राजकुमार की प्रतिज्ञा १

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समर्पण

नई पीढ़ी को
जिस पर
देश का भविष्य निर्भर करता है।
-यशपाल जैन

दो शब्द

मैं नहीं जानता कि इस उपन्यास को लिखने की कल्पना मेरे मने में क्यों उपजी! अपनी इस बार की विदेश-यात्रा में तीसरा उपन्यास 'भोर की आहट' लिखकर लिखकर मैं कुछ दिन का विश्राम चाहता था, लेकिन स्वदेश लौटने पर काम का अम्बार सामने आ गया। उसे निपटना आवश्यक था।

उसी व्यस्तता में अचानक एक दिन जाने कैसे विचार आया कि मैंने बड़ों के लिए तो बहुत-कुछ लिख दिया, बच्चों के लिए भी कुछ लिखना चाहिए। साथ ही यह भी विचार आया कि मुझे अब कहानी नहीं, उपन्यास लिखना चाहिए।

मेरे लिए बड़े विस्मय की बात है कि इस कल्पना के आते ही कलम चल पड़ी और देखते-देखते यह उपन्यास पूरा हो गया। इसको लिखते समय मेरे सामने मुख्यत: बच्चे रहे हैं। मुझे पता है कि बच्चों को परियों की कहानी बहुत पसंद आती है। मैं जब छोटा था तो मेरी मां हम बच्चों को परियों की कहानियां सुनाया करती थी। उन कहानियों को सुनते-सुनते हमें पता भी नहीं चलता था कि अब आधी रात हो गई। हम चाहते थे कि कहानी चलती ही रहे। अगले दिन फिर हम मां को परियों की कहानी सुनाने के लिए मजबूर कर देते थे।

इस उपन्यास में मैं परियों को लाया हूं। फिर मुझे ध्यान आया कि बच्चों को जादू बहुत पसंद है। मैं जादू को ले आया। सिंहल द्वीप की पद्मिनी को लेकर बहुत-सी कहानियां लिखी गई हैं। मैंने भी इस उपन्यास की प्रमुख नायिका सिंहल द्वीप की पद्मिनी को बनाया और उसके इर्द-गिर्द उन घटनाओं का ताना-बाना बुना, जो रोचक हैं, मनोरंजक हैं, कौतूहल से भरी हैं।

बच्चों के लिए यथार्थ का विशेष मूल्य नहीं होता। वे यह नहीं देखते कि अमुक चीज संभव है या नहीं। वे तो बस पढ़ते समय यही चाहते है कि कहीं भी उनका मन रुके नहीं, पानी पर तैरता चले।

मैंने इन सब बातों का ध्यान तो रक्खा ही है, और भी अनेक चीजों का ध्यान रक्खा है। घटना-चक्र ऐसा चलता रहा कि कथा-सूत्र आगे बढ़ता गया और यह उपन्यास पूरा हो गया।

मेरा मानना है बच्चे तो इस उपन्यास को पढ़कर पुलकित होंगे ही, यदि बड़े भी इसे पढ़ेंगे तो बच्चों की तरह उनका भी मनोरंजन होगा। परियों की कहानी, जादू की नगरी और सागर पार करने की घटना आदि उनके मन को गुदगुदायेंगी और सिंहल द्वीप और उसकी राजकुमारी पद्मिनी की गाथा उन्हें उस रूपसी के मोहपाश में बांधे बिना नहीं रहेगी।

यह उपन्यास लिखकर मेरा मन भरा नहीं है। अभी और भी कई कथानक मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं। यदि समय मिला तो बच्चों को और उनके द्वारा बड़ों को कुछ और उपन्यास देने का प्रयत्न करूंगा।

लोक-कथाओं और बोध-कथाओं में मेरी बहुत दिलचस्पी रही है। मैंने वैसी बहुत-सी कथाएं लिखी भी हैं।

मुझे संतोष है कि मेरा यह उपन्यास पाठकों को सुलभ हो रहा है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि बच्चे, बड़े, सब इसे पढ़ें और खूब मन लगाकर पढ़ें। मेरा दावा है कि इसे पढ़ने में उन्हें बड़ा आनंद आवेगा।

