गोकरुणानिधि/११

From Wikisource
Jump to navigation Jump to search
गोकरुणानिधिः by स्वामी दयानंद सरस्वती
नियम-प्रकरणम्

इस सभा के नियम
[edit]

1 - सब विश्व को विविध सुख पहुँचाना इस सभा का मुख्य उद्देश्य है, किसी की हानि करना प्रयोजन नहीं।

२ - जो जो पदार्थ सृष्टिक्रमानुकूल जिस प्रकार से अधिक उपकार में आवे, उस उस से आप्ताभिप्रायानुसार यथायोग्य सर्वहित सिद्ध करना इस सभा का परम पुरुषार्थ है।

३ - जिस जिस कर्म्म से बहुत हानि और थोड़ा लाभ हो, उस उस को सभा कर्त्तव्य नहीं समझती।

४ - जो जो मनुष्य इस परमहितकारी कार्य में, तन, मन, धन से प्रयत्न और सहायता करे, वह वह इस सभा में प्रतिष्ठा के योग्य होवे।

५ - जो कि यह कार्य्य सर्वहितकारी है, इसलिए यह सभा भूगोलस्थ मनुष्य जाति से सहायता की पूरी आशा रखती है।

६ - जो जो सभा देश-देशान्तर और द्वीप-द्वीपान्तर में परोपकार ही करना अभीष्ट रखती है, वह वह इस सभा की सहायकारिणी समझी जाती है।

७ - जो जो जन राजनीति वा प्रजा के अभीष्ट के विरुद्ध, स्वार्थी, क्रोधी और अविद्यादि दोषों से प्रमत्त होकर राजा और प्रजा के लिये अनिष्ट कर्म्म करे वह वह इस सभा का सम्बन्धी न समझा जावे।

उपनियम
[edit]

उपनियम

१ - इस सभा का नाम "गोकृष्यादिरक्षिणी" है।

उद्देश्य

२ - इस सभा के उद्देश्य वे ही हैं जो कि इसके नियमों में वर्णन किये गये हैं।

३ - जो लोग इस सभा में नाम लिखाना चाहें[1] और इस के उद्देश्यानुकूल आचरण करना चाहें वे इस सभा में प्रविष्ट हो सकते हैं, परन्तु उनकी आयु १८ वर्ष से न्यून न हो। जो लोग इस सभा में प्रविष्ट हों वे 'गोरक्षकसभासद्' कहलावेंगे।

४ - जिन का नाम इस सभा में सदाचार से एक वर्ष हो रहा हो और वे अपने आय का शतांश वा अधिक मासिक वा वार्षिक इस सभा को दें, वे


  1. इस सभा के नाम लिखाने के लिये मंत्री के पास इस प्रकार का पत्र भेजना चाहिये कि - 'मैं प्रसन्नतापूर्वक इस सभा के उद्देश्यानुकूल, जो कि नियमों में वर्णन किये हैं, आचरण स्वीकार करता हूं। मेरा नाम इस सभा में लिख लिजिये।' परन्तु अन्तरङ्गसभा को अधिकार रहेगा कि िकसी विशेष हेतु से उनका नाम इस सभा में लिखना स्वीकार न करे॥