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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/44

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“सुनों, तोहें कुछ समझै - बुझे ते छौ नै, खाली फेंकड़ा पढ़े छौ ।

अंग्रेजी पहाड़ ने छेकै, मूसों छेकै । मूसों, जे आदमी के पहाड़ हेनों दिमाग के भीतरे - भीतर कुतरी के हिलाय दै छै । समझलौ । निहाल करी रहलॉ छौं नी बिलटू ।” थोड़ों मूं ऐंठतें भैरो कापरी बोलले, "अंग्रेजी इस्कूल में पढ़वाँ बेटा कॅ । अंग्रेजी के आठ टा शब्द घोकै में आठ दिन लगावै छौं | तोहें समझे लें कैन्हें नी चाहै छौ कि बच्चा आपने माय-मौसी लुग रहै छै, परों घरों में ने आरो आपने माय बच्चा के ठीक से पालै-पोसै छै, परों घरों के जॉर-जनानी दू पैसा दिऍ पारें, बच्चा के गू-मूत नै देखें पारें आरो नै एकरों खयाल कि बच्चा खेलकै कि नै, नीन ऐलै कि नै ? के लकड़सुग्घा लकड़ी सुंघाय देलें छौं कि बेटा के पढ़ेवों तें अंग्रेजी पढ़वों, बहिन-बेटा के पढ़ेवों तें अंग्रेजी पढ़ेवों । तोरों बस चलौं तें हमरों नाम तोहें अंग्रजी इस्कूली में लिखाय दौ । हम्में नौकरी करे ले चललियौं । तोर्है सिनी तै-तमन्ना करी लें कि बण्टा कहाँ पड़थौं । बाबू बनौं कि लाट साहब ।”

आरो जखनी साँझे लौटले, तें फेनू घरों के पंचायत बैठलै, जैसें बण्टा, बिलटा दोनों गायब छेलै । भैरो पूछलकै “बण्टू ने दिखावै छै ।" " हिन्नें - हुन्नें कन्हौं बिल्टू साथें खेलतें होतै ।"

"तें, की ते भेलै ?

" तय की होतै । बण्टू साफ बोलै छै कि हम्में इस्कूल नै जैबै, नै सरकारी, नै अंग्रेजी । घरे में पढ़बै । आबे तोंही बताबों, ओकरा घरों में के पढ़ते । मानी लें कि ऊ इस्कूल नहिये जाय छै, ओकरों लें घरे में गुरु जी राखियो दै छियै । तें, गुरु जी दिन भरी ते नहिये नी पढ़ते । बिहनकी ऐते आकि सँझकी, घण्टा भरी रहतै आरो चल्लों जैतै । हुन्नें दस बजते-बजतें बिल्टू इस्कूल चल्लों जाय छै, बेचारा ई असकल्ले रही जैतै । भला असक्कलों एकरों मॉन की लागतै । सबसे बड़ों चिंता तें यहें बातों के छेकै ।"

" तोरा चिन्ता करै के कोय जरूरत नै छै । हम्में नौकरी पर जेबै तें आपनों साथ लै लैबै । कॉलेजों में बड़का ठो मैदान छै । गाछ -बिरिछ छै, किसिम-किसिम के चिड़िया, मधुमक्खी के घोर, किसिम-किसिम के फूल, पत्ती । आपने मॉन लागलों रहतै । फेनू हम्में तें रहबे करबै । जबे