गोखले के साथ एक महीना - 2

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मोहन दास करमचंद गाँधी की आत्मकथा

सत्य के प्रयोग

गोखले के साथ एक महीना -2

गोखले की छायातले रहकर मैने सारा समय घर मे बैठकर नही बिताया ।

दक्षिण अफ्रीका के अपने ईसाई मित्रों से मैंने कहा था कि मैं हिन्दुस्तान के ईसाइयों से मिलूँगा और उनकी स्थिति की जानकारी प्राप्त करूँगा । मैने कालीचरण बैनर्जी का नाम सुना था । वे कांग्रेस के कामों मे से अगुआ बनकर हाथ बँटाते थे , इसलिए मेरे मन में उनके प्रति आदर था । साधारण हिन्दुस्तानी ईसाई कांग्रेस से और हिन्दू-मुसलमानों से अलग रहा करते थे । इसलिए उनके प्रति मेरे मन में जो अविश्वास था, वह कालीचरण बैनर्जी के प्रति नहीं था । मैने उनसे मिलने के बारे मे गोखले से चर्चा की । उन्होंने कहा, 'वहाँ जाकर क्या पाओगे ? वे बहुत भले आदमी हैं , पर मेरा ख्याल है कि वे तुम्हें संतोष नहीं दे सकेंगे । मैं उन्हें भलीभाँति जानता हूँ । फिर भी तुम्हें जाना हो तो शौक से जाओ ।'

मैने समय माँगा । उन्होंने तुरन्त समय दिया और मै गया । उनके घर उनकी धर्मपत्नी मृत्युशय्या पर पड़ी थी । घर सादा था । कांग्रेस मे उनको कोट-पतलून मे देखा था। पर घर में उन्हें बंगाली धोती और कुर्ता पहने देखा । यह सादगी मुझे पसन्द आयी । उन दिनों मैं स्वय पारसी कोट-पतलून पहनता था , फिर भी मुझे उनकी यह पोशाक और सादगी बहुत पसन्द पड़ी । मैने उनका समय न गँवाते हुए अपनी उलझने पेश की ।

उन्होंने मुझसे पूछा, 'आप मानते हैं कि हम अपने साथ पाप लेकर पैदा होते हैं ?'

मैने कहा, 'जी हाँ ।'

'तो इस मूल पाप का निवारण हिन्दू धर्म में नहीं हैं , जब कि ईसाई धर्म मे हैं। ' यो कहकर वे बोले, 'पाप का बदला मौत हैं । बाईबल कहती हैं कि इस मौत से बचने का मार्ग ईसा की शरण हैं ।'

मैने भगवद् गीता के भक्तिमार्ग की चर्चा की । पर मेरा बोलना निरर्थक था । मैने इन भले आदमी का उनकी भलमनसाहत के लिए उपकार माना । मुझे संतोष न हुआ, फिर भी इस भेंट से मुझे लाभ ही हुआ ।

मै यह कह सकता हूँ कि इसी महीने मैने कलकत्ते की एक-एक गली छान डाली । अधिकांश काम मै पैदल चलकर करता था । इन्हीं दिनों मैं न्यायमूर्ति मित्र से मिला । सर गुरुदास बैनर्जी से मिला । दक्षिण अफ्रीका के काम के लिए उनकी सहायता की आवश्यकता थी । उन्हीं दिनो मैने राजा सर प्यारीमोहन मुकर्जी के भी दर्शन किये ।

कालीचरण बैनर्जी ने मुझ से काली-मन्दिर की चर्चा की थी । वह मन्दिर देखने की मेरी तीव्र इच्छा थी । पुस्तक मे मैने उसका वर्णन पढ़ा था । इससे एक दिन मैं वहाँ जा पहुँचा । न्यायमूर्ति का मकान उसी मुहल्ले मे था । अतएव जिस दिन उनसे मिला, उसी दिन काली-मन्दिर भी गया । रास्ते में बलिदान के बकरों की लम्बी कतार चली जा रही थी । मन्दिर की गली में पहुचते ही मैने भिखारियो की भीड़े लगी देखी । वहाँ साधु-संन्यासी तो थे ही । उन दिनो भी मेरा नियम हृष्ट-पुष्ट भिखारियो को कुछ न देने का था । भिखारियों ने मुझे बुरी तरह घेर लिया था ।