-यशपाल जैन
७/८, दरियागंज, नई दिल्ली.
१ जनवरी, १९९९

राजकुमार की प्रतिज्ञा

१/

पुराने जमाने की बात है। एक राजा था। उसके सात लड़के थे। छ: का विवाह हो गया था। सातवां अभी कुंवारा था। एक दिन वह महल में बैठा था कि उसे बड़े जोर की प्यास लगी। उसने इधर-उधर देखा तो सामने से उसकी छोटी भाभी आती दिखाई दीं। उसने कहा, "भाभी, मुझे एक गिलास पानी दे दो।" महल में इतने नौकर-चाकर होते हुए भी सबसे छोटे राजकुमार की यह हिम्मत कैसे हुई, भाभी मन-ही मन खीज उठीं। उन्होंने व्यंग्य भरे स्वर में कहा, "तुम्हारा इतना ऊंचा दिमाग है तो जाओ, रानी पद्मिनी को ले आओ।"

राजकुमार ने यह सुना तो उसका पारा एकदम चढ़ गया। बोला, "जबतक मैं रानी पद्मिनी को नहीं ले आऊंगा, इस घर का अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगा।"

बात छोटी-सी थी, लेकिन उसने उग्र रूप धारण कर लिया। रानी पद्मिनी काले कोसों दूर रहती थी। वहां पहुंचना आसान न था। रास्ता बड़ा दूभर था। जंगल, पहाड़, नदी-नाले, समुद्र, जाने क्या रास्ते में पड़ते थे, किन्तु राजकुमार तो संकल्प कर चुका था और वह पत्थर की लकीर के समान था।

उसने तत्काल वजीर के लड़के को बुलवाया और उसे सारी बात सुनाकर दो घोड़े तैयार करवाने को कहा। वजीर के लड़के ने उसे बार-बार समझाया कि रानी पद्मिनी तक पहुंचना बहुत मुश्किल है, पर राजकुमार अपनी हठ पर अड़ा रहा। उसने कहा, "चाहे कुछ भी हो जाये, बिना रानी पद्मिनी के मैं इस महल में पैर नहीं रक्खूंगा।"

दो घोड़े तैयार किये गये, रास्ते के खाने-पीने के लिए सामान की व्यवस्था की गई और राजकुमार तथा वजीर का लड़का रानी पद्मिनी की खोज में निकल पड़े।

उन्होंने पता लगाया तो मालूम हुआ कि रानी पद्मिनी सिंहल द्वीप में रहती है, जहां पहुंचने के लिए सागर पार करना होता है। फिर रानी का महल चारों ओर से राक्षसों से घिरा है। उनकी किलेबंदी को तोड़कर महल में प्रवेश पाना असंभव है वजीर के लड़के ने एक बार फिर राजकुमार को समझाया कि वह अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ दे अपनी जान को जोखिम में न डाले, किन्तु राजकुमार ने कहा, "तीर एक बार तरकश से छूट जाता है तो वापस नहीं आता। मैं तो अपने वचन को पूरा करके ही रहूंगा।"

वजीर का लड़का चुप रह गया। दोनों अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर रवाना हो गया।

दोपहर को उन्होने एक अमराई में डेरा डाला। खाना खाया, थोड़ी देर आराम किया, उसके बाद आगे बढ़ गये। चलते-चलते दिन ढलने लगा, गोधूलि की बेला आई। इसी समय उन्हें सामने एक बहुत बड़ा बाग दिखाई दिया। राजकुमार ने कहा, "आज की रात इस बाग में बिताकर कल तड़के आगे चल पड़ेंगे।"

बाग का फाटक खुला था और वहां कोई चौकीदार या रक्षक नहीं था। वजीर के लड़के ने उधर निगाह डालकर कहा, "मुझे तो यहां कोई खतरा दिखाई देता है। हम लोग यहां न रुक कर आगे और कहीं रुकेंगे।"

राजकुमार हंस पड़ा। बोला, "बड़े डरपोक हो तुम! यहां क्या खतरा हो सकता है? देखते नहीं, कितना हरा-भरा सुन्दर बाग है!"

