ब्रह्मचर्य -2

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मोहन दास करमचंद गाँधी की आत्मकथा

सत्य के प्रयोग

ब्रह्मचर्य -2

अच्छी तरह चर्चा करने और गहराई से सोचने के बाद सन् 1906 मे मैने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया । व्रत लेने के दिन तक मैने धर्मपत्नी के साथ सलाह नहीं की थी, पर व्रत लेते समय की । उसकी ओर से मेरा कोई विरोध नही हुआ ।

यह व्रत मेरे लिए बहुत कठिन सिद्ध हुआ । मेरी शक्ति कम थी । मै सोचता , विकारो को किस प्रकार दबा सकूँगा । अपनी पत्नी के साथ विकारयुक्त सम्बन्ध का त्याग मुझे एक अनोखी बात मालूम होती थी । फिर भी मै यह साफ देख सकता था कि यही मेरा कर्तव्य हैं । मेरी नीयत शुद्ध थी । यह सोचकर कि भगवान शक्ति देगा , मैं इसमे कूद पड़ा ।

आज बीस बरस बाद उस व्रत का स्मरण करते हुए मुझे सानन्द आश्चर्य होता हैं । संयम पालने की वृत्ति तो मुझ में 1901 से ही प्रबल थी, और मै संयम पाल भी रहा था, पर जिस स्वतंत्रता और आनन्द का उपभोग मै अब करने लगा, सन् 1906 के पहले उसके वैसे उपयोग का स्मरण मुझे नही हैं । क्योकि मैं उस समय वासना-बद्ध था, किसी भी समय उसके वश हो सकता था । अब वासना मुझ पर सवारी करने मे असमर्थ हो गयी ।

साथ ही, मैं अब ब्रह्यचर्य ती महिमा को अधिकाधिक समझने लगा । व्रत मैने फीनिक्स मे लिया था । घायलो की सेवा-शुश्रूषा के काम से छूटी पाने पर मैं फीनिक्स गया था । वहाँ से मुझे तुरन्त जोहानिस्बर्ग जाना था । मैं वहाँ गया और एक महीने के अन्दर ही सत्याग्रह की लड़ाई का श्रीगणेश हुआ । मानो ब्रह्मचर्य व्रत मुझे उसके लिए तैयार करने ही आया हो ! सत्याग्रह की कोई कल्पना मैने पहले से करके नही रखी थी । उसकी उत्पत्ति अनायास, अनिच्छापूर्वक ही हुई । पर मैने देखा कि उससे पहले के मेरे सारे कदम - फीनिक्स जाना , जोहानिस्बर्ग का भारी घरखर्च कम कर देना और अन्त मे ब्रह्मचर्य व्रत लेना - मानो उसकी तैयारी के रुप में ही थे ।

ब्रह्यचर्य के सम्पूर्ण पालन का अर्थ हैं , ब्रह्मदर्शन । यह ज्ञान मुझे शास्त्र द्वारा नही हुआ । यह अर्थ मेरे सामने क्रम-क्रम से अनुभव सिद्ध होता गया । उससे सम्बन्ध रखनेवाले शास्त्रवाक्य मैने बाद मे पढ़े । ब्रह्मचर्य में शरीर-रक्षण, बुद्धि-रक्षण औऱ आत्म का रक्षण समाया हुआ है , इसे मै व्रत लेने के बाद दिन-दिन अधिकाधिक अनूभव करने लगा । अब ब्रह्मचर्य को एक घोर तपश्चर्य के रुप मे रहने देने के बदले उसे रसमय बनाना था , उसी के सहारे निभना था, विशेषताओं के मुझे नित-नये दर्शन होने लगे ।

इस प्रकार यद्यपि मै इस व्रत मे से रस लूट रहा था , तो भी कोई यह माने कि मैं उसकी कठिनाई का अनूभव नही करता था । आज मुझे छप्पन वर्ष पूरे हो चुके हैं , फिर भी इसकी कठिनता का अनुभव तो मुझे होता ही हैं । यह एक असिधारा-व्रत है, इसे मै अधिकाधिक समझ रहा हूँ और निरन्तर जागृति की आवश्यकता का अनुभव करता हूँ ।

