महारानी अहिल्याबाई / बैजनाथ महोदय

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महारानी अहिल्याबाई / बैजनाथ महोदय

अहिल्याबाई के पिता मानकोजी शिंदे एक मामूली किंतु संस्कारवाले आदमी थे। इन्दौर राज्य के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होल्कर के लड़के खण्डेराव के साथ सन १७३५ मे अहिल्याबाई जब सयानी हुई तो उन्हे अनुमान हुआ कि उनके ससुर कितने महान है। उन्होने बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को जगाया। कुछ ही दिनो मे अपने महान पिता के मार्गदर्शन में खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गये। मल्हारराव को भी देखकर संतोष होने लगा। पुत्र-वधू अहिल्याबाई को भी वह राजकाज की शिक्षा देते रहते थे। उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते थे।

सन १७४५ मे अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई रखा।

एक बार मल्हरराव राजस्थान में चौथ वसूल करने के लिए घूम रहे थे। साथ मे खण्डेराव भी थे। बढ़ते-बढ़ते भरतपुर के पास डींग पहुंचे। वहां के जाट उनका मुकाबला करने के लिए खड़े हो गये। घनघोर युद्ध हुआ। एकाएक खण्डेराव के गोली लगी और वह वही वीरगति को प्राप्त होगये। मल्हाराव जरा दूर लड़ रहा थे। उन्हे जैसे ही यह समाचार मिला, उन पर मानो वज्रपात हो गया। लड़ाई वही समाप्त हो गईं। सुलह का झण्डा खड़ा कर दिया और वह खण्डेराव के पास पहुंचे। लडके के शव को देखकर विह्वल हो गये।

अहिल्याबाई के दु:ख का पारावार नही था। वह उनके साथ सती होने को तैयार हो गई। मल्हारराव ने उन्हें समझाते हुए कहा, "बेटी, मैं इन दो-दो दुखो को कैसे सह सकूगां? कैसे जीऊंगा? और कही मैं भी चला तो इन बच्चों को कौन संभालेगा? फिर हमने यह जो इतना राज्य फैलाया है, उसका क्या होगा? नही, जो कदम आगे बढाया है, उसे पीछे नही हटाया जा सकता। मेरे लिए तू खण्डेराव से कम नही। हम स्वराज्य के काम को बीच मे नही छोड़ सकते।'

दुखी ससुर को ढाढ़स देनेके लिए अहिल्याबाई ने अपना आग्रह छोड़ दिया और वह बेटे जैसा बन कर हर तरह से अपने ससुर की आज्ञा का पालन और उनकी मदद करने लग गई।

मल्हारराव होल्कर इसके बाद कोई बीस साल जिये। परंतु अहिल्याबाई ने कभी उनको यह अनुभव नही होने दिया कि वह एक पुत्र से किसी प्रकार भी कम हैं। मल्हारराव के साथ् रहकर वह सेना, रसद, प्रजा का सुख और सुरक्षा, शत्रुओ की हलचलें ओर साधरण राजकाज, सबका बराबर ध्यान रखती और साथ ही सेना की अगली हलचलों, युद्धो की चीजो का निश्चित स्थानों पर पहुचाने और तैयार रखने आदि के बारे में मल्हारराव की सूचनाओं को बहुत सावधानी ओर समझदारी से पूरा करती।

मल्हारराव एक वीर योद्धा ही नही थे, मराठा-साम्राज्य के वह एक मजबूत स्तंभ भी थे। उनकी निगाह केवल राज्य का विस्तार करने पर ही नही रहती थी, वह प्रजा के पालन मे भी उतने ही होशियार थे। युद्धो मे जहां शत्रुओ पर वह सिंह की तरह टूट पड़ते, वहां युद्ध समाप्त हो जाने के बाद एक चतुर शासक की भांति जीते हुए प्रदेश का प्रबंध करते और वहां की प्रजा को हर तरह की सुविधाएं भी देते थे। बीस बरस तक अपने महान ससुर की छत्रछाया और मार्गदर्शन में अहिल्याबाई ने इन गुणों को पूरी तरह ग्रहण कर लिया था। यही नहीं, स्वभाव से वह बड़ीधार्मिक थी और परमार्थ से उन्हे बहुत प्रेम था। इन सब गुणो के मिल जाने से उनका व्यक्तित्व और भी अधिक महान बन गया।

