गिजुभाई की बाल-कथाएं: माँ जाया भाई

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गिजुभाई की बाल-कथाएं: माँ–जाया भाई

लेखक गिजुभाई बधेका

अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी

  1. ओ रे, बेदरदी
  2. चालाक खरगोश
  3. बोहरा और बोहरानी
  4. तड़तड़ तुम्बी तड़ंतड़ा
  5. कांटे की नोंक
  6. नकलची नाई
  7. बुढ़िया और बंदरिया
  8. दलपत तिवारी
  9. तोता और कौआ
  10. एक थी चिड़िया
  11. आनन्दी कौआ
  12. मूर्ख बहू
  13. कंजूस सेठ, चटोरी सेठानी
  14. बनियों का स्वांग
  15. अभिमानी मेंढकी
  16. जूं बाई का भाग्य
  17. रलाभाई गढ़वी
  18. नाई और बाघ
  19. मां-जाया भाई

ओ रे, बेदरदी

एक था कुनबी और एक थी कुनबिन। एक दिन शाम को कुनबी खेत से लौटकर खटिया पर बैठ-बैठ थकान उतार रहा था। इसी बीच कुनबिन रसोईघर के अन्दर से बोली, "सुनते हो? मेरे मायके से मण्डन अहीर आया है। वह ख़बर लाया है कि वहां अकाल पड़ा है और दाना मिलता नहीं है। कह रहा था कि मेरे मां-बाप दुबले हो गए है।"

कुनबी ने धीमे-से जवाब दिया, "अब इसमें हम क्या करें? हम भगवान तो हैं नहीं, जो पानी बरसा दें! हां अकाल भी पड़ता तो है।"

कुनबिन को बुरा लगा। वह गरजकर बोली, "लो, सुन लो! कहते हैं, हां, अकाल भी पड़ता तो हैं। पता तो तब चले, जब खुद अकाल भुगता हो। सुनो, मैं कहती हूं कि आज ही चले जाओ, और एक गाड़ी-भर गेहूं वहां डाल आओ। यहां अपने घर तो यह भूरी भैस दूध दे ही रही है, इसलिए साथ में माथे पर टीकेवाली अपनी यह गोरी गय थी लेते जाओ। कुछ सुना?"कुनबी सोचने लगा। सोचते-सोचते उसके दिमाग में एक बात आ गई। वह फुरती से उठ खड़ा हुआ और रसोईघर में जाकर कहने लगा, "अरे, यह कौन बड़ी बात है? तुम रास्ते के लिए खाना तैयार कर दो। कल अंधेरे ही मैं चला जाऊंगा। साथ में अपना लल्ला जायगा।" लल्ला पास ही खड़ा था। उसकी खुशी का तो कोई ठिकाना ही न रहा!

कुनबी ने बड़े तड़के गाड़ी जोती। कुनबिन ने गाड़ी में गेंहूं भर दिए। ठूंस-ठूंसकर भरे। अन्दर पचास रुपयों की एक थैली भी छिपा दी। उसने सोचा कि गेहूं के साथ थैली भी उसके बापू को मिल जायगी। गेहूं भर देने के बाद गाड़ी के साथ एक गाय भी बांध दी।

गाय के गले में एक बढ़िया कलगी बांधी, और गाड़ी के साथ कुनबी को बिदा कर कर दिया।

गाड़ी चली जा रही थी कि इस बीच दो रास्ते फटे। एक रास्ता कुनबी की ससुराल वाले गांव का था, और दूसरा कुनबी की बहन के गांव का था। कुनबी ने धीमे-से रास खींची और गाड़ी बहन के गांव के रास्ते पर चल पड़ी।

गाड़ी में बैठा लल्ला बोला, "दद्दा! यह रास्ता तो बुआजी के गांव का है। गामा के गांव का रास्ता तो वह रहा।"

कुनबी ने कहा, "चुप रह! बहुत चतुराई मत बघार! रास्ता क्या तुझे ही मालूम है? कल का छोकरा!" लल्ला चुप्पी साधे बैठा रहा और गाड़ी चलती रही।

शाम हुई। गाड़ी बहन के गांव में पहुंची। वहां भी अकाल पड़ा था। नदी सूख गई थी। फसल जल चुकी थी। दाने-पानी की हैरानी थीं भाई को देखकर बहन को बड़ी खुशी हुई। एक तो भैया घर आए, और साथ में गाड़ी-भर गेहूं लाये। फिर दूध देती एक गाय भी ले आए!

बहन ने जल्दी से लपसी बनाई। मूंग बनाए। अपने भैया को और भतीजे की खूब मनुहार कर-करके भोजन करवाया। बाप-बेटे दोनों बहन के घर दो-चार दिन बड़े आराम से रहे, और फिर गाड़ी जोतकर घर लौटै।

कुनबी को घर आया देखकर कुनबिन ने कहा, "कहो, गेहूं पहुंचा दिए? गाय मेरे मां-बाप को कैसी लगी? वहां सब अच्छे तो हैं?"

कुनबी बोला, "मैं तो खेत पर जा रहा हूं। तुम इस लल्ला से सब पूछ लेना।"

कुनबिन ने पूछा, "क्यों, लल्ला! तुम्हारे मामा तो अच्छे हैं न?"