एक बाबाजी चबूतरे पर बैठे थे । उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा, 'क्यो बेटा, कहाँ जाते हो? '

मैने समुचित उत्तर दिया । उन्होंने मुझे और मेरे साथियो को बैठने के लिए कहा। हम बैठ गये ।

मैने पूछा, 'इन बकरों के बलिदान को आप धर्म मानते हैं ?'

'जीव की हत्या को धर्म कौन मानता हैं ?'

'तो आप यहाँ बैठकर लोगों को समझाते क्यो नही ?'

'यह काम हमारा नही हैं । हम तो यहाँ बैठकर भगवद् भक्ति करते हैं ।'

'पर इसके लिए आपको कोई दूसरी जगह न मिली ?'

बाबाजी बोले, 'हम कहीं भी बैठे, हमारे लिए सब जगह समान हैं। लोग तो भेंड़ो के झूंड की तरह हैं । बड़े लोग जिस रास्ते ले जाते हैं , उसी रास्ते वे चलते हैं । हम साधुओ का इससे क्या मतलब?'

मैने संवाद आगे नहीं बढाया । हम मन्दिर में पहुँचे । सामने लहू की बह रही थी । दर्शनो के लिए खड़े रहने की मेरी इच्छा न रही। मैं बहुत अकुलाया, बेचैन हुआ । वह दृश्य मैं अब तक भूल नहीं सका हूँ । उसी दिन मुझे एक बंगाली सभा का निमंत्रण मिला था । वहाँ मैने एक सज्जन से इस क्रूर पूजा की चर्चा की । उन्होंने कहा , 'हमारा ख्याल यह है कि वहाँ जो नगाड़े वगैरा बडते हैं , उनके कोलाहल मे बकरो को चाहे जैसे भी मारो उन्हें कोई पीड़ा नही होती । '

उनका यह विचार मेरे गले न उतरा । मैने उन सज्जन से कहा कि यदि बकरो को जबान होती तो वे दूसरी ही बात कहते । मैने अनुभव किया कि यह क्रूर रिवाज बन्द होना चाहिये । बुद्धदेव वाली कथा मुझे याद आयी । पर मैने देखा कि यह काम मेरी शक्ति से बाहर हैं । उस समय मेरे जो विचार थे वे आज भी हैं । मेरे ख्याल से बकरों के जीवन का मूल्य मनुष्य के जीवन से कम नही हैं । मनुष्य देह को निबाहने के लिए मै बकरे की देह लेने को तैयार न होऊँगा । मै यह मानता हूँ कि जो जीव जितना अधिक अपंग हैं , उतना ही उसे मनुष्य की क्रूरता से बचने के लिए मनुष्य का आश्रय पाने का अधिक अधिकार हैं । पर वैसी योग्यता के अभाव में मनुष्य आश्रय देने मे असमर्थ हैं । बकरो को इस पापपूर्ण होम से बचाने के लिए जितनी आत्मशुद्धि और त्याग मुझ मे हैं, उससे कहीँ अधिक की मुझे आवश्यकता हैं । जान पड़ता हैं कि अभी तो उस शुद्धि और त्याग का रटन करते हुए ही मुझे मरना होगा । मैं यह प्रार्थना निरन्तर करता रहता हूँ कि ऐसा कोई तेजस्वी पुरुष और ऐसी कोई तेजस्विनी सती उत्पन्न हो , जो इस महापातक में से मनुष्य को बचावे, निर्दोष प्राणियों की रक्षा करे औऱ मन्दिर को शुद्ध करे । ज्ञानी, बुद्धिशाली , त्यागवत्तिवाला और भावना-प्रधान बंगाल यह सब कैसं सहन करता है ?