वजीर के लड़के ने कहा, "आप मानें न मानें, मुझे तो लग रहा है कि यहां कोई भेद छिपा है।"

राजकुमार ने उसकी एक न सुनी और अपने घोड़े को फाटक के अंदर बढ़ा दिया। बेचारा वजीर का लड़का भी उसके पीछे-पीछे बाग में घुस गया। ज्योंही वे अंदर पहुंचे कि बाग का फाटक अपने आप बंद हो गया। राजकुमार और वजीर के लड़के को काटो तो खून नहीं। यह क्या हो गया? वजीर के लड़के ने राजकुमार से कहा, "मैंने आपसे कहा था न कि यहां ठहरना मुनासिब नहीं? पर आप नहीं माने। उसका नतीजा देख लिया!"

राजकुमार ने कहा, "वह सब छोड़ो! अब यह सोचो कि हम क्या करें"

वजीर का लड़का बोला, "अब तो एक ही रास्ता है कि हम घोड़ों को यहीं पेड़ों से बांध दें और किसी घने पेड़ के ऊपर चढ़ कर बैठ जायें। देखें, आगे क्या होता है।"

दोनों ने यही किया। घोड़े पेड़ से बांध कर वे एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गये और चुपचाप बैठ गये।

अंधकार फैल गया। सन्नाटा छा गया। राजकुमार को नींद आने लगी। तभी उन्होंने देखा कि हवा में उड़ता कोई चला आ रहा है। दोनों कांप उठे। हवा का वेग रुकते ही वह आकृति नीचे उतरी। उसकी शक्ल देखते ही दोनों को लगा कि वे पेड़ से नीचे गिर पड़ेंगे। वह एक परी थी। उसने नीचे खड़े होकर अपने इर्द-गिर्द देखा। तभी इधर-उधर से कई परियां आ गईं। उनके हाथों में पानी से भरे बर्तन थे। उन्होंने वहां छिड़काव किया। वह पानी नहीं, गुलाबजल था। उसकी खुशबू से सारा बाग महक उठा।

अब तो उन दोनों की नींद उड़ गई और वे आंखें गड़ाकर देखने लगे कि आगे वे क्या करती हैं।

हवा में उड़ती एक परी आ रही थी। उसी समय कुछ परियां और आ गईं। उनके हाथों में कीमती कालीन थे। देखते-देखते उन्होंने वे कालीन बिछा दिये। फिर जाने क्या किया कि वह सारा मैदान रोशनी से जगमगा उठा। अब तो इन दोनों के प्राण मुंह को आ गये। उस रोशनी में कोई भी उन्हें देख सकता था।

उस जगमगाहट में उन्हें दिखाई दिया कि एक ओर से दूध जैसे फव्वारे चलने लगे हैं। पेड़ों की हरियाली अब बड़ी ही मोहक लगने लगी।

जब वे दोनों असमंजस में डूबे उस दृश्यावली को देख रहे थे, आसमान से कुछ परियां एक रत्न-जटिलत सिंहासन लेकर उतरीं और उन्होंने उस सिंहासन को एक बहुत ही कीमती कालीन पर रख दिया। सारी परियां मिलकर एक पंक्ति में खड़ी हो गईं। राजकुमार ने अपनी आंखें मलीं। कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा था!

वजीर का लड़का बार-बार अपने को धिक्कार रहा था कि उसने राजकुमार की बात क्यों मानी। पर अब क्या हो सकता था!

आसमान में गड़गड़ाहट हुई। दोनों ने ऊपर को देखा तो एक उड़न-खटोला उड़ा आ रहा था।

"यह क्या?" राजकुमार फुसफुसाया। वजीर के लड़के ने अपने होठों पर उंगली रखकर चुपचाप बैठे रहने का संकेत किया।

उड़न-खटोला धीर-धीरे नीचे उतरा और उसमें से सजी-धजी एक परी बाहर आई। वह उन परियों की मुखिया थी। सारी परियों ने मिलकर उसका अभिवादन किया और बड़े आदर भाव से उसे सिंहासन पर आसीन कर दिया।

थोड़ी देर खामोशी छाई रही। फिर मुखिया ने ताली बजाई। एक परी आगे बढ़कर उसके सामने खड़ी हो गई। मुखिया ने बड़ी शालीनता से कहा, "जाओ, उसको लाओ।"

"जो आज्ञा!" कहकर वह परी वहां से चल पड़ी और उसी ओर आने लगी, जहां पेड़ पर राजकुमार और वजीर का लड़का बैठे थे। दोनों की जान सूख गई। वे अपने भाग्य में क्या लिखाकर आये थे कि ऐसे संकट में फंस गये!