लल्ला बोला, "मां, वहां कोई मामा नहीं थे।"

कुनबिन ने कहा, "शायद मामा किसी दूसरे गांव गए होंगे। मामी तो अच्छी थीं न?"

लल्ला बोला, "लेकिन, मां! वहां मामी-वामी कोई नहीं थीं। वहां तो बुआजी थीं, भानजे थे, फूफाजी थे और दूसरे सब लोग भी थे।"

कुनबिन समझ गई। मन-ही-मन बोली, ‘लगता है, सारा सामान अपनी बहन के घर डाल आए हैं!’ कुनबिन ने तय कर लिया कि अब कुनबी की पूरी फजीहत करनी चाहिए।

फिर तो सिर पर घूंघट लेकर उसने अपना सिर पीटना शुरु किया। कुनबिन रोती जाती थी और सिर पीटकर कहती जाती थी:

गोरी गाय के गले में कलगी,

गाड़ी-भर गेहूं और गेहूं में थैली

ओ रे, बेदरदी! ओ रे, बेदरदी!

लोग सब इकट्ठे होने लगे। सब पूछने लगे, "परसानी! तुम्हें क्या हो गया है? तुम क्यो रो रही हो!"

कुनबिन ने कहा, "ये यहां से अपनी बहन के घर गोरी गाय और गाड़ी-भर गेहूं पहुंचाने गए थे, लेकिन वहां अकाल के कारण बहन, बहनोई और भानजे सब मर चुके हैं, इसलिए आज मैं उनके नाम से यहां रो रही हूं।"

कुनबी का घर अच्छज्ञ-भला घर था। इसलिए सारा गांव रोने-पीटने के लिए इकट्ठा हो गया। खेत पर कुनबी को ख़बर मिली कि घर में रोना-पीटना मचा है, तो वह भी दौड़ता-हांफता घर आ पहुंचा। आकर देखा कि सब रो-पीट रहे हैं और कह रहे है।:

गोरी गाय के गले में कलगी,

गाड़ी-भर गेहूं और गेहूं में थैली,

ओ रे, बेदरदी! ओ रे, बेदरदी।

सबलोग कुनबी को घेरकर बैठ गए, और बहन-भानजों के लिए मातम-पुरसी करने लगे। कुनबी सारी बात समझ गया। अपना पाप अपने को ही ले डूबा! फिर तो दूसरे दिन कुनबी गाड़ी-भर गेहूं और एक दूसरी गाय लेकर अपनी ससुराल पहुंचा और सारा सामान ससुराल वालों को सौंपकर लौट आया।

चालाक खरगोश

एक था सियार और एक था खरगोश। एक बार दोनों में दोस्ती हो गई। एक दिन दोनों गांव की ओर चले। कुछ दूर जाने पर उन्हें दो रास्ते मिले। एक रास्ता चमड़े का था और दूसरा लोहे का था। सियार बोला, "मैं, चमड़े वाले रास्ते से जाऊंगा।" सियार चमड़ेवाले रास्ते चल पड़ा और खरगोश ने लोहेवाले रास्ते पर चलना शुरु किया।

लोहेवाले रास्ते में एक बाबाजी की कुटिया मिली। खरगोश को ज़ोर की भूख लगी थी, इसलिए वह तो बाबाजी की कुटिया में घुस गया। कुटिया में इधर-उधर देखा तो तो उसे वहां पेड़े मिले। खरगोश ने डटकर पेड़े खा लिये और फिर कुटिया का दरवाजा बन्द करे वह वहां आराम से सो गया। कुछ देर बाद बाबाजी आए। अपनी कुटिया का दरवाजा बन्द देखा, तो उन्होंने पूछा, "मेरी कुटिया में कौन है?" अन्दर से खरगोश ने बड़े रौब के साथ कहा:

मैं खरगोश हूं खरगोश!

बाबाजी! भाग जाओ।

भाग जाओ,

नहीं तो तुम्हारी तुम्बी तोड़ दूंगा।

सुनकर बाबाजी तो डर गए और भाग खड़े हुए। गांव में जाकर एक पटेल को बुला लाए। कुटिया के पास पहुंचकर पटेल ने पूछा, "बाबाजी की कुटिया में कौन है?"

अन्दर से रौब-भरी आवाज में खरगोश बोला:

मैं खरगोश हूं, खरगोश!

पटेल, पटेल, भाग जाओ।

भाग जाओ,

नहीं तो तुम्हारी पटेली छीन लूंगा।

पटेल भी डरा और भाग गया। फिर पटेल मुखिया को बुला लाया। मुखिया ने पूछा, "बाबाजी की कुटिया में कौन है?"

खरगोश ने लेटे-लेटे ही रौब-भरी आवाज में कहा:

मैं खरगोश हूं, खरगोश!

मुखिया, मुखिया, भाग जाओ।

भाग जाओ,

नहीं तो तुम्हारा मुखियापन खतम कर दूंगा।

सुनकर मुखिया भी डर गया और भाग खड़ा हुआ। फिर तो बाबाजी भी चले गए। जब सब चले गए, तो खरगोश कुटिया के बाहर निकला। वह सियार से मिला और उसको सारी बातें सुनाई।

सियार की इच्छज्ञ हुई कि वह भी पेड़ खाए। बोला, "तो मैं भी कुटिया में जाकर खा लेता हूं।"

खरगोश ने पूछा, "अगर बाबाजी आ गए, तो तुम कुटिया के अन्दर से क्या कहोगे?"

