के बिलटा हौले सें बण्टा के चुट्टी काटले छेलै । तें बण्टौ समझी गेलै कि खिस्सा सुनै वक्ती ओकरा टोका-टोकी नै करना है । मतरकि ऊ सुतलों नै रहलै, उठी के बैठी रहलै । यैलें कि कांही सुनतें सुनतें नीन नै आवी जाय ।
रुपसावालीं खिस्सा आगू बढ़ाय देलें छेलै, “एक दाफी राजा असकल्ले जंगल दिश शिकार खेलै ले निकली गेलै नै छोटकी रानी लेलकै, नै कोय सेनापति, नै कोय सिपाहिये ।
“ऊ दिन राजा आरो निराश छेलै । सोचलो जाय कि तभिये जंगल में हुनका एक साधु दिखाय पड़लै । पता नै, राजा के मनों में की हो कि हुनी साधु नगीच पहुँची गेलै । घोड़ा पीछुवे के एक गाछी सें बांधी देलकै ।
“जब राजा साधू के नगीच पहुँचले ते साधूं राजा के मूँ उदास देखी कहलकै, 'तोहें देखल्हैं सें राजा बुझाय छौ, मतरकि तोरों चेहरा पर ई दुख कैन्हें छौं ?'
" राजां साधु के गोड़ छुवी के आपनों सबटा दुख सुनाय देलकै । राजा रॉ दुख से द्रवित साधु हुनका एक चांदी के छड़ी देलकै आरो कहलकै, 'पूरब दिश गेला पर कोस भरी के दूरी पर एक गाछ छै, जे पचास गाछ से घिरलों छै । सबटा गाछ आमे केरों छेकै, आरो सबभे में आम फरै छै । जे गाछ रॉ आम छोटो छोटों बुझावौं, बस वही गाछों सें तोहें सात आम ई छड़ी सें तोड़ी लियों । याद राखियों, कभियो सात सें ज्यादा तोड़े के लोभ नै करियों, नै तें तोड़लों सातो आम सहित छड़ियो गाछी सें सट्टी जैतौं ।'
"साधू सें छड़ी पावी के राजा के खुशी के तें कोय सीमा नै रही गेलें । हुनका सें आशीर्वाद आरो छड़ी लै के राजा पूरब दिस चली देलकै । कोस भरी बढ़ला पर ठिक्के हुनी पचास आम गाछों के बीच एक ठो छोटों आम वाला गाछ देखलकै । राजां छड़ी से सात आम तोड़लकै आरो लौटें लागलै । कि तखनिये हुनका मनों में ई बात उठलै कि कैन्हें नी छोटकी रानी वास्तें एक ठो आरो आम तोड़ी लौं । ई सोची के राजा आठमों आम तोड़ी लेलकै । तोड़े के ढेर भर छेलै कि आठो आम आरो ऊ छड़ी गाछी सें जाय के सट्टी रहलै ।"