बात निकलबे करतै ।" कहते-कहतें चौधरी काका विषहरी - थान दिश बढ़ी गेलो छेलै ।
पचरासी तें वहीं पर बक्खों नाँखी खाड़े रही गेला छेलै - ढेर देरी लें । ई सब बातों पर जेना विश्वास होय्यो के ओकरा विश्वास नै होय रहल छेलै
भीखनपुर के प्राइमरी इस्कूल सजी-धजी के बड़का घरकुण्डा रं सुन्दर दिखावें लागलों छेलै । आम पल्लों के, नारियल रस्सी से गूंथी- गूंथी के, माला नांखी बनैला गेलै, जेकरा है इस्कूली छत के बीच में खड़ा सीक आरो बीस गज के दायरा में आवैवाला गाछ, मकान सें हेनों बांधलो गेलौ छेलै, जेना सीधा तनलों आधों छतरी रहें । बाहर - बाहर जहाँ रस्सी के छोर खतम हुऐ, वहाँ-वहाँ गेंदा फूलों के माला लटकैलो गेलो छेलै ।
छतरी के भीतर दू सौ से ज्यादा प्लास्टिक वाला लाल-लाल कुर्सी दू भागों में राखला गेलों छेलै-तीन हाथों के बीचे बीच खाली जग्घों छोड़ी कें, कि बड़ों- बड़का लोगों के आबे-जाब में कोय दिक्कत नै हुऍ । इस्कूली के बरण्डा सें लागलों पाया वाया तें कुछुवे नै छेलै, से वहीं पर लम्बा रं तीन टेबुल जोड़ी के रखलों गेलै आरो वैं पर बगुला के उजरों पंख नाँखी बगबग एकसलगा चादर हेनों बिछैलों गेलै कि तीन टेबुल जोड़ी के एक करलो गेलों के पत्तो नै चलें । टेबुल के बीचों-बीचों में काँचों के गुलदस्ता में हजारा गेंदा आरो पत्ता सहित गुलाबो गोलियाय के राखलों । वही टेबुल पीछू पांच ठो काठ वाला कुर्सी । कृष्णमोहन घोष बाबू के यहां से मंगेला गेला छेलै । बीचों में सिंहासननुमा एक काठों के कुर्सियो छेलै, जे कनक लाल चौधरी के यहाँ से मंगवैला गेलो छेलै, जेकरा चौधरी जी आपने लेली खास करी के बनवैले रहे । आय वही कुर्सी शिक्षा मंत्री वास्तें ऐलै ।
बरण्डा के नीचें दायां दिश वाला कुर्सी सिनी के सबसे आगू वाला