सियार ने कहा, "मैं भी कहूंगा—

मैं सियार हूं, सियार!

बाबाजी, भाग जाओ।

भाग जाओ

नहीं तो तुम्हारी तुम्बी तोड़ दूंगा।"

खरगोश बोला, "अच्छी बात है। तो अब तुम भी पेड़ों का स्वाद चख आओ!"

बाद में सियार कुटिया के अन्दर गया। कुछ ही देर में बाबाजी आए और बोले,

"मेरी कुटिया में कौन है?"

सियार ने धीमी आवाज में कहा:

मैं सियार हूं, सियार!

बाबाजी, भाग जाओ।

भाग जाओ,

नहीं, तो तुम्हारी तुम्बी तोड़ दूंगा।

बाबाजी ने आवाज पहचान ली और कहा, "ओह हो! यह तो सियार है!" बाद में बाबाजी ने दरवाजा खोल लिया। वे अन्दर गए। सियार को बाहर निकाला, और जमकर उसकी पिटाई की और कुटिया से निकाल बाहर किया।

बोहरा और बोहरानी

एक था बोहरा और एक थी बोहरानी। एक दिन बोहरानी भैंस का दूध दुहने बैठी और वहां उसके पेट से हवा निकल गई। बोहरानी शरमा गई। उसने महसूस किया कि यह बहुत बुरा हुआ। इस भैंस ने सुन लिया है। मैंस ग्वाले से कहेगी और ग्वाला सारे गांव में कह देगा। मेरी तो भारी फ़जीहत हो जायगी।

अब किया क्या जाय? भैस के कान के पास खड़ी होकर बोहरानी उसे समझाने लगी। उसने भैंस से कहा, "सुनो, बहन! जो कुछ हुआ है, उसे किसी से कहोगी तो नहीं?" इसी बीच भैस के कान पर एक मक्खी बैठी, इसलिए भैंस ने सिर हिलाना शुरु किया। बोहरानी ने समझा कि भैस कह रही है कि कहूंगी। अब क्या होगा? वह जरुर ग्वाले से कहेगी, ग्वाला सारे गांव को कह देगा।

बोहरानी घर के अन्दर आई और सिर नीचा करके सोचने लगी। इसी बीच वहां बोहरा आ पहुंचा।

उन्होंने पूछा, "बोहरानी! तुम उदास क्यों हो? तुम्हें क्या हुआ है?"

बोहरानी बोली, "क्या कहूं, बहुत ही ग़लत काम हो गया है। मेरी तो ज़बान ही नहीं खुलती।"

बोहरे ने कहा, "लेकिन कहो तो, ऐसी क्या बात हो गई है?"

बोहरानी ने सारी बात कह सुनाई। बोली, "मैंने भैंस को बहुत


समझाया, पर वह तो कहती है कि मैं सबकों कहूंगी ही। अब भैस कहेगी ग्वाले को, और ग्वाला कहेगा समूचे गांव को। फिर मैं गांव वालों को अपना मुंह कैसे दिखाऊंगी?"

बोहरे ने कहा, "यह तो हमारी आबरु की बात है, इसजिएहम तो अपना मुंह दिखा ही नहीं सकते। चलो, आज ही रात को अपना सारा सामान लेकर दूसरे गांव चले जायं।"

रात होने पर बोहरे और बोहरानी ने गाड़ी में अपना सारा सामान रखा और निकल पड़े। लेकिन गांव का फाटक उनहें बन्द मिला। दरबान ने पूछा, "इस गाड़ी में कौन हैं?"

बोहरा बोला, "दरबवान, भैया! क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं बोहरा हूं।"

दरबान ने पूछा, "लेकिन इतनी रात-गये आप लोग कहां जा रहे हैं?"

बोहरा बोला, "भैया! बात कहने लायक नहीं है। हमारे सिर पर भारी संकट आ पड़ा है। इसलिए हम गांव छोड़कर जा रहे हैं।"

दरबान ने पूछा, "लेकिन कहिए तो सही कि ऐसा कौन-सा बड़ा संकट आ गया है?"

बोहरे ने बात बताते हुए कहा, "दरबवान भैया! तुम्हीं कहो अब हम क्या करे?"

दरबान बोला, "ओह हो! आप इसीलिए गांव छोड़कर भागना। चाहते हैं? आपके समान भले आदमी गांव छोड़कर चले जायंगे, तो गांव का क्या हाल होगा? चलिए, मै राजाजी से कह देता हूं कि गांव में कोई आपकी बात करे ही नहीं।"

दरबान ने राजा ने कहा। राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया कि बोहर की बहू की बात न तो भैंस, न ग्वाला, और न गांव के लोग ही कहीं करें।

तड़तड तुम्बी तड़तड़ा

एक लड़का था। एक बार गांव जाने के लिए तैयार हुआ। रास्ते में खाने के लिए मां ने उसे सात बाडिया बना दीं। बाटियां लेकर लड़का चल पड़ा। चलते-चलते रास्ते में उसे एक बावड़ी मिली। दोपहर का समय हो गया था। लड़के ने सोचा, ‘अब तो भूख बहुत जोर की लगी है। यहीं रुक जाऊं और खाना खा लूं।’

लड़का बावड़ी पर पहुंचा। उसने बाटियों की पोटली खोली। उसे भूखबहुत जोर की लगी थीं वह वहां बैठे-बैठे सोचने लगा कि इन बाटियों में से कितनी बाटियां खा लूं? एक खाऊं? दो खाऊं? तीन खाऊं? चार खाऊं? पांच खाऊं? छह खाऊं? या सातों खा जाऊं?

