श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

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महाभारत के युद्ध में अर्जुन के मोह तथा भ्रम को दूर करने के लिए श्री कृष्ण ने कर्मयोग का उपदेश दिया, जो श्रीमद्भगवद गीता के रूप में प्रसिद्ध है। यह उपदेश १८ अध्यायों में विभाजित है ।

अथ ध्यानम

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै- र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।


  1. * अर्जुनविषादयोग- पहला अध्याय
  2. * सांख्ययोग- दूसरा अध्याय
  3. * कर्मयोग- तीसरा अध्याय
  4. * ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- चौथा अध्याय
  5. * कर्मसंन्यासयोग- पाँचवाँ अध्याय
  6. * आत्मसंयमयोग- छठा अध्याय
  7. * ज्ञानविज्ञानयोग- सातवाँ अध्याय
  8. * अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय
  9. * राजविद्याराजगुह्ययोग- नौवाँ अध्याय
  10. * विभूतियोग- दसवाँ अध्याय
  11. * विश्वरूपदर्शनयोग- ग्यारहवाँ अध्याय
  12. * भक्तियोग- बारहवाँ अध्याय
  13. * क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग- तेरहवाँ अध्याय
  14. * गुणत्रयविभागयोग- चौदहवाँ अध्याय
  15. * पुरुषोत्तमयोग- पंद्रहवाँ अध्याय
  16. * दैवासुरसम्पद्विभागयोग- सोलहवाँ अध्याय
  17. * श्रद्धात्रयविभागयोग- सत्रहवाँ अध्याय
  18. * मोक्षसंन्यासयोग- अठारहवाँ अध्याय