सूबेदार मल्हारराव का २० मई १७६६ को आलमपुर (झांसी के निकट) मे देहान्त हो गया। उनके मरने के दो महीने बाद मालेराव को राजतिलक हुआ। राजतिलक के कुछ ही महीने बाद मालेराव अचानक बीमार पड़े और सन १७६७ मे उनकी मृत्यु होगई।

अहिल्याबाई ने अपने-आपको संभाला और बड़ी मजबूती से उन्होने शासन का सूत्र अपने हाथो मे ले लिया। प्रजा के लोग तो यह चाहते ही थे, क्योकि वे उनके गुणो से परिचित थे।

शासन की बागडोर जब अहिल्याबाई ने अपने हाथ मे ली, राज्य में बड़ी अशांति थी। चोर, डाकू आदि के उपद्रवों से लोग बहुत तंग थे। ऐसी हालत मे उन्होने देखा कि राजा का सबसे पहला कर्त्तव्य उपद्रव करनेवालों को काबू मे लाकर प्रजा को निर्भयता और शांति प्रदान करना है। उपद्रवों में भीलों का खास हाथ था। उन्होने दरबार किया और अपने सारे सरदारों और प्रजा का ध्यान इस ओर दिलाते हुए घोषणा की—"जो वीर पुरूष इन उपद्रवी लोगो को काबू मे ले आवेगा, उसके साथ मैं अपनी लड़की मुक्ताबाई की शादी कर दूंगी।"

इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे नामक एक युवक उठा और उसने बड़ी नम्रता से अहिल्याबाई से कहा कि वह यह काम कर सकता है। महारानी बहुत प्रसन्न हुई। यशंवंतराव अपने काम मे लग गये और बहुत थोडे समय मे उन्होंने सारे राज्य मे शांति की स्थापना कर दी। महारानी ने बड़ी प्रसन्नता और बड़े समारोह के साथ मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव फणसे से कर दिया।

इसके बाद अहिल्याबाई का ध्यान शासन के भीतरी सुधारों की तरफ गया। राज्य मे शांति और सुरक्षा की स्थापना होते ही व्यापार-व्यवसाय और कला-कौशल की बढ़ोतरी होने लगी ओर लोगो को ज्ञान की उपासना का अवसर भी मिलने लगा। नर्मदा के तीर पर महेश्वरी उनकी राजधानी थी। वहां तरह-तरह के कारीगर आने लगे ओर शीघ्र ही वस्त्र्-निर्माण का वह एक सुंदर केंद्र बन गया।

समस्त राज्य की लगान-पद्धति को सुधार कर उसकी नियमत वसूली का प्रबन्ध भी उन्होने कर दिया।

राज्य के विस्तार को व्यवस्थित करके उसे तहसीलों और जिलों में बांट दिया गया ओर प्रजा की तथा शासन की सुविधा को ध्यान मे रखते हुए तहसीलों और जिलों के केद्र कायम करके जहां-जहां आवश्यक प्रतीत हुई, न्यायालयों की स्थापना भी कर दी गई। राज्य की सारी पंचायतों के काम को व्यवस्थित किया और न्याय पाने की सीढियां बना दी गईं। आखिरी अपील मंत्री सुनते। परंतु यदि उनके फैसले से किसी को संतोष न होता तो महारानी खुद भी अपील सुनती।