परी उसी पेड़ के नीचे आई और राजकुमार की ओर इशारा करके कहा, "नीचे उतरो। हमारी राजकुमारी ने तुम्हें याद किया है।"

राजकुमार हिचकिचाया। उसकी हिचकिचाहट देखकर परी ने कहा, "जल्दी उतर आओ। हमारी राजकुमारी आपकी राह देख रही हैं।

कोई चारा नहीं था। राजकुमार नीचे उतरा और परी के साथ हो लिया। दोनों राजकुमारी के पास पहुंचे। राजकुमारी ने सरक कर सिंहासन पर जगह कर दी और कहा, "आओ, यहां बैठ ज़ाओ।"

राजकुमार ने उसकी बात सुनी, पर उसकी बैठने की हिम्मत न हुई। राजकुमारी ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा, "तुम कौन हो?"

राजकुमार ने धीरे से कहा, "मैं राजगढ़ के राजा का बेटा हूं।"

"तो तुम राजकुमार हो!" राजकुमार ने मुस्कराकर कहा।"

राजकुमार चुपचाप खड़ा रहा।

राजकुमारी ने कहा, "देखो, यहां से कोसों दूर हमारा राज है। मैं वहां की राजकुमारी हूं। बहुत दिनों से इंतजार कर रही थी कि कोई राजकुमार यहां आये। आज तुम आ गये।"

इतना कहकर राजकुमारी राजकुमार की ओर एकटक देखने लगी।

राजकुमार को लगा कि वह बेहोश होकर गिर पड़ेगा, पर उसने अपने को संभाला।

राजकुमारी की मुस्कराहट और चौड़ी हो गई। बड़े मधुर शब्दों में बोली, "तुम्हें मुझसे विवाह करना होगा।"

राजकुमार पर मानो बिजली गिरी। उसने कहा, "यह नहीं हो सकता।"

"क्यों?" राजकुमारी ने थोड़ा कठोर होकर पूछा।

"इसलिए कि, " राजकुमार ने कहा, "मैं रानी पद्मिनी की तलाश में निकला हूं। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जबतक वह नहीं मिल जायेगी, मैं अपने महल का अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगा।"

"ओह! यह बात है?" राजकुमारी ने बड़े तरल स्वर में कहा, "मैं नहीं चाहूंगी

कि तुम अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ो। प्रतिज्ञा बड़ी पवित्र होती है। उसे तोड़ना नहीं चाहिए। तुम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो। मैं उसमें तुम्हारी मदद करूंगी। पर एक शर्त पर।"

राजकुमार ने कहा, "वह शर्त क्या है?"

राजकुमार बोली, "पद्मिनी को लेकर तुम यहां आओगे और मेरे साथ शादी करके अपने राज्य को जाओगे।"

राजकुमार ने कहा, "इसमें मुझे क्या आपत्ति हो सकती है?"

राजकुमारी थोड़ी देर मौन रही, फिर बोली, "तुम सिंहल द्वीप चहुंचोगे कैसे?"

राजकुमार ने कहा, "क्यों, उसमें क्या दिक्कत है!"

राजकुमारी हंसने लगी। हंसते-हंसते बोली, "तुम बड़े भोले हो। अरे, वहां पहुंचना हंसी-खेल नहीं है। रास्ते में एक जादू की नगरी पड़ती है। सिंहल द्वीप का रास्ता वहीं से होकर जाता है। कोई भी तुम्हें अपने जादू में फंसा लेगा।"

"तब?" राजकुमार ने हैरान होकर कहा।

राजकुमारी बोली, "तुम उसकी चिन्ता न करो। यह लो, मैं तुम्हें एक अंगूठी देती हूं। तुम जबतक इसे अपनी उंगली में पहने रहोगे, तुम पर किसी का जादू असर नहीं करेगा।"

इतना कहकर राजकुमारी ने एक अंगूठी उसकी ओर बढ़ा दी।

राजकुमार ने कहा, "राजकुमारी मैं, तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूंगा।"

राजकुमारी बोली, "इसमें अहसान की क्या बात है! इंसान को इंसान की मदद करनी ही चाहिए।

राजकुमारी एक अंगूठी उसे दे दी। तुम्हारी यात्रा सफल हो, तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी हो!"

