पारें । मतरकि जो कहीं काटी लें । बाप रे बाप, कतें बड़ों-बड़ों गलफरों छै । केकरो केकरो मूँछों कत्ते बड़ों । आँख केन्हों काँचों के गुल्ली रं चमकै छै ।"
बटा के मनों में किसिम-किसिम के भाव उठतें रहै छै; माँछो का जब तांय दुआरी पर बनलो रहै छै ।
"माँछों का जरा दस मिनिट बैठियों । हुनी तुनुक मिसिर जी के मछली के नेतों दै ले गेलों छौं ।” रुपसावाली ऐंगने से बोललै । "कोय बात नै छै बेटी, बैठले छियै ।"
मौसी के बात सुनी के बण्टा निचिन्त होय गेलै । सोचलकै, "होय गेलै, आधा घण्टा से पहिलें आवै वाला नै छै मौसा ।” ऊ बाहीं पर पालथी मारी के बैठी रहलै । ओकरा एकरो होश नै रहलै कि धरती पर बेठी रहल छै तें पैंटों में धुरदा लागतै । ऊ तें हेन्है के बैठतें ऐलों छै । उठलों तें दोनों हाथ पीछू करी पैटों के झाड़ी लेलकों । बस होय गेलै । जेना ऊ साबुन में साफ करी लेलें रहें पैंटों के ।
" अरे नूनू पैंट धुरियाय जैतौ ।” माँछो काका कहलकै ।
“छोड़ो नी काका । पहलें हमरा ई बतावों कि है एते बड़ों मछली मिलै छौं कहाँ ?"
"गंगा में मिलै छै आरो कहाँ ?'
" गंगा में मिलै छै एतें बड़ों-बड़ों ! ई ते लागै छै जेना समुद्री मछली छेकै ।" बण्टा एक दाफी अंगुली बढ़ाय के छुवै के कोशिश करलकै, मतरकि ई सोची कि उछली नै जाय, हाथ खींची लेलकै । "तोहें, बोलले तें एकदम ठीक बेटा, हिलसा समुद्रे वाला मछली छेकै ।"
"तें गंगा में केना आबी जाय छै ?"
" अण्डा दै लें । हिलसा मछली के अण्डा दै लें मीठा पानी चाही । समुद्र के पानी तें खारों होय छै, यै लेली समुद्रों सें चली कॅ, नै खाली ई यहाँ तक आवी जाय छै, इलाहाबाद के गंगो तांय पहुँची जाय छै ।"
"मतरकि है मछली हमरों घर में तें कभियो नै ऐलै ?"
“ऐतै कहाँ सें बेटा । आबे ई मिलै कहाँ छै । कभी काल फँसी