डलिया देखी वैं आचरज सें पूछलकै।
" अरे बण्टू कहां छै ?" चौधरी का के उतावलापन के कोय सीमा
“ऊ तें बगीचा में सुखलों लकड़ी, काठी, पत्ता जौरों करी रहलो होते । देखे नै छौ, कुहासों की रं राती घिरी आवै छै । लागै छै सबटा लगलों आलू पौधा के झुलसा रोग मारी जैतै । तरसुऐ नी ऊ यहाँ ऐलों छै, आरो वही दिनों से, हमरों मना करलहौ पर बगीचा भागी जाय छै, झाड़पात जमा करै लें। तब एक बात होय जाय छै कि जखनी बण्टा खेतों के बीचों-बीचों में खॉर-पात राती जराय दै छै, तें कुहासों खेतों पर कम्मे गिरै छै । मनाहो करला पर मानै छै, जोरी सें बाल्टी- बाल्टी पानी लै आनै छै, फसलों पर छीटी देलको आरो खोर - पतारों पर ताकि देर रात तांय ऊ धुऐंतें रहें । देखो, ई ठहारों में ऊ बहियार गेलों होला छै, तबें गांती बांधी देले छियै आरो आपनों कम्बलो दे देले छियै ।" कहते-कहतें पचरासी के बोली झमान होय गेलों छेलै, मजकि तखनिये कुछ हुलासों सें बोली उठले, "मतरकि जे कहो दादा, सालो भर ते नै होला हो है बण्टा के भिट्टी गेली, आरो वहाँ से ऐलों छै, ते पच्चीस साल के इलिम लै के ऐलॉ छै ।"
" अरे यहें इलिम लें तें सरकारें ओकरा पुरस्कृत करी रहलो छै पहलें है मिठाय घरों में रखी के आवों । यै में कुछ तें बण्टा के संगी-साथियों में बांटी दियौ ।”
पचरासी के है सब बहुत कुच्छू समझै में नै ऐलै । वैं अभी तांय ई खबर के जानलो नै छेलै । कोय कहवो नै करले छेलै, जानतियै कहाँ सें । ऊ आपने में रैला - हेरैला हेना बुझेलै । जब चौधरी कां फेनू घरों में मिठाय धरी आय के कहलकै तें पचरासी तखनी बिना कुछ पूछले मिठाय घरों में राखी ऐलै आरो तुरते बाहर निकली ऐलै, एक कुर्सियो लै ऐलो छेलै ।
“आबों, बैठों दादा ।" कुर्सी दुआरी के बाहर रखतें पचरासी कहले छेलै ।
"अरे नै, नै, एकरों कोय जरूरत नै छै ।" चौधरी कां हाथों सें इनकार करतें कहले छेलै आरो बाकी बात अखबार पढ़ी के सुनैले छेलै ।