राजकुमार ने उसका आभार मानते हुए सिर झुका दिया।

रात बीतने वाली थी। राजकुमारी उठी और अपने उड़न-खटोले पर बैठकर चली गई। परियों ने सारा सामान समेटा और वे भी अपनी-अपनी दिशा को प्रस्थान कर गईं।

राजकुमारी से विदा होकर राजकुमार डगमगाते पैरों से, पर खुश-खुश, वहां आया, जहां वजीर का लड़का बड़ी व्यग्रता से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

राजकुमार को सही-सलामत लौट आया देखकर वजीर के लड़के की जान-में-जान आई। वह पेड़ पर से उतरा। राजकुमार ने उसे आपबीती सुनाकर कहा, "देखो, कभी-कभी बुराई में से भलाई निकल आती है।"

फिर दोनों ने अपने-अपने घोड़े तैयार किये और उनपर सवार होकर चल पड़े। जैसे हीफाटक पर आये कि वह खुल गया। दोनों बाहर हो गये।

२/

राजकुमार ने चलते-चलते कहा, "यह तो पहला पड़ाव था, अभी तो जाने कितने पड़ाव और आयेंगे।"

वजीर का लड़का गंभीर होकर बोला, "यहां से तो हम राजी-खुशी निकल आये, पर आगे हमें होशियार रहना चाहिए।"

वे लोग उस जादुई बाग से कुछ ही दूर गये होंगे कि आसमान में काले-काले बादल घिर आये। खूब जोर की वर्षा होने लगी। वे एक घर में रुक गये। दोनों रात-भर के जगे थे। राजकुमार लेट गया और गहरी नींद में सो गया। वजीर के लड़के को नींद नहीं आई। वह बैठा रहा। अचानक देखता क्या है कि बराबर के कमरे से एक

काला नाग आया। यह उसी का घर था। अपने घर में उन अजनबी आदमियों को देखकर वह गुस्से से आग-बबूला हो गया। बड़े जोर की फुंफकार मार कर वह राजकुमार की ओर बढ़ा। राजकुमार तो बेखबर सो रहा था। वजीर के लड़के ने म्यान से तलवार निकाल कर सांप पर वार किया और उसके दो टुकड़े कर डाले, फिर तलवार से उसे एक कोने में पटक दिया।

बाहर अब भी पानी पड़ रहा था। वजीर का लड़का उठकर घर के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। थोड़ी देर बाहर का नजारा देखता रहा। सोचने लगा कि बैठे-ठाले राजकुमार ने यह क्या मुसीबत मोल ले ली। अच्छा होगा कि अब भी उसका मन फिर जाये और हम वापस लौट जायें, पर वह राजकुमार को जानता था। वह बड़ा हठी था। जो सोच लेता था, उसे पूरा करके रहता था।

और न जाने क्या-क्या विचार उसके दिमाग में चक्कर लगाते रहे।

पानी थम गया तो उसने राजकुमार को जगाया। राजकुमार उठ बैठा। बोला, "बड़े जोर की नींद आ गई। अगर तुम जगाते नहीं तो मैं घंटों सोता रहता।"

तभी उसकी निगाह एक ओर की पड़े नागराज पर गई। वह चौंक कर खड़ा हो गया और विस्मित आवाज में बोला, "यह क्या?"

वजीर के लड़के ने सारा हाल सुनाते हुए कहा, "वह तो अच्छा हुआ कि मुझे नींद नहीं आई। अगर सो गया होता तो यह नाग हम दोनों को डस लेता और हमारा सफर यहीं खत्म हो गया होता।"

राजकुमार वजीर के लड़के के मुंह से सारी दास्तान सुनकर बोला, "मित्र, जिसे भगवान बचाता है, उसे कोई नहीं मार सकता! यह भी याद रक्खो, हम लोग एक बड़े काम के लिए निकले हैं। जबतक वह काम पूरा नहीं हो जायेगा, हमारा बाल बांका नहीं होगा।"

