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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/78

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रित ज्ञान । एक कॉन भरोसों । छुच्छे कठदलीली ।" ई कहतें कहतें इकबाल हँसी पड़लै । आरो कुछ देर की सोच हैं रही गेलै ।

भैरो कापरी तें पुराणवाला कथा है से जें चुप छेलै, तें चुप्पे छेलै । खाली दोस्त इकबाल के वहें बात के गुनी रहलो छेलै ।

“भैरू, दू रोजों सें एक टा बात गमतें हो ।" इकबालें मेरो के कान्हा पर हाथ धरी टोकलकै, तें जेना ऊ अनचोके नीनों सें जागी उठलों रहें आरो बोलले, "की ?"

"यह कि बंटू भोरे भोर कांही निकली जैतै होती ।"

"हों, ई दस रोजों सें देखी रहल छियै, मजकि ओकरा सें पूछलें नै छिये।

“पूछे के जरूरतो नै छै । रमखेली के जाने हैं, जे बंटू के गहरा दोस्त छेकै ?"

"हों, जानै छियै, ई ते ओकरों साथे लागले रहे है ।"

"यहू जाने हैं कि रमखेलिया केकरों बेटा छेकै ?"

“केकरों ?"

""भगवत्ता मोची के । आय पाँच रोजों सें भगवत्ता बीमार छै । बस सोचें कि मरले दाखिल छै । कोय देखबैय्या नै । रमखेलिया के मैय्यो तें नहिये छै । बस वहॅ रमखेलिया; चैं पानी पिलैतै, कि असपताली सें दवाय माँगी के लानतै । वहू में भगवत्ता हेनों आदमी के कौनें सुने छै ।. ... जानै छें भैरू, आयकल बण्टू आपनों आठ-नो साथी ले लैक भगवत्ता के ही सेवा में लागलों रहै छै ।

“आबें तें भगवत्ता भागवत होय गेलों छै । बीमारी से पहिलें जेहनों छेलै, ओकरों से बढ़िया । बुलबे - चालबे ने करै छै, कामो पर जावें लागलों छै ।....

हौ देखें, हौ देखें ।" हठाते इकबालें भैरू कापरी के दक्खिन दिश हाथों से देखतें बोलले, "ई सब दोस्तों के लैक, बण्टू भगवत मोची के टोले में निकल्लों छै । सुनै में यहू मिलल छै कि यै सिनी मिली के हौ टोला में बच्चा सब के जौरों करी, एकआध घंटा ओना मासी धंग भी पढ़ावै छै ।"

तखनिये तांय भैरो कापरी के चुप्पे देखी के इकबालें ओकरों दिश देखतें कहलकै, "तोहें कुछ सोचें तें नै लाग भैरु, अरे बण्टू के