दरबनिया लगैते कि इस्कूलिये दुआरी पर रुकतै। आरो बोझों की ? बैठे लें एक एकठो चट्टी आरो लिखे ले एक टा सिलोट यही तें साथों में रहतै।"
आरो वहें दिन बण्टा वास्तें लब्बों लब्बों कपड़ा आवी गेलों छेलै। बहुत कुछ सोचिये के ओकरी मायं कपड़ा आनले छेलै - कुछ बड़े-बड़े।
बण्टा झ- झब ओकरा चढ़ाय लेलें खेलै। पैंट छेलै, तें ठेहुना सें दू अंगुल नीचें आरो कमीज छेलै, तें जाँघ भर।
पचरासी देखलकै तें कहलकै, "है ठिक्के करलौ बण्टूमाय।
आबे कत्तो जल्दी बण्टू बढ़ते, तें दू साल तें पैंट-कमीज खाँटों ने पड़े वाला छै।"
"यह सोची के तेंदू अंगुल बड़ों कमीज किनले छियै।"
" ठीक करलौ, होना के हम्में यहू सोचले छेलियै, दुखहरन वाला जे पैंट-कमीज छै, ओकरै छटवाय के छोटों करवाय देबै। कपड़ा में होले छै की। एत्ते मजगूत छै कि पाँच, छ महीना चलिये जैतिये। खैर, ओकरों जरूरते नै पड़लै।"
"हेनों करियै के तोहें कॉन बुद्धिमानी के काम करतियौ। दरजी काटी- छाँटी के नाँपों के बनैतियौं, तें जाने छौ, कत्ते लेतियौं? ओतें में तें ई नया कपड़ा आवी गेलै।"
हुन्नें पचरासी आरो बण्टामाय में बातचीत चली रहलो छेलै, आरो हिन्नें बण्टा लब्बों - लब्बों कमीज-पैंट, चप्पल पिहनी के मारे खुशी सें गद्गद होय रहलों छेलै।
खाली पैंटे-कमीज नै, बण्टामायं हवाई चप्पलो जे लेलॅ छेलै, ऊ बण्टा के गोड़ों सें आधों इंची बड़े। बण्टा ते तखनिये सें गनगनाय रहलो छेलै, जखनी ओकरों गोड़ों के छाप ओकरी माय नें एक कागजों पर लेनें छेलै।
आबे जब हवाई चप्पल ओकरों गोड़ों में छेलै, ते ओकरों मॉन करी हो कि पंजा बल्लों खूब हुमौ। रहलों ने गेले तें पंजा बल्लें वैं ऐड़िया के खूब उठैलकै, फेनू बॉल लगाय के एड़िया चप्पल में धंसाय देल। फॉल ई होलै कि बायां चप्पल के एक दिशों के लब्बड़ वाला