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Page:Banta (Dr. Amrendra).pdf/23

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कुर्सी के घोष बाबू के ऐंगना में रखी आव, तब घोर जय्यें ।" ई कही के जेन्हें जमुआर गुरु जाय लें उठले कि आरो सिनी गुरुओ उठी के आपनों - आपनों रस्ता पर बढ़ी गेलै ।

बण्टा पीछू सें सबकें जैतें देखतें रहलै । वैनें दायां हाथ घुमाय के पीठी पर राखलकै, तें एकबारगिये तिलमिलाय गेलै । हाथ वहीं पर पहुँची गेलै, जैठां छड़ी सें चमड़ी उखड़ी गेलों छेलै । ऊ तुरत्ते बत्ती नाँखी तनी गेलै आरो दर्द खतम होय के इन्तजारी में आँख मुनी लेलकै ।

अंगुरी छुवाय गेला के कारणें जे घाव लहरी उठलो छेलै, ऊ जेन्है के कम होलै, बण्टा सब कुछ भुलाय के कुर्सी दिश बढ़लै आरो एकेक के घोष बाबू के दुआरी पर राखी ऐलै । अनदिना के बात रहतियै ते कोय बात नै छेलै, मजकि इखनी तें ओकरों पीठी में जरियो टा झुकला सें दरद हुऍ लागे । तहियो वैं पाँचो कुर्सी उठाय के ठीक जग्घा पर राखी ऐलो छेलै आरो फेनू बस्ता उठैनें आपनों घोर दिश बढ़ी गेलै ।

रस्ता में वैंकै दाफी आँखी के लोर दायां - बायां बाँही सें पोछलें होते, कहना मुश्किल । मतरकि घोर पहुँचतें, ऊ एकदम गुम होय गेलो छेलै । वैनें नुकाय के कमीज खोलले छेलै आरो जल्दी से गंजी पिहनी लेलकै कि कहीं माय ओकरों घाव नै देखी लें । नै तें पिटाय के कारण पूछतै । फेनू एक-एक बात खुलतै आरो बाबू के जब मालूम होते कि दुखमोचन साथें वैं की करलें छै, तब पीठ सहलाय के बदला उल्टे बाबू ओकरा गतै ।

से बण्टा सबटा दरद घोंटी के पीवी गेलै । साँझ के ऊ खेलै ले नै निकललै । डिजना, सिंघवा, भूधरा, दुआरी पर बुलाय लें ऐवो करलै, तें वैं यही कही के सब दोस्तों के लौटाय देलकै कि गुरु जी ढेरे टास्क दै देलें छै, सब के पूरा करना छै, यै लेली आय खेलै ले नै जैतै । साथी सिनी के आचरजे लागलों छेलै, बण्टा के बात सुनी के । मतरकि कुछ बोलले नै आरो दुआरी पर सें सब लौटी ऐलै । जखनी डिजना, भुदरा आरनी ओकरों लुग गेला छेलै, तखनी सचमुचे में वैं कुछ सिलोटी पर लिखी रहलो छेलै ।

लिखतियै की, बस हिन्ने हुन्नें टेढ़ा-मेढ़ों रेखा बनाय रहल छेलै आरो बनैतें - बनैतें एक ठो हेनों नक्शा बनी उठलों छेलै कि ऊ जेना कोय