो द्रगन की। लखि लखि स्वंजन मीन।
सीखत पें आवत नहिं। होत मलीन रु दीन॥५५॥
मीत दरस के समय की। द्रग चपलाई जु आय।
सो लखि मीन मलीन के। डूबे जल में जाय॥५६॥
लखि तिय चख की चपलई। स्वंजन गये खिस्याय।
चिंता चिनगिनतें जरे। कारे परे लजाय॥५७॥