अहिल्याबाई ने नये प्रदेश बढ़ाने की इच्छा नही की, बल्कि जो प्रदेश था उसी को संभालते हुए अपनी प्रजा को सुखी रखना उन्होने अपना लक्ष्य बना लिया। अपने इस काम के लिए काफी सेना रख ली। सेना को वे सदा संतुष्ट रख्ती। अहिल्याबाई के राज्य में स्त्रियों की भी एक पलटन थी। अनेक किले बनाकर बिखरे हुए राज्य को सुरक्षित रखने के लिए स्थान-स्थान पर उनहोने सेना तैनात कर दी थी।

मल्हारराव के भाई-बंदों मे तुकोजीराव होल्कर एक विश्वासपात्र युवक थे। मल्हारराव ने उन्हे भी सदा अपने साथ मे रखा था और राजकाज के लिए तैयार कर लिया था। अहिल्याबाई ने इन्हें अपना सेनापति बनाया और चौथ वसूल करने का काम उन्हे सौप दिया। यों उम्र मे वह अहिल्याबाई से बड़े थे, परंतु तुकोजी उन्हें अपनी माता के समान ही मानते थे ओर राज्य का काम पूरी लगन ओर सचाई के साथ करते थे। अहिल्याबाई का उन पर इतना प्रेम और विश्वास था कि वह भी उन्हें पुत्र जैसा मानती थीं। राज्य के कागजों मे जहां कही उनका उल्लेख आता है वहां तथा मुहरों मे भी खंडोजी सुत तुकोजी होल्कर इस प्रकार कहा गया है।

अहिल्याबाई की प्रजा पूर्ण सुख और शांति का उपभोग कर रही थी। उनके राज्य मे बलवान और धनवान निर्बलों और निर्धनो को सता नही सकते थे। सबको न्याय मिलता था। धार्मिक भेद-भाव का नाम-निशान न था। हिंदू-मुसलमानों मे कोईभेद-भाव नही था। महारानी पर सब समान रूप से श्रद्धा रखते थे। धनवान लोग निपूते मर जाते तब उनकी विधवाओं से अहिल्याबाई कहती थी कि वे किसी बच्चे को गोद लेकर अपना वंश चलावें। ऐसे कई उदाहरण कागजो से मिले है। जब धनी पुरूष की विधवाओ ने किसी को गोद लेने से इंकार कर दिया और उन्होने महारानी से ही आग्रह किया कि वे सरकारी कोष मे उनके धन को ले ले। परन्तु उस समय भी उस धन को सरकारी कोष मे जमा करन के बजाय अहिल्याबाई ने उनकी तरफ से उसे मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशाला, घाट, पुल, सड़क आदि बनवाने के अच्छे कामों मे लगवा दिया। रिश्वतखोर और भ्रष्ट अधिकारियों को उन्होने उचित दंड देने मे कभी देरी नही की।

उनका सारा जीवन वैराग्य, कर्त्तव्य-पालन और परमार्थ की साधना का बन गया। भगवान शकंर की वह बड़ी भक्त थी। बिना उनके पूजन के मुंह में पानी की बूंद नही जाने देती थी। सारा राज्य उन्होने शंकर को अर्पित कर रखा था और आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी।"संपति सब रघुपति के आहि"—सारी संपत्ति भगवान की है, इसका भरत के बाद प्रत्यक्ष और एकमात्र उदाहरण शायद वही थीं। राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नही लिखती थी। नीचे केवल श्रीशंकर लिख देती थी। उनके रूपयो पर शंकर का लिंग और बिल्व पत्र का चित्र अंकित है ओर पैसो पर नंदी का। तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक इंदौर के सिहासन पर जितने नरेश उनके बाद मे आये सबकी राजाज्ञाएं श्रीशंकर आज्ञा जारी नही होती, तब तक वह राजाज्ञा नही मानी जाती थी ओर उस पर अमल नही होता था।

अहिल्याबाई का रहन-सहन बिल्कुल सादा था। शुद्ध सफेद वस्त्र धारण करती थीं। जेवर आदि कुछ नही पहनती थी। भगवान की पूजा, अच्छे ग्रंथों का सुनना ओर राजकाज आदि मे नियमित रहती कि रात को देर तक जग-जगकर भी वह अपने सामने का काम निपटा देती।