बावड़ी में सात भूत रहते थे। उन्होंने लड़के की बातें सुन लीं। वे बोले, "अरे, यह यहां कौन आया है? यह हम सातों को खाने की बात कहता है, तो जरुर ही कोई जबरदस्त जीव होगा?" एक भूत ने कहा, "चलो, हम उसे कोई चीज़ भेंट में दे आएं। खुश होकर वह चला जाय, तो अच्छा होगा।" भूत के पास एक चूल्हा था। वह ऐसा था कि उसके पास बैठकर जो मांगो, वह मिल जाए। भूत डरता-डरता ऊपर आया और बोला, "अरे भैया! तुम हमें खा जाने की बात क्यों सोचते हो? हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? हम तो अपनी सुविधा के लिए इस बावड़ी में रहते हैं। तुमकों जरुरत हो तो लो यह चूल्हा ले जाओ। यह चूल्हा ऐसा है कि तुम इससे जो भी चाहोगे, यह तुम्हें देगा।"

लड़के ने चूल्हा ले लिया। उसने मन-ही-मन कहा, ‘वाह, अपना तो काम बन गया। वह घर की तरफ लौट पड़ा। रास्ते में बहन के गांव में रात को ठहरा। रात में उसने सोचा, ‘चलूं, एक बार फिर वहां पहुंचू और कोई दूसरी चीज ले आऊं। वापस जाकर भूतों को फिर डराऊंगा।’

उसने अपनी बहन से बात की। चूल्हा बहन को सौंप दिया। बहन ने सात बाटिया बना दीं। उनको लेकर लड़का फिर बावड़ी की तरफ चला। दोपहर होते-होते वह बावड़ी पर पहुंच गया। सीढ़ी पर बैठकर उसने बाटियां निकालीं और बोला, "एक खाऊं? दो खाऊं? तीन खाऊं? चार खाऊं? पांच खाऊं? छह खाऊं? या सातों खा जाऊं?" सुनकर भूत बहुत ही डर गये। फिर उनमें से एक भूत ऊपर आया। वह अपने साथ एक मुर्गी लाया था। उसने कहा, "भैया! यह लो। यह मुर्गी ऐसी है कि तुम जब भी इससे कहोगे, यह तुम्हें सोने के अण्डे देगी।"

लड़का मुर्गी लेकर बहन के घर पहुंचा। वहां वह दो दिन रहा। फिरबाटियां बनवाकर बावड़ी पर पहुंचा और पहले की तरह बोला। इतने में फिर एक भूत ऊपर आया और बोला, "लो भैया! यह एक तुम्बी ले लो। यह तुम्बी ऐसी करामाती है कि जब तुम ‘तड़तड़ तुम्बी तड़ंतड़ा’ कहोगे, तो जिसको भी ध्यान में रखकर कहोगे, तुम्बी उसी को तड़ातड़ लगने लगेगी। जबतक तुम इसे वापस नहीं बुलाओगे, यह चोट करती रहेगी।"

लड़का वापस अपनी बहन के घर आया। लेकिन इस बीच बहन की नीयत बिगड़ चुकी थी। भूतों का दिया चूल्हा और मुर्गी लाकर रख दी।

जब भाई ने अपना चूल्हा और मुर्गी मांगी, तो बहने ने उसे दूसरा चूल्हा और मूर्गी दै दी। भाई ने सोचा कि देख तो लूं कि चूल्हा और मुर्गी दोनों असल हैं या नहीं।

भाई ने चूल्हे से कहा, "हलुवा-पूरी दे।" लेकिन चूल्हे ने तो कुछ भी नहीं दिया। फिर उसने मुर्गी से कहा, "मुर्गी, मुर्गी, सोने के अण्डे दे।" मुर्गी ने भी कुछ नहीं दिया।

लड़के ने सोचा, ‘लगता है यह सब बहन की ही कारस्तानी है। चिन्ता की कोई बात नहीं। बहन को भी पता चल जायगा।’ फिर लड़के ने बहन को देखते तुम्बी से कहा, "तड़तड़ तम्बी तड़तड़ा।" सुनते ही तुम्बी उछनले लगी।

लड़के ने तुम्बी के कान में ऐसा कोई बात कह दी कि तुम्बी शान्त हो गई। बहन ने सोचा, ‘लगता है इस तुम्बी में थी कुछ करामात है। इसको भी मैं रखे लेती हूं।’ बहन दूसरी तुम्बी ले आई और असल तुम्बी की जगह रख दी।

