मतरकि दुखमोचना बण्टा के एक्को बातों के कोय जवाब नै देलकै आरो पेटों के आगू, पैंटों में खोसलों बस्ता निकाली के सीधे घोर दिश बढ़ी गेलै ।
आबें बण्टा के आवै वाला खतरा के आभास हुऍ लागलै । " जरूर वैं ई बातों के बदला लेते । हेन्हों गुम्मी साधी के कैन्हें गेले । मतरकि मैं करै की पारें । है तें हुऍ नै पारें कि ऊ हमरा से भिड़ते । एक्के पटकनिया में तें सब गुर्री भुतलाय जैतै....तबें ई हुऍ पारें कि वैं पीछू सें लंग्घीमारी दें आरो हेन्हों जग्घों मारें, जहाँ कि कादो - कीचड़ रहें ।" ई बात सोचिये के बण्टा एक मिनटों लें एकदम सावधान होय गेलै ।
मजकि वहाँ आर्बे कोय नै छेलै । दुखमोचना आँखी सें ओझल होय गेला छेलै ।
बण्टां नीचें राखलों सिलोट-पेन्सिल उठैलकै आरो आपनो घोर लगे छड़पनिया दै देलकै ।
घोर तें आबी गेलै, मजकि दोसरों दिन इस्कूल जाय के ओकरों हियाव नै हुऐ । बण्टां मने मन सोचे, “दुखमोचन जरूर बदला लै के कोय तरीका ढूंढते होते, आरो केना के लेते, ई कहना मुश्किल ।” सोचतें सोचतें बण्टा हेनों कुछ सोची लै कि सोचिये के ऊ डरी उठे, वैं मने-मन सोचलकै, “हुऍ सकै छै, वें गुलेली सें गोली चलाय दै आरो गुलेली के गोली ओकरों कोकड़ी, पीठी आकि गोड़े सें लगी गेलै, तबें तें बाप रे बाप, दस दिन खटिया से सटलों रहो । एक दाफी गुलेली सें कस्सी के गोली वैं एक ठो पठिया पर चलाय देले छेलै । आधा घंटा तक ऊ पठिया वहीं पर छटपटैतें रही गेलै । ऊ तें केकरो पता नै चललै नै तें वहें दिन हमरा निनौन होय जैतियै ।"
गुलेल के बात सोचतैं ओकरा लागलै कि एक हनहनैतें ऐतें गोली ओकरों पनखोखा सें लागलों छै आरो ऊ छटपटावें लागलों छै । बण्टा एकदम सें सिहरी गेलै । सोचलकै " नै ऊ इस्कूल नै जैतै । कम-से-कम दू-तीन दिन तक नहिये जैतै । तब तांय दुखमोचना के गोस्सा जरूरे उत्तरी जैतै । फेनू, की हम्में मारले छियै, की पीटले छियै ? जों पानी होहाय कॅ निकली गेलै तें, हमरों की दोष ।" वैंनें आपना के निर्दोष दिखैतें मन के