छै।"
आरो सबके आँख बण्टा है दिश गड़लों।
ओकरा डर लागे लागलै। लागले कि सब भैंसिया एक्के दाफी ओकरों दिश दौड़ी पड़ते आरो ओकरा खूँची- खाँची के रक्खी देते।
एतना सोचना छेलै कि बण्टा भैंसिया सिनी के देखले देखले आठ-दस कदम पीछू कल्ले - कल्ले हटलै, फेनू हठाते पीछू मुड़ी के सरपट भागले आपनों दुआरी पर आवी के खाड़ों होय गेलै आरो वहीं सें वैनें ऊ सब के गुर्राय के देखलकै।
सब भैंस होन्हे के घास कचरें लागलों छेलै - बीचों-बीचों में नेंगड़ी हिलाय - हिलाय कॅ।
ओकरा याद ऐलै - आठे, दस रोज पहिलकों तें बात छेकै, " अनारसी काका के भैंस हमरों खेतों में घुसी गेलों छेलै। बाप रे बाप, अनारसी काका के भैंस छेकै-जेना बिना सूडवाला हाथी। देख हम्में पुआली तरों में सुटियाय गेला छेलियै, आरो वहीं सें खॉर हटाय - हटाय के भैंसिया के देखतें रहलो छेलियै। बाप रे बाप, आपनों घोंघरी सिंहों में की रं लॉत लपेटी के खीची लै छेलै आरो जीहा में फँसाय के गटकी लै | सब लॉत सुरकला के बादे झुमलों - झुमलों खदैया दिश बढ़ी गेलै। ऊ तें भगवाने हमरा बुद्धि देलकै कि भैंसी के जैतै, हम्में अनारसी का के घोर भागलियै। कानी कानी काका सें सब बात कहलियै आरो बाबू के मारों सें हमें बची गेलियै। अनारसी कां बाबू के समझाय देलें छेलै, 'देख पचरासी, बच्चा बुतरू के है रं बैल-बोतू रं डंगेलों ने करें - गोबध लागतौ | अरे बच्चा - बुतरु के मनों में तें गैये के नी मॉन बसै छै। गाय, माय, बच्चा, सब बरोबर। आबें तोहें है रं आपने बच्चा के पीटै छें, तें दूसरा के बच्चा के तोहें की दुलरैबैं। टोला भरी के बच्चा डरों सें कुछ भले नै बोलौ, भीतरी मनों सें तें राकसे कहतें होतौ। राकस का, राकस बाबा, राकस नाना, आरो नै जानौं की की। अरे पचरासी, बच्चा ते सिलोट नाँखी होय छै, जे देखै छै, वही लिखाय जाय छै आरो होने फेनू जिनगी भर घोकै छै। कल फेनू वहूं होने रं करते, तें तोहें कह बैं- कुलों में कलंक जनमलों छै। बच्चा के दुलार कर, गलती के समझाय के बतैमैं, ते वहूं वहें रं करतै। आय जे बच्चा सिनी उद्दण्ड बनी गेलों छै, वैमें हमरों