वजीर के लड़के ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

दोनों ने सामान संभाला, घोड़ों पर ज़ीन कसे और आगे बढ़ चले।

चलते-चलते एक तालाब आया। सूरज सिर पर आ गया था। आसमान एकदम

निर्मल हो गया था। वहां वे रुक गये। भोजन किया। थोड़ी देर विश्राम किया। फिर आगे चल दिये।

आगे एक बड़ा घना जंगल था। इतना घना कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था। उसमें जंगली जानवर निडर होकर घूमते थे। डाकू छिपे रहते थे। वहां से निकलना हंसी खेल नहीं था।

जब उन्हें यह जानकारी मिली तो वजीर के लड़के का दिल दहल उठा। उसने राजकुमार की ओर देखा, पर राजकुमार तो जान हथेली पर लेकर महल से निकला था। उसने कहा, "अगर हम इन छोटी-छोटी बातों से घबरा जायेंगे तो कैसे काम चलेगा?"

दोनों उस जंगल में घुसे। जैसा बताया था, वैसा ही उन्होंने उसे पाया। अंधियारी रात-का-सा अंधकार फैला था। आगे-आगे राजकुमार, पीछे वजीर का लड़का। जानवरों की नाना प्रकार की आवाजें आ रही थीं, पक्षी कलराव कर रहे थे। वे लोग बड़ी सावधानी से आगे बढ़ रहे थे।

अचानक उन्हें दो चमकती आंखें दिखाई दीं। राजकुमार ने अपने घोड़े को रोक लिया। खड़े होकर देखा तो सामने एक बाघ खड़ा था। क्षणभर में उन दोनों का खात्मा हो जाने वाला

था। पर मौत सामने आ जाती तो कायर भी शूर बन जाता है। वजीर के लड़के ने आव देखा न ताव, घोड़े पर से कूदा और तलवार से उस पर बड़े जोर का वार किया। राजकुमार ने भी भाले से उस पर हमला किया। बाघ वहीं ढेर हो गया।

अब तो दोनों और बाघ पर तलवार से वारभी चौकन्ने हो गये। बहुत से जानवर उनके पास से गुजरे, पर वे उतने खूंखार नहीं थे। घोड़ों को देखकर रास्ते से हट गये। वे लोग पल-भर को भी नहीं रुके। उन्हें पता नहीं चल रहा था कि वे कितना जंगल पार कर चुके हैं। सूरज ने भी वहां हार मान ली थी। उन्हें डर था कि कहीं रात न हो जाय। रात में जंगली लोमड़ी भी शेर बन जाती है। जंगली सूअर, नील गाय, भैंसे, शेर, चीते इधर-उधर विचरण करने लगते हैं, पर वहां तो रात-दिन एक-सा था। उजाले का कहीं नाम नहीं था।

उन दोनों ने हिम्मत नहीं हारी। उनके हौसले के सामने जंगल ने हार मान ली। जंगल समाप्त हुआ, खुला मैदान आ गया। दिन ढल गया था। मारे थकान के दोनों पस्त हो रहे थे। वजीर के लड़के ने कहा, "अब हम यहीं कोई अच्छी जगह देखकर ठहर जायें। हम लोगों की ताकत जवाब दे रही है और हमारे घोड़े भी पसीने से तर-बतर हो रहे हैं।"

राजकुमार ने उसके प्रस्ताव को मान लिया। कुछ कदम आगे बढ़ने पर पेड़ों के एक झुरमुट में उन्होंने डेरा डाला। पास में कुंआ था। उससे पानी लेकर स्नान किया। ताजा होकर खाना खाया। वजीर के लड़के ने कहा, "मैं बहुत थक गया हूं। आज की रात मैं खूब सोऊंगा, आप पहरा देना।"

राजकुमार बोला, "ठीक है!"

