" इकबाल भाय, आरो सब बात तें ठीक । बण्टू आपनों उमिर से बीस गुणा ज्यादा जानै छै । ओकरा कृषि कॉलेज के प्रोफेसरो सिनी है माने छै कि मत पूछों । मतरकि आयकल ऊ असकल्ले बीस बिघिया आम बगीचा दिश भागी जाय छै । कभी-कभी दिन भरी वहीं रही गेलों । है एकदम ठीक नै। आखिर छेकै तें बच्चे नी ।"
"अरे, रात भरी तें वॉन, बगीचा, बहियार में नहिये नी रहतै होते भैरो । रहे लॅ दें । वैं आयतक जत्तें भी जानले छै, वहीं वन, बगीचा, नदी, बहियार, पोखरी, सरंग सें । हमरा सिनी सें वैं इकन्नी भरी सीखै छै आरो पन्द्रह आना वही सिनी सें, समाज सें, समाज के रीति-रिवाज, व्यवहार सें । तोहें चिन्ता नै करलो करें ।" इकबालें भैरो के आपने खटिया पर बैठे के इशारा करतें कहलकै ।
आरो जब भैरो कापरी खटिया पर बैठी गेले, तें इकबालें फेनू कहना शुरु करलकै, “भैरो कापरी पुराण के कथा छेकै, तहूं जानतें हो कि की रं एक बालक शिक्षा पाबै खातिर एक ऋषि लुग पहुँचले, ते ऋषि ओकरा एक गाय देतें कहलकै कि, 'जॉन दिन ई गाय से सौ गाय हो जावं, वहीं दिन तोहें ऐयों आरो हम्में तोरा आपनों चटिया बनाय लेबौं ।' ऋषि के शर्त ऊ लड़का मानी लेलकै आरो जंगल दिश चली देलकै । जंगल में ओकरा कै साल तें बीती गेलै आरो जब एक गाय सें सौ गाय होय गेले, तें सब गाय के ले के ऊ लड़का वहें ऋषि लुग ऐलै । सौ गाय देखी के ऋषि कहलकै, 'ठीक छै, आय सें तोहें यहाँ रही के शिक्षा पावें सकै छ । आय से हम्में तोरा शिक्षा देभौं । यै पर जाने छें, वैं लड़का की कहलकै ? कहलकै 'हम्में आपनें के ऋणी छियै गुरुदेव, आपनें तें हमरा शिक्षा दे चुकलों छियै ।' जानै छें, ई बातों पर वैं ऋषि आचरज सें पूछलकै 'सें केना ?' तबें वैं लड़का कहलकै, 'जंगल में एते साल रहे के क्रम में वैं पशु, पक्षी, नदी, हवा- बतास, आकाश, तारा, चांद-सुरुज सबके गतिविधि के ढेर - ढेर बात जानी लेलें छै । कोन ऋतु में की की बदलै छै, कॉन-कॉन फल-फूल उगै छै, कॉन-कॉन पशु-पक्षी के जनम होय छै, केन्हों हवा केना चलै छै कोन बादल की किसिम के होय छै । सब । के केना बोलै छै, ओकरों की मानै छै, यहू सब । आखिर आपन्हों तें वहे