ब्रह्मचर्य का पालन करना हो तो स्वादेन्द्रिय पर प्रभुत्व प्राप्त करना ही चाहिये । मैने स्वयं अनुभव किया है कि यदि स्वाद को जीत लिया जाय, तो ब्रह्मचर्य का पालन बहुत सरल हो जाता है । इस कारण अब से आगे के मेरे आहार-संबंधी प्रयोग केवल अन्नाहार की दृष्टि से नही, बल्कि ब्रह्मचर्य की दृष्टि से होने लगे । मैने प्रयोग करके अनुभव किया कि आहार थोडा, सादा , बिना मिर्च-मसाले और प्राकृतिक स्थिति वाला होना चाहिये । ब्रह्मचारी का आहार वनपक्व फल है , इसे अपने विषय मे तो मैने छह वर्ष तक प्रयोग करके देखा है । जब मै सूखे और हरे वन-पक्व फलो पर रहता था, तब जिस निर्विकार अवस्था का अनुभव मैने किया , वैसा अनुभव आहार मे परिवर्तन करके के बाद मुझे नहीं हुआ । फलाहार के दिनो मे ब्रह्मचर्य स्वाभाविक हो गया था । दुग्धाहार के कारण वह कष्ट-साध्य बन गया है । मुझे फलाहार से दुग्धाहार पर क्यो जाना पड़ा, इसकी चर्चा मै यथास्थान करुँगा । यहाँ तो इतना कहना काफी हैं कि ब्रह्मचारी के लिए दूध का आहार व्रत पालन मे बाधक हैं , इस विषय मे मुझे शंका नही हैं । इसका कोई यह अर्थ न करे कि ब्रह्मचारी मात्र के लिए दूध का त्याग इष्ट हैं । ब्रह्मचर्य पर आहार का कितना प्रभाव पड़ता हैं, इसके संबंध मे बहुत प्रयोग करने की आवश्यकता हैं । दूध के समान स्नायु-पोषक और उतनी ही सरलता से पचने वाला फलाहार मुझे अभी तक मिला नही , और न कोई वैद्य, हकीम या डॉक्टर ऐसे फलो अथवा अन्न की जानकारी दे सका हैं । अतएव दूध को विकारोत्पादक वस्तु जानते हुए भी मैं उसके त्याग की सलाह अभी किसी को नही दे सकता ।

बाह्य उपचारो मे जिस तरह के आहार के प्रकार और परिमाण की मर्यादा आवश्यक है , उसी तरह उपवास के बारे मे भी समझना चाहिये । इन्दियाँ इतनी बलबान हैं कि उन्हे चारो तरफ से , ऊपर से और नीचे से यो दसो दिशाओ से घेरा जाय तो ही वे अंकुश मे रहती हैं । सब जानते है कि आहार के बिना वे काम नही कर सकती । अतएव इन्द्रिय-दमन के हेतु से स्वेच्छा-पूर्वक किये गये उपवास से इन्द्रिय-दमन मे बहुत मदद मिलती है, इसमे मुझे कोई सन्देह नही । कई लोग उपवास करते हुए भी विफल होते हैं । उसका कारण यह हैं कि उपवास ही सब कुछ कर सकेगा , ऐसा मानकर वे केवल स्थूल उपवास करते हैं और मन से छप्पन भोगो का स्वाद लेते रहते हैं । उपवास की समाप्ति पर क्या खायेगे , इसके विचारो का स्वाद लेते रहते हैं , और फिर शिकायत करते हैं कि न स्वादेन्द्रिय का सयम सधा औऱ न जननेन्द्रिय का ! उपवास की सच्ची उपयोगिता वहीँ होती हैं जहाँ मनुष्य का मन भी देह-दमन मे साथ देता है । तात्पर्य यह है कि मन में विषय-भोग के प्रति विरक्ति आनी चाहिये । विषय की जड़े मन मे रहती हैं । उपवास आदि साधनो से यद्यपि बहुत सहायता मिलती हैं , फिर भी वह अपेक्षाकृत कम ही होती हैं । कहा जा सकता हो कि उपवास करते हुए भी मनुष्य विषयासक्त रह सकता हैं । पर बिना उपवास के विषयासक्ति को जड-मूल से मिटाना संभव नही हैं । अतएव ब्रह्मचर्य के पालन मे उपवास अनिवार्य अंग हैं ।