फिर घर के अन्दर जाकर बहन बोली, "तड़तड़ तुम्बी तड़ंतड़ा!" सुनते ही तुम्बी उछलने लगी और बहन के सिर में तड़ातड़ लगने लगी। बहन घर के अन्दर से ओसारे में और फिर ओसारे से घर में भागी, इधर-से-इधर भागती रही, पर तुम्बी बराबर उसके पीछे पड़ी रही।

तुम्बी बहन को किसी तरह छोड़ ही नहीं रही थी। बहन बेचारी हैरान

हो गई। उसके सिर से लहू बहने लगा। बहने दौड़ी-दौड़ी भाई के पास पहुंची और बोली, "भैया, अपनी इस तुम्बी को तुम वापस बुला लो। इसने तो मेरा सिर ही तोड़ डाला है।"

भाई ने कहा, "मेरा चूल्हा और मुर्गी, जो तुमने छिपा ली है, पहले तुम उन्हें वापस करो।"

बहन खिसिया गई। उसने भाई को उसकी सब चीजें वापस सौंप दीं।

फिर लड़का अपनी मां के पास पहुंचा। लड़का चूल्हें से तरह-तरह की रसोई मांगता और खाता। सोने के अण्डे बेच-बेचकर उसने अपने लिए बड़े-बड़े महल बनवा लिये और उन महलों में वह राजा की तरह ठाठ से रहने लगा। कोई उसके साथ लड़-झगड़ भी नहीं सकता था। अगर कोई लड़ता, तो तुम्बी उसे तड़ातड़ लगने लगती।

एक दिन लड़के ने राजा से कहा, "राजा जी! अपनी राजकुमारी का ब्याह मुझसे कर दो।"

राजा ने सुना तो सिपाहियों को बुलाकर कहा, "इसे पकड़कर बांध लाओ।"

लेकिन लड़के के पास तुम्बी तैयार ही थी। वह तड़ातड़ सिपाहियों को लगने लगी। उसने सिपाहियों के सिर तोड़ डाले। सिपाही सारे लौट गए। दीवान पहुंचा तो उसका भी वैसा ही हाल हुआ। बाद में राजा ने अपनी राजकुमारी का ब्याह उस लड़के से कर दिया।

कांटे की नोक

कांटे की एक नो।

उस पर बसे तीन गांव। दो ऊजड़ और एक बसा ही नहीं,

बसा ही नहीं।

उनमें बसे तीन कुम्हार। दो अनगढ़, और एक गढ़ता ही नहीं,

गढ़ता ही नहीं।

उसने गढ़ी तीन कड़ियां। दो कच्ची और एक पक्की ही नहीं,

पक्की ही नहीं।

उसमें पकाए तीन मूंग। दो कच्चे और एक पकता ही नहीं,

पकता ही नहीं।

वहां आए तीन मेहमान। दो रसिक, और एक खाता ही नहीं,

खाता ही नहीं।

उसने दिए तीन रुपए। दो खोटे और एक सच्चा ही नहीं,

सच्चा ही नहीं।

वहां आए तीन पारखी। दो अन्धे और एक देखता ही नहीं,

देखता ही नहीं।

नकलची नाई

एक ब्राह्मण था। उसके पड़ोस में एक नाई रहता था। नाई की आदत थी कि जो ब्राह्मण करे, वही वह भी करता था। ब्राह्मण नहाए, धोए, पूजा-पाठ करे, संध्या करे और माला फेरे, तो नाई भी वैसा ही करे। ब्राह्मण तिलक लगाए, तो नाई भी तिलक लगाए। इस तरह ब्राह्मण की नकल करके नाई ब्राह्मण को चिढ़ाया करता था। ब्राह्मण ने सोचा कि इस नकलची नाई की अक़ल कभी ठिकाने लगानी चाहिए। सोचते-विचारते दीवाली आ पहुंची। दीवाली के दिनों में भी ब्राह्मण जो कुछ, जिस तरह करता, नाई भी वही सब, उसी तरह करने लगा। ब्राह्मण ने सोचा, ‘अब कोई तरकीब करना ही होगी।’

ब्राह्मण ने अपनी स्त्री को अकेले में बुलाकर कहा, "सुनो, यह नाई रोज-रोज़ मेरी नकल करके मुझको चिढ़ाता रहता हैं। इसलिए इसकी अक़ल दुरुस्त करने के इरादे से मैंने एक तरकीब सोची है। आज शाम मैं तुमसे कहूंगा, आज हम सबको राज बारह बजे अपनी-अपनी नाक काट लेनी है और कल नई नाक के साथ दीपावली मनानी है। तुम कहना, वाह! नई नाक से दीवाली तो हम हर साल मनाते हैं। इस साल हमें बहुत मज़ा आयेगा।"

खाने के बाद रात को ब्राह्मण ने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही ब्राह्मणी से कहा, "सुनती हो!कल दीवाली है, और हम सबको नई नाक के साथ दीवाली मनानी है। आज रात बारह बजे तुम सबकी नाक कट जायगी और कल सवेरे सबको नई


और बढ़िया नाक मिल जायगी। तुम सब इसके लिए तैयार रहना। बात समझ ली है न?"

