बिहारी की सरलता

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मोहन दास करमचंद गाँधी की आत्मकथा

सत्य के प्रयोग

बिहारी सरलता

मौलाना मजहरुल हक और मोहन दास करमचंद गाँधी एक समय लंदन मे पढते थे । उसके बाद बम्बई मे सन् 1915 की कांग्रेस मे मिले थे । उस साल वे मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे । उन्होने पुराना पहचान बताकर कहा था कि आप कभी पटना आये , तो मेरे घर अवश्य पधारिये । इस निमंत्रण के आधार पर मैने उन्हें पत्र लिखा और अपना काम बतलाया । वे तुरन्त अपनी मोटर लाये और मुझे अपने घर ले चलने का आग्रह किया । मैने उनका आभार माना और उनसे कहा कि जिस जगह मुझे जाना है वहाँ के लिए पहली ट्रेन से रवाना कर दे । रेलवे गाइड से कुछ पता नही चल सकता था । उन्होने राजकुमार शुक्ल से बाते की और सुझाया कि पहले मुझे मुजफ्फरपुर जाना चाहिये । उसी दिन मुजफ्फरपुर की ट्रेन जाती थी । उन्होने मुझे उसमे रवाना कर दिया । उन दिनो आचार्य कृपलानी मुजफ्फरपुर मे रहते थे । मै उन्हें जानता था । जब मै हैदराबाद गया था तब उनके महान त्याग की, उनके जीवन की और उनके पैसे से चलने वाले आश्रम की बात डॉ. चोइथराम के मुँह से सुनी थी । वे मुजफ्फरपुर कॉलेज मे प्रोफेसर थे । इस समय प्रोफेसरी छोड़ चुके थे । मैने उन्हे तार किया । ट्रेन आधी रात को मुजफ्फरपुर पहुँचती थी । वे अपने शिष्य-मंडल के साथ स्टेशन पर आये थे । पर उनके घरबार नही था । वे अध्यापक मलकानी के यहाँ रहते थे । मुझे उनके घर ले गये । मलकानी वहाँ के कॉलेज मे प्रोफेसर थे । उस समय के वातावरण मे सरकारी कॉलेज के प्रोफेसर का मुझे अपने यहाँ टिकाना असाधारण बात मानी जायेगी ।

कृपालानी जी ने बिहार की और उसमे भी तिरहुत विभाग की दीन दशा की बात की और मेरे काम की कठिनाई की कल्पना दी । कृपालानीजी ने बिहारवालो के साथ घनिष्ठ संबन्ध जोड़ लिया था । उन्होने उन लोगो से मेरे काम का जिक्र कर रखा था । सबेरे वकीलो का एक छोटा सा दल मेरे पास आया । उनमे से रामनवमीप्रसाद मुझ याद रह गये है । उन्होने अपने आग्रह से मेरा ध्यान आकर्षित किया था । उन्होने कहा, 'आप जो काम करने आये है, आपको तो हम-जैसो के यहाँ ठहरना चाहिये । गयाबाबू यहाँ के प्रसिद्ध वकील है । उनकी ओर से मै आग्रह करता हूँ कि आप उनके घर ठहरिये । हम सब सरकार से डरते जरूर है । लेकिन हमसे जितनी बनेगी उतनी मदद हम आपकी करेंगे । राजकुमार शुक्ल की बहुत सी बाते सच है । दुःख इस बात का है कि आज हमारे नेता यहाँ नही है । बाबू ब्रजकिशोरप्रसाद औऱ राजेन्द्रप्रसाद को मैने तार किये है । दोनो तुरन्त यहाँ आ जायेंगे और आपको पूरी जानकारी व मदद दे सकेंगे । मेहरबानी करके आप गयाबाबू के यहाँ चलिये ।'

इस भाषण से मै ललचाया । इस डर से कि कहीं मुझे अपने घर मे ठहराने से गयाबाबू कठिनाई मे न पड़ जाये , मुझे संकोच हो रहा था । पर गयाबाबू ने मुझे निश्चिन्त कर दिया ।

मै गयाबाबू के घर गया । उन्होने और उनके परिवारवालो ने मुझे अपने प्रेम से सराबोर कर दिया ।

ब्रजकिशोरबाबू दरभंगा से आये । राजेन्द्रबाबू पुरी से आये । यहाँ जिन्हे देखा वे लखनऊवाले ब्रजकिशोरप्रसाद नही थे । उनमे बिहारवासी की नम्रता, सादगी, भलमनसी , असाधारण श्रद्धा देखकर मेरा हृदय हर्ष से छलक उठा । बिहार के वकील मंडल का आदर भाव देखकर मुझे सानन्द आश्चर्य हुआ ।