अहिल्याबाई का महल बिल्कुल सादा था। उसकी रचना अवश्य ऐसी जगह पर की गई है, जहां का दृश्य बहुत ही भव्य ओर मन पर असर डालने वाला है।

अहिल्याबाई एक राज्य की महारानी थी ओर इस कारण प्राप्त कर्तव्यों का पालन वह बड़ी होशियारी के साथ करती थी। परंतु स्वभाव से वह एक भक्त और साध्वी नारी थी। उनका चित्त हमेशा भगवान के चरणो मे लगा रहता और इनके संपूर्ण चिंतन का विषय यही रहता कि दीन-दुखियों का कष्ट दूर कैसे हो तथा भक्तजन निश्चित होकर भगवतचिंतन किस प्रकार कर सकें। इस हेतु महेश्वर मे नित्य दान, धर्म, पुराण, कीर्तन होते रहते थे। उनके कुल-देवता भगवान मल्लारि (कृष्ण) और मार्तण्ड (सूर्य) थें, परंतु उनकी अपनी लौ भगवान शंकर के चरणो में लगी रहती थी। रोज सैकड़ो ब्राह्मण पूजा मे लीन रहते, जिन्हे प्रतिदिन अन्नसत्र मे भोजन करवाया जाता। राज्य के सारे मुख्य-मुख्य मंदिरों में भजन, पूजन, कीर्तन ओर पुराणों के नियमित पाठ का प्रबंध उनकी तरफ से रहता था और इन सबके खर्च से वह करती रहती। यही नही, राज्य के बाहर जितने भी प्रमुख हिंदू तीर्थ थे, प्राय: उन सभी स्थानों पर मंदिर, घाट, अन्न-सत्र पूजन कीर्तन आदि कोई-न-कोई पारमार्थिक प्रवृत्ति उनकी ओर से आज तक जारी है। काशी, प्रयाग, गया, जगन्नाथपुरी, द्वारका, रामेश्वर, बदरी-केदार, हरिद्वार, मतलब यह कि ऐसे हर तीर्थ मे उन्होने कोई-न-कोई पवित्र काम किया है।

अहिल्याबाई का घरेलू जीवन बहुत ही दुखमय रहा। युवावस्था के प्रारभ मे ही पति वियोग हो गय। उसके बाद ससुर चले गये। फिर पुत्र भी छोड़कर चला गया। केवल लड़की-दामाद बच गये थे ओर उनका एक बच्चा था नत्थू। बच्चे को सदा अपने पास रखती ओर बहुत प्यार करती। नत्थू का उन्होने विवाह कर दिया ओर उसे धीरे-धीरे राज-काज की शिक्षा देने लगी। परंतु वह एकाएक बीमार हो गया ओर चल बसा।

मुक्ताबाई ओर यशवंतराव का एक एकमात्र बच्चा था। उसकी मृत्यु से उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया। वे इतने शोक-विह्वल हो गये कि फिर संभल न सके। पिता यशवंतराव का ३ दिसम्बर सन १७९१ को मृत्यु हो गई। मुक्ताबाई नर्मदा के तट पर अपने पति के साथ सती हो गई।

राज्य की चिंता का भार और उस पर प्राणो से भी प्यारे लोगो का वियोग। इस सारे शोक-भार को अहिल्याबाई का शरीर अधिक नही संभाल सका। १३ अगस्त सन १७९५ को उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई।

संबंधित कड़ियाँ[edit]

  1. हमारी आदर्श नारियां
    1. झांसी की रानी / ओंकारनाथ श्रीवास्तव
    2. देशभक्त अज़ीज़न / शकंर बाम
    3. महारानी अहिल्याबाई / बैजनाथ महोदय
    4. राष्ट्रमाता कस्तूरबा गांधी / (संकलन) मोहनदास करमचन्द गांधी
  2. बैजनाथ महोदय

बाहरी कडियाँ[edit]