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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/63

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जो बण्टा ऊ सवालों के उत्तर नै जाने आरो कहै कि हम्मे नै जाने छी, ते पुछवैय्या के कम्मे विश्वास हुऐ कि वैं नै जाने छै । सोचे, इखनी नै बताय ले नै चाहै छै, दुसरों दिन बताय देतै । आरो ठिक्के में बण्टा ऊ सवालों के जवाब दूसरों दिन जरूरे बताय दै । हुऐ है कि, जब ऊ घर लौटे, तें रात में खाय वक्ती मौसा में हौ सिनी सवाल के उत्तर पूछे, जे इस्कूली में ओकरों दोस्तें पूछले छेलै ।

यहू नै हुऐ कि इस्कूल जैतैं, सीधे उत्तर बताय दे । हौ लड़का के दू-तीन दाफी पूछले पर बताबै- कुछ हेनों भाव सें कि ई सवाल के उत्तर तें पहिलें सें वैं जानै छेलै, मजकि कल मूड नै छेलै, ये लेली नै बतैलकै । एकरा सें बण्टा के ज्ञान के धाक भले इस्कूली में जमें लागलों छेलै, मजकि ओकरा हौ सब के उत्तर जान लें मेहनतो खूब करे लें पड़े । खेल-कूद से धीरे-धीरें ओकरों साथ छूटें लागलों छेलै ।

हौ दिन इस्कूल से लौटला पर वैं बड़ी हुलासों सें पहिलें मौसी के फेनू सँझकी मौसाही के ऊ किताब दिखैनें छेलै आरो वहें दिन किताब के कत्ते नी पन्ना पीछुवे दिश सें पढ़ी गेलों छेलै ।

पढ़ते-पढ़तें ऊ सहसा चौंकी उठलै । किताब के लेन्हैं ऊ बस्ता दिश दौड़लै आरो कॉपी के बीच में राखलों वहें अखबार के टुकड़ा पर अंगुरी बढ़ाय - बढ़ाय के मनेमन पढ़लकै ।

ओकरों चेहरा पर आचरज के भाव उड़ी रहलो छेलै । वैं कभियो कॉपी के बीच पन्ना के पढ़े, कभियो गांधी जी के आत्मकथा के । फेनू की होलै कि हो पोथी के बीचों में राखलों अखबार के टुकड़ा के 'गांधी जी के आत्मकथा' वाला किताबों के बीचों में हिफाजतों सें राखी देलकै आरो किताब बन्द करी ताखा पर होने के राखी देलकै ।

वैं माय के देखतें ऐलों छेलै - रामायन के हेन्हें सहेजी ताखा पर राखतें ।