मुकदमे की तैयारी

From Wikisource
Jump to: navigation, search

< मुख्य पृष्ठ:हिन्दी

मोहन दास करमचंद गाँधी की आत्मकथा

सत्य के प्रयोग

मुकदमे की तैयारी

प्रिटोरिया मे मुझे जो एक वर्ष मिला, वह मेरे जीवन का अमूल्य वर्ष था । सार्वजनिक काम करने की अपनी शक्ति का कुछ अंदाज मुढे यहाँ हुआ । उसे सीखने का अवसर यहीं मिला । मेरी धार्मिक भावना अपने-आप तीव्र होने लगी । और कहना होगा कि सच्ची वकालत भी मै यहीं सीखा । नया बारिस्टर पुराने बारिस्टर के दफ्तर में रहकर जो बाते सीखता है , सो मैं यही सीख सका । यहाँ मुझमे यह विश्वास पैदा हुआ कि वकील के नाते मैं बिल्कुल नालायक नहीं रहूँगा । वकील बनने की कुंजी भी यहीं मेरे हाथ लगी ।

दादा अब्दुल्ला का मुकदमा छोटा न था । चालीस हजार पौंड का यानी छह लाख रुपयों का दावा था । दावा व्यापार के सिलसिले मे था , इसलिए उसमे बही-खाते की गुत्थियाँ बहुत थी । दावे का आधार कुछ तो प्रामिसरी नोट पर और कुछ प्रामिसरी नोट लिख देने के वचन पलवाने पर था । बचाव यह था कि प्रामिसरी नोट धोखा देकर लिखवाये गये थे और उनका पूरा मुआवजा नहीं मिला था । इसमे तथ्य और कानून की गलियाँ काफी थी । बही-खाते की उलझनें भी बहुत थी ।

दोनो पक्षो ने अच्छे से अच्छे सॉलिसिटर और बारिस्टर किये थे , इसलिए मुझे उन दोनो के काम का अनुभव मिला । सॉलिसिटर के लिए वादी का तथ्य संग्रह करने का सारा बोझ मुझ पर था । उसमें से सॉलिसिटर कितना रखता हैं और सॉलिसिटर द्वारा तैयार की गयी सामग्री का उपयोग करता हैं , सो मुझे देखने को मिलता था । मै समझ गया कि इस केस को तैयार करने मे मुझे अपनी ग्रहण शक्ति का और व्यवस्था -शक्ति का ठीक अंदाज हो जाएगा ।

मैंने केस मे पूरी दिलचस्पी ली । मै उसमे तन्मय हो गया । आगे-पीछे के सब कागज पढ़ गया । मुवक्किल के विश्वास की और उसकी होशियारी की सीमा न थी । इससे मेरा काम बहुत आसान हो गया । मैने बारीकी से बही-खाते का अध्ययन कर लिया । बहुत से पत्र गुजराती मे थे । उनका अनुवाद भी मुझे ही करना पड़ता था । इससे मेरी अनुवाद करने की शक्ति बढी ।

मैने कड़ा परिश्रम किया । जैसा कि मैं ऊपर लिख चुका हूँ, धार्मिक चर्चा आदि में और सार्वजनिक काम नें मुझे खूब दिलचस्पी थी और मै उसमे समय भी देता था , तो भी वह मेरे निकट गौण थी । मुकदमे की तैयारी को मैं प्रधानता देता था । इसके लिए कानून का या दूसरी पुस्तको का अध्ययन आवश्यक होता , तो मै उसे हमेशा पहले कर लिया करता था । परिणाम यह हुआ कि मुकदमे के तथ्यों पर मुझे इतना प्रभुत्व प्राप्त हो गया जिनता कदाचित् वादी-प्रतिवादी को भी नही था , क्योकि मेरे पास तो दोनो के ही कागज पत्र रहते थे ।

मुझे स्व. मि. पिकट के शब्द याद आये । उनका अधिक समर्थन बाद में दक्षिण अफ्रीका के सुप्रसिद्ध बारिस्टर स्व. मि. लेनर्ड ने एक अवसर पर किया था । मि. पिकट का कथन था , 'तथ्य तीन-चौथाई कानून हैं ।' एक मुकदमे में मैं जानता था कि न्याय तो मुवक्किल की ओर ही हैं, पर कानून विरुद्ध जाता दीखा । मै निराश हो गया और मि. लेनर्ड की मदद लेने दौड़ा । तथ्य ती दृष्टि से केस उन्हे भी मजबूत मालूम हुआ । उन्होने कहा, 'गाँधी, मै एक बात सीखा हूँ, और वह यह कि यदि हम तथ्यों पर ठीक-ठीक अधिकार कर ले, तो कानून अपने आप हमारे साथ हो जायेगा । इस मुकदमे के तथ्य हम समझ ले ।' यों कहकर उन्होंने मुझे एक बार फिर तथ्यों को पढ़-समझ लेने और बाद मे मिलने की सलाह दी । उन्हीं तथ्यों को फिर जाँचने पर , उनका मनन करने पर मैने उन्हें भिन्न रुप में समझा और उनसे सम्बन्ध रखने वाले एक पुराने मुकदमे का भी पता चला , जो दक्षिण अफ्रीका में चला था । मैं हर्ष-विभोर होकर मि. लेनर्ड के यहाँ पहुँचा । वे खुश हुए और बोले, 'अच्छा, यह मुकदमा हम जरुर जीतेंगे । जरा इसका ध्यान रखना होगा कि मामला किस जज के सामने चलेगा। '