ब्राह्मणी बोली, "बहुत अच्छा। हम सब तो तैयार ही हैं। नई नाक के साथ दीवाली मनाने में बड़ा मज़ा आयेगा।"

ब्राह्मण दिखावा तो ऐसा कर रहा था, मानो वह ब्राह्मणी से अकेले में ही सारी बात कह रहा हो, पर वह इतनी ऊंची आवाज में बोल रहा था कि नाई भी सुन सके।

नाई तो पूरा-पक्का नकलची था ही। इसलिए उसने मन-ही-मन सोचा, ‘फिकर की कोई बात नहीं। मैंने सबकुछ सुन लिया है। अगर ब्राह्मण नई नाक से दीवाली मनायेगा, तो हम भी वैसे ही मनायेंगे। ब्राह्मण को तो किसी उस्तरा मांगकर लाना होगा। लेकिन मेरे पास तो अपना बढ़िया उस्तरा है ही। कल ही धार लगवाकर लाया हूं। ब्राह्मण के मुक़ाबले मैं बहुत अच्छी तरह नाक काट सकूंगा। इसलिए ब्राह्मण के घर में सबकों जो नई नाक आयेगी, उससे मेरे घर में कहीं ज्यादा बढ़िया और अच्छी नाक आवेगी।’

सब सो गए। आधी रात होने पर ब्राह्मण जागा और खटिया में लेटे-लेटे ही उसने ब्राह्मणी से कहा, "सुनो, तुम इधर आ जाओ, इधर! मुझे तुम्हारी नाक काटनी है।"

ब्राह्मणी भी खटिया में लेटे-लेटे ही उसने ब्राह्मणी से कहा, "सुनो, तुम इधर आ जाओ, इधर! मुझे तुम्हारी नाक काटनी है।"

ब्राह्मणी भी खटिया में लेटे-लेटे ही बोली, "लो, मैं आ गई। सब नाक काट लो।"

मानो नाक कट चुकी हो, इस तरह तुरन्त ही ब्राह्मणी ‘हाय-हाय’ कहकर जोर-ज़ोर से रोने-चीखने लगी।

ब्राह्मण ने लेटे-लेटे ही कहा, "रोओ मत। मेरे पास आओ। मैं तुम्हें पट्टी बांध देता हू। सबेरे दूसरी बढ़िया नाक आ जावेगी।"

ब्राह्मणी ‘ऊं-ऊं-ऊं’ करती हुई सो गई। बाद में ब्राह्मण ने अपने बच्चों की नाक काटने का भी ऐसा ही दिखावा किया। थोड़ी देर बाद सब ‘ऊंब-ऊं-ऊं’

करते हुए चूप होकर सो गए।

अब नाई नाक काटने के लिए तैयार हुआ। उसने सोचा, ‘ब्राह्मण ने तो सबकी नाक काट ली है, अब हमें भी काट ही लेनी है।’ नाई ने अपनी पेटी में से नया तेज उस्तरा निकाला और दबे पांव अपनी घरपवाली की खाट के पास पहुंचकर बड़ी सफाई से उसकी नाक उड़ा दी। नाक कटते ही नाईन अपने बिछौने में उठ बैठी और रोने-चीखने लगी। नाई ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "सुनो चुप हो जाओ। चुपचाप सो जाओ। लाओ, मैं तुम्हें पट्टी बांध देता हूं। सबेरे दूसरी बढ़िया नाक आ जायगी। ब्राह्मण ने अभी-अभी सबकी नाक काटी है, और वे लोग नई नाक के साथ दीवाली मनाने वाले है। हमें भी उसी तरह दीवाली मनानी चाहिए।"

नाईन की नाक से लहू बराबर बह रहा था। लेकिन अब और इलाज ही क्या था? बाद में नाई ने बड़ी सिफत से अपनी भी नाक काट ली। नाई के भी दर्द तो बहुत हुआ, पर नई नाक के साथ दीवाली मनाने के उत्साह में अपनी नाक पर पट्टी बांधकर वह भी सा गया।

बड़े तड़के ब्राह्मण ने ऊंची आवाज में ब्राह्मणी से पूछा, कहो, "सबकी नई नाक कैसी आयी है?"

सब एक साथ बोले, "बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया!"

ब्राह्मण ने पूछा, "किसी को कोई तकलीफ तो नहीं हुई?"

सब बोले, "नहीं, नहीं। तकलीफ कैसी? हम सब तो बहुत आराम से सोए।"

सूरज उगा। धूप चढ़ी। लेकिन नाई और नाईन के नई नाक नहीं आई। उसने यह कहकर अपने मन को समझाया कि हमने देर में नाक काटी थी, इसलिए शायद कुछ देर बाद आवेगी, और ब्राह्मण के मुकाबले अच्छी आने वाली है। इसलिए कुछ देर तो लगेगी ही!

