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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/36

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टेलीफोन करों, तें हुन्नें से बोलतौं - सभी लाइन व्यस्त हैं । जेना लागे छै टेलीफान नै रहें, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली के सड़क रहें-लाइन व्यस्त है ।" बिलटाबाबू चिढ़तें होलें बोललै “खैर देखै छियौं, तोहें डढ़िया लगाय लें ।"

“पता नै कखनी ऐतै आबें हुनी" बिलटा मायं मने मन सोचलकै आरो खटिया के गोरपारी दिश दोनों के पैर उठाय के बैठी गेलै । खटिया पर बैठे भर के देर छेलै कि रोजके नाँखी बिलटा कहलकै, “माय कोय खिस्सा कहैं नी ।”

खिस्सा के बात सुनथैं बण्टा जेहों ओघरैलों छेलै, उठी के बैठी " नै बेटा, उठै के काये जरूरत नै छै, लेटले-लेटले सुनें । एक ठो खिस्सा सुनाय छियौ - छौ भाय राजकुमार आरो एक भाय बिज्जी के ।" रूपसावाली दोनों के गोड़ के बारी-बारी से हौले-हौले मलतो जाय आरो खिस्सा कहतें जाय रहलो छेलै, “एक ठो राजा छलै । राजा के अपार सम्पत्ति छेलै ।"

" हमरों चौधरियो काका सें भी ज्यादा ?" बण्टा बीचों में जिज्ञासावश पूछलकै ।

"तोरों काकौ से ज्यादा । राजा रं केकरा धन हुऍ पारें ! तें, ऊ राजा के सात रानी छेलै । मतरकि एक्को टा सन्तान नै । से राजा बड़ी दुखी रहै । घरे में उदास बैठलों रहै ।"

"तें हुनी खेलै- ऊलै ले कैन्हें नी चल्लों जाय छेलै ।" बण्टा फेनू बीचे में टोकलकै ।

" हों जाय छेलै नी, शिकार खेलै लें । तखनी राजा आपनों छोटकी रानियों के साथ लै लै । राजा छोटकी रानी के बहुत मानै छेलै । " “एत्ते ?" बण्टा सुतले - सुतले दोनों हाथ दोनों दिश फैलैतें पूछलकै ।

ई देखी रूपसावाली के हँसी आवी गेलै आरो बहूं दोनों हाथ फैलाय के कहलकै, “हों एतें ।"

“अभी खिस्सा शुरुवे होलो छेलै आरो बण्टा तीन दाफी टोकी चुकलो छेलै । तब तें ई खिस्सा भोरो तांय पूरा नै हुऍ पारतै ।" ई सोची