दादा अब्दुल्ला के केस की तैयारी करते समय मैं तथ्य की महिमा को इस हद तक नहीं पहचान सका था । तथ्य का अर्थ है, सच्ची बात । सचाई पर डटे रहने से कानून अपने-आप हमारी मदद पर आ जाते हैं ।

अन्त मैने दादा अब्दुल्ला के केस में यह देख लिया था कि उनका पक्ष मजबूत हैं । कानून को उनकी मदद करनी ही चाहिये ।

पर मैने देखा कि मुकदमा लड़ने मे दोनो पक्ष, जो आपस में रिश्तेदार हैं और एक ही नगर के निवासी हैं, बरबाद हो जायेंगे । कोई कर नही सकता था कि मुकदमे का अन्त कब होगा । अदालत मे चलता रहे , तो उसे जितना चाहो उतना लम्बा किया जा सकता था । मुकदमे को लम्बा करने मे दो मे से किसी पक्ष का भी लाभ न होता । इसलिए संभव हो तो दोनो पक्ष मुकदमे का शीध्र अन्त चाहते थे ।

मैंने तैयब सेठ से बिनती की । झगडे को आपस में ही निबटा लेने की सलाह दी । उन्हें अपने वकील से मिलने को कहा । यदि दोनो पक्ष अपने विश्वास के किसी व्यक्ति को पंच चुन ले , तो मामला झटपट निबट जाये । वकीलो का खर्च इतना अधिक बढ़ता जा रहा था कि उसमे उनके जैसे बड़े व्यापारी भी बरबाद हो जाते । दोनो इतनी चिन्ता के साथ मुकदमा लड़ रहे थे कि एक भी निश्चिन्त होकर दूसरा कोई काम नहीं कर सकता था । इस बीच आपस में बैर भी बढ़ता ही जा रहा था । मुझे वकील के धंधे से धृण हो गयी । वकील के नाते तो दोनों वकीलो को अपने-अपने मुवक्किल को जीतने के लिए कानून की गलियाँ ही खोज कर देनी था । इस मुकदमे मे पहले-पहल मैं यह जाना कि जीतने वालो को भी पूरा खर्च कभी मिल ही नही सकता । दूसरे पक्ष से कितना खर्च बसूल किया जा सकता हैं , इसकी एक मर्यादा होती हैं , जब कि मुवक्किल का खर्च उससे कही अधिक होता हैं । मुझे यह सब असह्य मालूम हुआ । मैने तो अनुभव किया कि मेरा धर्म दोनो की मित्रता साधना और दोनो रिश्तेदारों में मेल करा देना है । मैने समझौते के लिए जी-तोड़ मेहनत की । तैयब सेठ मान गये । आखिर पंच नियुक्त हुए । उनके सामने मुकदमा चला । मुकदमे मे दादा अब्दुल्ला जीते ।

पर इतने से मुझे संतोष नही हुआ । यदि पंच के फैसले पर अमल होता , तो तैयब हाजी खानमहम्मद इतना रुपया एक साथ दे ही नहीं सकते थे । दक्षिण अफ्रीका में बसे हुए पोरबन्दर मे मेमनों मे आपस का ऐसा एक अलिखित नियम था कि खुद चाहे मर जाये . पर दिवाला न निकाले । तैयब सेठ सैतींस हजार पौंड एक मुश्त दे ही नही सकते थे । उन्हे न तो एक दमड़ी कम देनी थी और न दिवाला ही निकालना था । रास्ता एक ही था कि दादा अब्दुल्ला उन्हे काफी लम्बी मोहलत दे । दादा अब्दुल्ला ने उदारता से काम लिया और खूब लम्बी मोहलत दे दी । पंच नियुक्त कराने में मुझे जितनी मेहनत पड़ी, उससे अधिक मेहनत यह लम्बी अवधि निश्चित कराने मे पड़ी । दोनो पक्षो को प्रसन्नता हुई । दोनो की प्रतिष्ठा बढी । मेरे संतोष की सीमा न रही । मैं सच्ची वकालत सीखा , मनुष्य के अच्छे पहलू को खोचना सीखा और मनुष्य हृदय मे प्रवेश करना सीखा । मैंने देखा कि वकील का कर्तव्य दोनो पक्षो के बीच खुदी हुई खाई को पाटना हैं । इस शिक्षा ने मेरे मन मे ऐसी जड़ जमायी कि बीस साल की अपनी वकालत का मेरा अधिकांश समय अपने दफ्तर में बैठकर सैकड़ो मामलो को आपस मे सुलझाने मे ही बीता । उसमे मैने कुछ खोया नही । यह भी नही कहा जा सकता कि मैंने पैसा खोया । आत्मा तो खोयी ही नही ।