सूरज चढ़ने लगा। पर नाई और नाईन की नाक नहीं आई। इसी बीच

राजा का सिपाही नाई को बुलाने आया। बोला, "अरे, अभी तक तुम पहुंचे क्यों नहीं? राजा साहब तो तुम्हारी बाट देख रहे हैं।"

नाई नाक-ही-नाक में बोला, "राजा साहब से कहना कि आपके नाई ने नई नाक से दीवाली मनाने के लिए नाक काट ली है, और नई नाक की बाट देखता हुआ वह लेटा है। नई नाक आने पर ही मैं आ सकूंगा।"

पर नाई के नई नाक नहीं आई। उस दिन से वह ब्राह्मण की नकल करना भूल गया।

बुढ़िया और बंदरिया

एक थी बुढ़िया। उसके एक लड़का था। आंगन में पीपल का एक पेड़ था। पेड पर एक बंदरिया रहती थी। बुढ़िया और उसका बेटा दोनों खा-पीकर चैन से रहते थे।

खाते-पीते उसके सब पैसे खर्च हो गए। लड़के ने कहा, "मां! मैं कमाई करने परदेस जाऊं?"

बुढ़िया बोली, "बेटे! तुम चले जाओगे तो मैं यहां बहुत दुखी हो जाऊंगी। यह बंदरिया मुझको आराम से रोटी नहीं खाने देगी।"

बेटे ने कहा, "मां, यह बंदरिया तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी? तुम एक लकड़ी अपने पास रखना और जब भी बंदरिया आए, तुम उसे मारना। मां! कुछ दिनों में तो मैं वापस आ ही जाऊंगा।" ऐसा कहकर लड़का परदेस चला गया।

मां बूढ़ी थीं मुंह में एक भी दांत नहीं था। कुछ भी चबा नहीं पातीथी। इसलिए वह रोज़ खीर बनाती और ज्यों ही वह उसे थाली में ठण्डा करने रखती, पेड़ से नीचे कूदकर बंदरिया घर में पहुंच जाती। मां को धमकाकर सारी खीर खा जाती।

बुढ़िया रोज़ खीर ठण्डी करती और बंदरिया रोज़ खा जाती। बेचारी बुढ़िया रोज भूखी रहती। वह दिन-पर-दिन दुबली होती गई। आंखे गड्ऐ में धंस गईं। चेहरा उतार गया। वह सूखकर कांटा हो गई।

होते-होते एक साल पूरा हुआ और लड़का घर लौटा।

लड़के ने कहा, "मां, तुम इतनी दुबली क्यों हो गई, तुम्हें क्या हो गया है?"

मां ने कहा, "बेटे! हुआ तो कुछ भी नहीं, लेकिन यह बंदरिया मुझे कुछ खाने ही नहीं देती। मैं रोज़ खीर ठण्डी करती हूं और बंदरिया रोज आकर खा जाती है।"

लड़के ने कहा, "अच्छी बात है। अब कल देख लेंगे।"

सवेरे उठकर लड़के ने सारे घर में गीली मिट्टी फैला दी। सिर्फ़ रसोईघर में मां के बैठने लायक सूखी जगह रखी।

मां ने रसोई बनाई। घी चुपड़कर नरम-नरम चपाती थाली में रखीं और दूसरी थाली में खीर ठण्डी की।

लड़के ने आवाज लगाई:

बंदरिया, ओ बंदरिया! आओ, खीर खाने आओ!

बंदरिया तो तैयार ही बैठी थी। कूदकर अन्दर आ गई।

बंदरिया हाथ-पैर ऊंचे उठाती जाय, नाक-भौह चढ़ाती जाय और पूछती जाय, "मैं कहां बैठू? कहां बैठू?"

लड़के ने एक दहकता हुआ पत्थर दिखाकर कहा, "आओ, ओआ, बंदरिया बहन! सोने के इस पाटे पर बैठो।"

बंदरिया कूदकर आ बैठी। बैठते ही बुरी तरह जल गई। फिर "हाय, राम मैं, जली, मैं जल गई" कहती हुई भाग गई।

एक थे तिवारी। नाम था, दलपत। दलपत तिवारी की घरवाली को बैंगन बहुत पसंद थें एक दिन घरवाली ने उनसे कहा, "ओ तिवारीजी!"

तिवारी बोले, "क्या कहती हो भट्टानी?"

भट्टानी ने कहा, "बैंगन खाने का मन हो रहा है। जाओं, बैंगन ही ले आओ।"

तिवारी बोले, "अच्छा लाता हूं।"

हाथ में एक फटी-पुरानी लकड़ी लेकर ठक्-ठक् आवाज़ करते हुए तिवारी अपने घर से निकले। नदी-किनारे एक बाड़ी थी। वहां पहुंचे। लेकिन बाड़ी में

कोई था नहीं। जब बाड़ी का मालिक वहां नहीं है, तो बैंगन किससे लिए जायं?

आखिर तिवारी ने सोचा, "बाड़ी का मालिक नहीं है, तो न सही, पर बाड़ी तो है न? चलूं, बाड़ी से ही पूछ लूं।’

तिवारी ने कहा, "बाड़ी बाई, ओ, बाड़ी बाई!"

बाड़ी तो कुछ बोली नहीं, पर ये खुद ही बोले, "क्या कहते हो, दलपत तिवारी?"

तिवारी ने कहा, "बैंगन ले लूं दो-चार?"