इस मंडल के और मेरे बीच जीवनभर की गाँठ बंध गयी ।

ब्रजकिशोरबाबू ने मुझे सारी हकीकत की जानकारी दी । वे गरीब किसाने के लिए मुकदमे लड़ते थे । ऐसे दो मुकदमे चल रहे थे । इस तरह मुकदमो की पैरवी करके वे थोड़ा व्यक्तिगत आश्वासन प्राप्त कर लिया करते थे । कभी-कभी उसमे भी विफल हो जाते थे । इन भोले किसानो से फीस तो वे लेते ही थे । त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोरबाबू अथवा राजेन्द्रबाबू मेहनताना लेने मे कभी संकोच नही करते थे । उनकी दलील यह थी कि पेशे के काम मे मेहनताना न ले , तो उनका घरखर्च न चले और वे लोगो की मदद भी न कर सकें। उनके मेहनताने के और बंगाल तथा बिहार के बारिस्टरो को दिये जानेवाले मेहनताने के कल्पना मे न आ सकनेवाले आंकड़े सुनकर मेरा दम घुटने लगा ।

' ... साहब को हमने ओपिनियन (सम्मति) के लिए दस हजार रूपये दिये ।' हजारो के सिवा तो मैने बात ही न सुनी ।

इस मित्र मड़ली ने इस विषय मे मेरा मीठा उलाहना प्रेमपूर्वक सुन लिया । उसका उन्होने गलत अर्थ नही लगाया ।

मैने कहा, 'इन मुकदमो को पढ़ जाने के बाद मेरी राय तो यह बनी है कि अब हमे मुकदमे लड़ना ही बन्द कर देना चाहिये । ऐसे मुकदमो से लाभ बहुत कम होता है । यहाँ रैयत इतनी कुचली गई है , जहाँ सब इतने भयभीत रहते है , वहाँ कचहरियो की मारफत थोड़ा ही इलाज हो सकता है । लोगो के लिए सच्ची दवा तो उनके डर को भगाना है । जब तक यह तीन कठिया प्रथा रद्द न ही , तब तक हम चैन से बैठ ही नहीं सकते । मै तो दो दिन मे जितना देखा जा सके उतना देखने आया हूँ । लेकिन अब देख रहा हूँ कि यह काम तो दो वर्ष भी ले सकता है । इतना समय भी लगे तो मै देने को तैयार हूँ । मुझे यह तो सूझ रहा है कि इस काम के लिए क्या करना चाहिये । लेकिन इसमे आपकी मदद जरूरी है ।'

ब्रजकिशोरबाबू को मैने बहुत ठंडे दिमाग का पाया । उन्होने शान्ति से उत्तर दिया , 'हमसे जो मदद बनेगी , हम देंगे । लेकिन हमें समझाइये कि आप किस प्रकार की मदद चाहते है ।'

इस बातचीत मे हमने सारी रात बिता दी । मैने कहा, 'मुझे आपकी वकालत की शक्ति का कम ही उपयोग होगा । आपके समान लोगो से तो मै लेखक और दुभाषिये का काम लेना चाहूँगा । मै देखता हूँ कि इसमे जेल भी जाना पड़ सकता है । मै इसे पसन्द करूँगा कि आप यह जोखिम उठाये । पर आप उसे उठाना न चाहे , तो भले न उठाये । वकालत छोड़कर लेखक बनने और अपने धंधे को अनिश्चित अविधि के लिए बन्द करने की माँग करके मै आप लोगो से कुछ कम नही माँग रहा हूँ । यहाँ कि हिन्दी बोली समझने मे मुझे कठिनाई होती है । कागज-पत्र सब कैथी मे या उर्दू मे लिखे होते है , जिन्हे मै नही पढ़ सकता । इनके तरजुमे की मै आपसे आशा रखता हूँ । यह काम पैसे देकर कराना हमारे बस का नही है । यह सब सेवाभाव से और बिना पैसे के होना चाहिये ।'

ब्रजकिशोरबाबू समझ गये , किन्तु उन्होने मुझसे और अपने साथियो से जिरह शुरू की । मेरी बातो के फलितार्थ पूछे । मेरे अनुमान के अनुसार वकीलो को किस हद तक त्याग करना चाहिये, कितनो की आवश्यकता होगी , थोड़े-थोड़े लोग थोड़ी-थोड़ी मुद्दत के लिए आवे तो काम चलेगा या नही , इत्यादि प्रश्न मुझसे पूछे । वकीलो से उन्होने पूछा कि वे कितना त्याग कर सकते है ।

अन्त मे उन्होने अपना यह निश्चय प्रकट किया , 'हम इतने लोग आप जो काम हमे सौपेगे, वह कर देने के लिए तैयार रहेगे । इनमे से जितनो को आप जिस समय चाहेगे उतने आपके पास रहेंगे । जेल जाने की बात नई है । उसके लिए हम शक्ति-संचय करने की कोशिश करेंगे ।'