"बिज्जी के बात सें कुम्हारों के बेटा डरी गेलै आरो सब्भे टा बात बताय देलकै कि बाबू आपनों धोन या तें चाक के नीचें गाड़ी के राखै छै आकि फेनू जाँतो चक्की के नीचें । सबटा बात सुनी के बिज्जीं कहलकै, 'सुन, जों तोहें केकरौ ई बात बतैलैं कि तोहें ई बात हमरा बतैलें छें, तें तोरा हम्में काटी लेवौ, आरो तोहें मरी जैबे ।
"वही दिन से बिज्जी ई मौका में रहें लागलै कि केना सबटा धन निकाललों जाय । निकालियो लेते, तें लै जैतै केना, यहू सब सोचै । आखिर वैं उपाय निकालिये लेलकै । कुम्हारों के एक गधैया छेलै, जे एक टांग से लंगड़ी छेलै । कुम्हारें ओकरा खैय्यो ले नै दै । जे मिलै वही खाय लै । एक राती बिज्जी जाँतों से दूर हटी के आपनों नाखून सें माँटी खोदना शुरु करलकै आरो जाँतो लुग पहुँची गेलै । देखे छै कि हीरा, मोती, पन्ना, लाल, एक बोरिया में भरलों छै । वैनें केन्हों खींची कॅ निकालले आरो गधैया के बोरा खोली सबटा हीरा, मोती खिलाय देलकै । ठीक वहें रं चाक के नीचहौ सें हीरा, मोती निकाली निकाली गधैया के खिलाय देलकै ।
"आबें ठीक वहें दिन, जे दिन राजकुमार सिनी के लौटे के बात छेलै, बिज्जी कुम्हारों के पास ऐलै आरो कहें लागले कि एते दिन तोरा कन हम्में काम करलियौं, आबें हम्में आपनों देश जाय लें चाहै छी । ओतें दूर पैदल केना जेवों, से तोहें आपनों लंगड़ी गधैया दे दें । कुम्हार ई सुनहैं खुश होय गेलै कि लंगड़ी गधैया से मुक्ति मिललों । वैं तुरंत 'हों' करी देलकै । कुम्हारों के हों कहतैं बिज्जी गधैया ले के वहाँ से निकली गेलै आरो राजकुमार सिनी के साथ साथ चलें लागलै । ई देखी के राजकुमार सिनी हाँसे । राजकुमार घोड़ा पर छेलै आरो बिज्जी गधैया पर I भला गधैया घोड़ा के बराबरी करें पारतियै| देख-देख राजकुमार सिनी आगू निकली गेलै । लेकिन राजमहल पहुँचले सब आए पीछू ।
" मतरकि गधैया हौ हीरा, मोती, मुहर, केना खाबें पारें ।" बिलटा कहते-कहतें उठी बैठलै ।
“सुनलै नैं, कुम्हारें ओकरा खाय ले नै दै छेलै, तब करतियै की । जे मिललै वही खाय गेलै । "