बड़ो बात छेलै कि बण्टा के बुद्धिये कारण सबभे मार आरो सजा से बची गेल छेलै । मजकि भूत आरो जिनवाला बात नै तें अंजुम, शेखर, रामखेली, मीरका, बिहारी, शेखावत के मनों सें गेले, नै तें घोल्टू, सोराजी, अठोंगर आरो बमबम के । असल में ई बात वही क्लासों के एक कोना सें उड़लो छेलै आरो क्लास भरी के माथा पर हठाते बैठी गेलै । मतरकि बोलै कोय कुछुवो नै ।
आखिर बोलतियै की ? बण्टा के हाव-भाव कुछ हेनों छेवे नै करलै । मजकि शेखावत है केन्हों के मान लें तैयार नै छेलै के बण्टा के वश में जिन्न आकि भूत नै छै, वैं कहै, “देखें रमखेलिया, जेकरों वशों में भूत आकि जिन्न हुऍ छै, ऊ भूत - जिन्न नाँखी थोड़े दिखावै छै, आकि कुछ काम करै छै; काम तें करै छै जिन्न, भूत । देखलें नै, बण्टा ऊ दिन केना सब बुझौव्वल के मानें फटाफट बताय देलकै आरो पाँच रोज पहिले ओतें - ओतें फलों के नाम केना बताय देलकै । अरे जिन आवी के ओकरों कानों में बोलला गेला होतै, आरो बण्टा तहीं सें ओतें - ओतें नाम बोलें पारलै ।"
" अच्छा है बात, हम्में ओकरा पूछयै ।” रमखेलिया गंभीर होतें बोललै ।
“पुछबो नै करियै, कहीं जिन, भूत के हमरा सिनी के पीछू लगाय देलको, तें बुझी ले ।”
दोनों चुप भै गेलै ।
मतरकि फलवाला घटना सें बण्टा के आदर लड़का सिनी के बीच आरो बढ़ी गेला छेलै । आबें वैं आपनों मंडली के दसे लड़का के की, कलासों के कोय्यो विद्यार्थी के कुछुवो बोली दे, तें वैं बण्टा के बात के नकारै नै, ऊ जेना हुऍ करी दै, नहियो मॉन रहै, तहियो ।
शुरु-शुरु में तें बण्टो के हठाते ई बढ़लो आवभगत के कुछ मानी नै बुझेले, मतरकि धीरें - धीरें एकरों भेद खुले लागले, जब एक दिन अंजुमें ओकरा से कहलकै, “किलासों के कुछ लड़का ई मानै छै कि बण्टा के वशों में जिन आकि भूत छै, जेकरा सें वै जखनी चाहै छै, पूछी के उत्तर बताय दै छै, ने ते ओतें - ओतें बुझौव्वल आरो फलों के नाम केना बताय देलकै ।"
बटा बड़ी मनों से अंजुम के बात सुनलकै आरो फेनू बोलले, "ई