होय के वैं जंगल से कहवों शुरु करलकै,
जंगल मेघ के छाया दें
खड़ा हुवै लें पाया दें ।
बण्टा देखलकै कि ओकरों बात सुनी के सबमे गाछ एक्के साथ बोली उठलों छै,
कहाँ सें देबौ छाया कॅ
खड़ा हुवै लें पाया के
जंगल तें सब कढ़ी गेलौ
करखाना में बँटी गेलौं
गाछ लगाबें पहिलें जो
सब लोगों सें कहले जो ।
गाछ- बिरिछ के बात सुनी के बण्टा वहाँ सें तुरत आपन गाम दिश चली देलके । रास्ता में कबूतर, मैना, बगरो सब आपस में बतियावे लागलै,
बुतरु चललै गामे- गाम
गाछ लगैनें ठामें- ठाम
सपना में बण्टा यहू देखलकै कि ओकरों साथें आरो ढेरे बुतरु गामे गाम गाछ लगैबों करी रहलों छै । गाँव-गाँव गाछ - बिरिछ से सुहावन हुऍ लागलै छै । जंगल देखी के बादल घुमड़ें लागलों छै । नदियो खल -खल करी के बहें लागलों है । बण्टा सार्थे सब्भे बच्चा-बुतरु उछली- उछली के गीत गेलें जाय है,
बुतरु जेन्हें जुटी गेलै
धरती वन सें पटी गेलै
जंगल-जंगल घूमी कॅ
ऐलै बादल झूमी के
आरो नदी बहलै सब
सुख - दुख सहलै सब ।
पता नै, कखनी तांय सपना में बण्टा खुशी मनैतें रहलै । कॉन - कॉन जंगल के बीच दौड़ लगैतें रहलै आरो नै जानौं, कोन कोन नद्दी के खलखल धारा देखी ऐलै ।