दोनों अपने-अपने बिस्तरों पर लेट गये। पर थके होने पर भी वजीर के लड़के की आंख नहीं लगी। वह चुपचाप बिस्तर पर पड़ा रहा। राजकुमार थोड़ी देर चौकीदारी करके जैसी ही बिस्तर पर लेटा कि नींद ने आकर उसे घेर लिया। वह सो गया।

वजीर के लड़के ने यह देखा तो उसे बड़े गुस्सा आया, पर वह कर क्या सकता था। राजकुमार राजा का बेटा था और वह उसका चाकर था। राजकुमार की रक्षा करना उसका कर्तव्य था और इसी के लिए वह उसके साथ आया था।

जैसे-तैसे सवेरा हुआ। वजीर के लड़के ने राजकुमार को जगाया। आंखें मलता राजकुमार उठा और दिन के उजाले को लक्ष्य करके बोला, "मैंने बहुत कोशिश की कि जागता रहूं, पर मैं इतना थक गया था कि न चाहते हुए भी मेरी पलकें भारी हो गईं और नींद ने मुझे अपनी गोद में ले लिया।"

वजीर के लड़के को उस पर अब क्रोध नहीं, दया आई और उसने कहा, "कोई बात नहीं है।"

फिर राजकुमार का दिल रखने के लिए मुस्करा कर कहा, "ईश्वर को धन्यवाद दो कि रात को कोई दुर्घटना नहीं हुई। अनजानी जगह का आखिर क्या भरोसा कि कब क्या हो जाये!"

तैयार होकर वे फिर आगे बढ़े।

चलते-चलते काफी समय हो गया। आगे उन्हें एक नगर दिखाई दिया। उसे देखकर वजीर के लड़के का माथा ठनका। राजकुमार तो भूल गया था, पर उसे याद था। परियों की राजकुमारी ने कहा था कि रास्ते में जादू की एक नगरी पड़ेगी। हो न हो, यह वहीं नगरी है। उसने राजकुमार से कहा, "हम इस नगरी के किनारे के रास्ते से निकल चलें। बस्ती में न जायें।"

राजकुमार ने तुनककर कहा, "इतने दिनों से हम जंगलों और मैदानों में घूम रहे हैं। जैसे-तैसे तो एक नगर आया है और तुम कहते हो, इससे बचकर निकल चलें! नहीं, यह नहीं होगा।"

राजकुमार की इच्छा के आगे वजीर का लड़का झुक गया और दोनों ने नगरी में प्रवेश किया।

नगरी की बनावट और सजावट को देखकर राजकुमार मुग्ध रह गया। बोला, "वाह, ऐसी नगरी को देखने के आनंद से तुम वंचित होना चाहते थे! ऐसे घर, ऐसे महल, ऐसे बाग-बगीचे, कहां देखने को मिलते हैं?"

अपने-अपने घोड़ों पर सवार दोनों नगर के भीतर बढ़ते गये। अकस्मात् भांति-भांति के फूलों और लता-गुल्मों से सजे एक बगीचे को देखकर राजकुमार अपने घोड़े पर से उतर पड़ा और बगीचे की शोभा को निहारने लगा। तभी सामने के घर से एक बुढ़िया दौड़ी आई और राजकुमार से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। रोना रुका तो बोली, "मेरे बेटे, तुम कहां चले गये थे?"

राजकुमार भौंचक्का-सा रह गया। यह माजरा क्या है? उसने बुढ़िया की बांहों से अपने को छुड़ाने की कोशिश की, पर बुढ़िया ने उसे इतना जकड़ रखा था कि वह अपने को छुड़ा नहीं पाया। बुढ़िया फिर बिलखने लगी।

राजकुमार को उस पर दया आ गई। बोला, "तुम चाहती क्या हो?"

सिसकते हुए बढ़िया ने कहा, "थोड़ी-सी देर को मेरे घर के भीतर चलो।"

इतना कहकर उसने राजकुमार का हाथ पकड़ लिया।

अपना पीछा छुड़ाने के लिए राजकुमार उसके घर जाने को तैयार हो गया। वजीर के बेटे ने मना किया, पर वह नहीं माना। उसने वजीर के लड़के से कहा, "तुम यहीं रहो, मैं अभी आता हूं।"

इतना कहकर वह बुढ़िया के साथ चल दिया। सामने के घर का दरवाजा खुला था। ज्योंही वे अंदर घुसे कि दरवाजा बंद हो गया।

संबंधित कड़ियाँ[edit]

  1. राजकुमार की प्रतिज्ञा
    1. राजकुमार की प्रतिज्ञा १
    2. राजकुमार की प्रतिज्ञा २
    3. राजकुमार की प्रतिज्ञा ३
    4. राजकुमार की प्रतिज्ञा ४
  2. यशपाल जैन

बाहरी कडियाँ[edit]