ब्रह्मचर्य का प्रयत्न करनेवाले बहुतेरे लोग विफल होते हैं , क्योकि वे खाने-पीने , देखने-सुनने इत्यादि मे अब्रह्मचारी की तरह रहना चाहते हुए भी ब्रह्मचर्य पालन की इच्छा रखते हैं । यह प्रयत्न वैसा ही कहा जायगा , जैसा गरमी मे जाड़े का अनुभव करने का प्रयत्न । संयमी और स्वैराचारी के, भोगी और त्यागी के जीवन मे भेद होना ही चाहिये । साम्य होता है , पर वह ऊपर से देखने-भर का । भेद स्पष्ट प्रकट होना चाहिये । आँख का उपयोग दोनो करते हैं । ब्रह्मचारी देव-दर्शन करता हैं , भोगी नाटक-सिनेमा मे लीन रहता है । दोना कान का उपयोग करते हैं । पर एक ईश्वर- भजन सुनता हैं , दूसरा विलासी गाने सुनने मे रस लेता हैं । दोनो जागरण करते हैं । पर एक जाग्रत अवस्था मे हृदय-मन्दिर मे विराजे हुए राम की आराधना करता हैं , दूसरे को नाच-गाने की घुन मे सोने का होश ही नही रहता । दोनो भोजन करते हैं । पर एक शरीर-रूपी तीर्थक्षेत्र को निबाहने -भर के लिए देह को भाड़ा देता हैं, दूसरा स्वाद के लिए देह मे अनेक वस्तुए भरकर उसे दुर्गन्ध का घर बना डालता हैं । इस प्रकार दोनो के आचार-विचार मे यह अन्तर दिन-दिन बढता जाता हैं, घटता नही ।

ब्रह्मचर्य का अर्थ हैं , मन-वचन से समस्त इन्द्रियो का संयम । इस संयम के लिए ऊपर बताये गये त्यागो की आवश्यकता हैं , इसे मै दिन-प्रतिदिन अनुभव करता रहा हूँ और आज भी कर रहा हूँ । त्याग के क्षेत्र की सीमा ही नही हैं , जैसे ब्रह्मचर्य की महिमा की कोई सीमा नही हैं । ऐसा ब्रह्मचर्य अल्प प्रयत्न से सिद्ध नही होता । करोड़ो लोगो के लिए वह सदा केवल आदर्श रुप ही रहेगा । क्योकि प्रयत्नशील ब्रह्मचारी अपनी त्रुटियों का नित्य दर्शन करेगा , अपने अन्दर ओने-कोने में छिपकर बैठे हुए विकारो को पहचान लेगा और उन्हे निकालने का सतत प्रयत्न करेगा । जब ते विचारो का इतना अंकुश प्राप्त नही होता कि इच्छा के बिना एक भी विचार मन मे न आये, तब तक ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नही कहा जा सकता । विचार-मात्र विकार हैं , मन को वश मे करना; और मन को वश वायु को वश मे करने से भी कठिन हैं । फिर भी यदि आत्मा हैं, तो यह वस्तु भी साध्य है ही । हमारे मार्ग मे कठिनाइयाँ आकर बाधा डालती हैं, इससे कोई यह न माने कि वह असाध्य हैं । और परम अर्थ के लिए परम प्रयत्न की आवश्यकता हो तो उसमे आश्चर्य ही क्या ।

परन्तु ऐसा ब्रह्मचर्य केवल प्रयत्न- साध्य नही हैं , इसे मैने हिन्दुस्तान मे आने के बाद अनुभव किया । कहा जा सकता है कि तब तक मैं मूर्च्छावश था । मैने यह मान लिया था कि फलाहार से विकार समूल नष्ट हो जाते हैं और मै अभिमान-पूर्वक यह मानता था कि अब मेरे लिए कुछ करना बाकी नही हैं ।

पर इस विचार के प्रकरण तक पहुँचने मे अभी देर हैं । इस बीच इतना कह देना आवश्यक हैं कि ईश्वर-साक्षात्कार के लिए जो लोग मेरी व्याख्या वाले ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं, वे यदि अपने प्रयत्न के साथ ही ईश्वर पर श्रद्धा रखने वाले हो, तो उनके निराशा का कोई कारण नही रहेगा ।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवजै रसो प्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।। गीता 2, 51 ।।

(निराहारी के विषय तो शान्त हो जाते है, पर उसकी वासना का शमन नही होता । ईश्वर-दर्शन से वासना भी शान्त हो जाती हैं ।)

अतएव आत्मार्थी के लिए रामनाम और रामकृपा ही अन्तिम साधन हैं , इस वस्तु का साक्षात्कार मैने हिन्दुस्तान मे ही किया ।