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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/48

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तें गंगा में जे हजारो - हजार मॉन रोज जहर कल-कारखाना उगली रहलॉ छै, ओकरा सें मछली मरते की बचतै ? गंगा तें जहर बनी रहलों छै । आरो जे मछली बचलों छै, वहू में जहरे बूझों। मछली के ते वंशे जना खतम होय गेलौं, ई फैक्टरी - कारखाना के कारण । आपना यहाँ तें नै, कहै छै अकेले उत्तर प्रदेश मं गंगा के किनारी - किनारी डेढ हजार कल-कारखाना छै, जेकरों जहरीला पानी आरो कूड़ा-कचरा गंगा में जैतें रहे है । रहें पारतै भला गंगा आरो रहें पारते मछली जीत्तों ? फेनू पानियो तें एकदम घटलों जाय रहल छै । कभियो मौसी - मौसा साथें गंगा जैभौ, तें देखभौ कि गंगा केन्हों नाला नाँखी बहें लागलों छै ।"

"गंगा कन्ने छै ?"

“हुन्नें ।" माँछों का उत्तर दिश हाथ करतें कहलकै । एक समय ई गंगा एते चौड़ा छेलै आरो वैमें एते पानी रहे छेलै कि गर्मियो दिनों में जहाज डूबी जाय, तें पता नै लागें ।”

"तें आबे की होलै ?"

" गंगा में पानिये नै आबै छै ।"

" गंगा में पानी कहाँ सें आबै छै काका ?"

"हिमालय पहाड़ों सें ।"

"हिमालय पहाड़ में की बड़का पोखर छै ?"

" नै हो, नै" माँछो का खिलखिलैतें बोलले, "तोहें बरफ वाला इस्क्रीम खाय छौ नी । बस हिमालय में वहें बरफ के खान छै । कोस भरी के नै; हजारो हजार कोस के । वही बरफ पिघली- पिघली के गंगा में आबै छै, तें गंगा बहै छै । सुनै छियै कि हिमालय परकों वहू बरफ खतम होय रहल छै "

" कैन्हें, ऊ सब बरफ कोय राकस आरनी जरूरे खाय जैतै होते?" बड़ी चिन्तित होतें बण्टा पूछलकै ।

"राकस तें की कहबौ, तब राकसे बूझों । सब मिली के जंगल काटलें जाय छै । पहिलकों जमलों बरफ गली के बहलों जाय छै, आरो जमबों रुकी गेल छै । तहिया पहाड़ गाछी सें भरलों छेले, तें पहाड़ ठण्डैला रहे छेलै । ठण्डैला रहे छेलै, तें मेघ उड़ी उड़ी के आवै आरो जमी के बरफ बनी जाय, तें समय पर पिघलबो करै । आबें तें गाछे नै छै,