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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/25

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'भोरे - भोर इस्कूल कैन्हें जाय लें मार करी रहल छै । हेनों तें कहियो नै होलै । आखिर पूछिये बैठले, “अरे बण्टू, आय एते जल्दी इस्कूल जाय के कैन्हें धड़पड़ी छौ ?"

बा जाने छे कि घरों में कोय- न कोय ई सवाल करते जरूरे, से वैं पहिलै सें एकरों जवाबो ढूंढी के राखले छेलै । से, माय जेना के पुछलकै, ऊ तेन्है के बोली पड़लै, “आय गुरु जी हमरा पर भार देलें है। घोष बाबू के यहाँ से ले के सबटा कुर्सी इस्कूली में हमरे राखना छै । यहॅ लें धड़पड़ी है । गुरु जी आवै सें पहिले जे कुर्सी सबटो राखना है ।”

"ओ, इ बात है" बण्टो माय निचिन्त होतें कहलकै, "तें, बेटा जल्दी-जल्दी खाय ले । रातको रोटी ते छेवे करौ, नॉन, तेल लै ले, नैं तें अचारी तेल के दू बूंदे डाली दें । एकदम स्वादिष्ट होय जैतौ । खेलों रहवे तें हम्मूं निश्चिन्त रहवों ।"

अचारी के बात सुनथैं बण्टा के मुँहों से लार टपकी ऐलै, मतरकि वैं आपनों जीहा पर काबुए राखवों अच्छा समझलकै । ओकरा खूब याद छै कि यह अचारी के चक्कर में ऊ चक्कर खा चुकल छै ।

बात ई होलों छेलै कि ओकरी माय बड़ों-बड़ों टिकोला के फाँक करी कुच्चा बनैले छेलै । रोज तें आपने सामना में कुच्चा धूपों में सूखे लें दै, मतरकि हौ दिन बण्टामाय के जरूरी कामों सें पड़ोसी कन जाना छेलै । रिश्ता में पितियो लागे, केना नै जैतियै ।

कुच्चा वाला बोय्यम धूपों में राखी देलकै, आरो बण्टा के बोललै कि देखहैं रहियें - बकरी - चकरी मूँ नै दै दौ ।

मतरकि बच्चा - बुतरु पर की भरोसों, से बण्टामायं बण्टा के साथें साथ बिलटाहो के कही देलकै, "बिलटू, जरा कुच्चा देखतें रहियें - बकरी-चकरी मूँ नै दे दें । हमें घण्टा - दू घण्टा में लौटवौ । ” आरो ई कही के ऊ ऐंगन से बाहर निकली ऐलै ।

ऐंगन के बीचों में कुच्चा वाला बोय्यम, तेल सें चुपचुप चमकी रहल छेलै, आरो ओतन्हें ओकरा देखी के बण्टा के आँखो चमकी रहलॉ छेलै । जतॆ बोय्यम भरी तेल भरलों छेले, ओत्ते हिन्नें बण्टा के मुँह भरी लार ।

आखिर वैं कतें देर टुकटुक कुच्चा के देखतें रहैतियै । मन में ऐलै कि एकटा फाँक निकाली के खय्ये लेवै, तें माय के की पता चलतै ।