बाड़ी फिर भी नहीं बोली। इस पर बाड़ी की तरफ से दलपत ने कहा, "’हां, ले लो, दस-बारह!" दलपत तिवारी ने बैंगन लिये और घर पहुंचकर तिवारी और भट्टानी ने बैंगन का भुरता बनाकर खाया।

भट्टानी को बैंगन का चस्का लग गया, इसलिए तिवारी रोज हो बाड़ी में पहुंचते और बैंगन चुराकर ले आते। बाड़ी में बैंगन कम होने लगे। बाड़ी के मालिक ने सोचा कि जरुर कोई चोर बैंगन चुराने आता होगा। उसे पकड़ना चाहिए।

एक दिन शाम को बाड़ी का मालिक एक पेड़ की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया। कुछ ही देर में दलपत तिवारी पहुंचे और बोले, "बाड़ी बाई, ओ बाड़ी बाई!"

बाड़ी के बदले दलपत ने कहा, "क्या कहते हो, दलपन तिवारी?"

तिवारी बोले, "बैंगन ले लू दो-चार?"

फिर बाड़ी की तरफ से दलपत ने कहा, "ले लो न दस-बारह!"

दलपत तिवारी ने झोली भरकर बैंगन ले लिये और ज्योंही जाने लगा, बाड़ी का मालिक पेड़ की आड़ में से बाहर निकला और उसने कहा, "ठहरो, बूढ़े बाबा! आपने ये बैगन किससे पूछकर लिये हैं?"

तिवारी बोले, "किससे पूछकर लिये? मैंने तो इस बाड़ी से पूछकर लिये हैं।"

मालिक ने कहा, "लेकिन क्या बाड़ी बोलती है?"

तिवारी बोले, "बाड़ी तो नहीं बोलती, पर मैं बोला हूं न।"

मालिक को गुस्सा आ गया। उसने उसकी बांह पकड़ ली और उसे कुएं के ापास ले गया। तिवारी की कमर में रस्सा बांधा और उसे कुएं में उतारा।

बाड़ी के मालिक का नाम था, बिसराम भूवा।

बिसराम भूवा बोला, "कुआं रे भाई, कुआं!"

कुएं के बदले बिसराम ने कहा, "क्या कहते हो बिसराम भूवा?"

बिसराम ने कहा, "डुबकियां खिलाऊं दो-चार?"

कुएं के बदले फिर बिसराम बोले, "खिलाओं न भैया, दस-बारह।"

दलपत तिवारी की नाक में और मुंह में पानी भर गया। तब वह बहुत गिड़गिड़ाकर बोला, "भैया! मुझे छोड़ दो। अब मैं कभी चोरी नहीं करुंगा।"

बिसराम को दया आ गयी। उसने तिवारी को बाहर निकाला और घर जाने दिया। तिवारी ने फिर चोरी नहीं की, और भट्टानी भी बैंगन का अपना शौक भूल गयी।

एक था तोता। बड़ा भला और समझदार था। एक दिन तोते से उसकी मां ने कहा, "भैया! अब तुम कहीं कमाने जाओ।"

"ठीक", कहकर तोता कमाने निकला। चलते-चलते बहुत दूर पहुंच गया। वहां एक बहुत बड़ा सरोवर था। सरोवर की पाल पर आम का एक पेड़ था। तोता उस पेड़ पर बैठ गया।

आम के पेड़ पर बहुत-से कच्चे और पके आम लगे थे। तोता आम खाता, आम की डाल पर झूलता और अपनी बोली में बोलता। इसी बीच उधर से एक ग्वाला निकला। तोते ने ग्वाले से कहा:

ओ भैया, गायों के ग्वाले,

ओ भाई, गायों के ग्वाले!

मेरी मां से कहना,

तोता भूखा नहीं है,

प्यासा नहीं है,

आम की डाल पर,

सरोवर की पाल पर,

कच्चे आम खाता है,

पक्के आम खाता है,

मौज उड़ाता है।

ग्वाले ने कहा, "भैया! अपनी इन गायों को छोड़कर मैं तुम्हारी मां से कहने कहां जाऊं? तुम्हें जरुरत हो, तो इनमें से एक बढ़िया गाय तुम ले लो।" तोते ने एक गाय रख ली और आम के तने से बांध दी।

कुछ देर बाद उधर से एक और ग्वाला निकला। उसके पास भैंसे थीं। तोते ने अपनी मां को उसके द्वारा संदेश भिजवाना चाहा, पर ग्वाले ने कहा, "भैया! मैं तो तुम्हारा यह संदेश पहुंचा नहीं सकूंगा। तुमको जरुरत हो, तो इनमें से एक भैस ले लो।" तोते ने एक अच्छी-सी भैंस रख ली और आम के तने से बांध दी।

थोड़ी देर के बाद उधर से बकरियों को हांकता एक ग्वाला निकला। तोते ने बकरियों के ग्वाले से वही कहा, पर वह ग्वाला माना नहीं। उसने कहा, "भैया! अपनी इन बकरियों हो तो इनमें से दो-चार बकरियां ले लो।" तोते ने दो-चार बकरियां रख लीं और उनको आम के तने से बांध दिया।

बाद में उधर से भेड़ों को लेकर एक ग्वाला निकला।

तोते ने उससे भी कहा कि वह उसकी मां को उसकी कुशलता का समाचार दे दे, लेकिन वह बोला, "अरे भैया! अपनी इन भेड़ों को छोड़कर मैं तुम्हारी मां से कहने कैसे जा सकता हूं? तुमको जरुरत हो, तो चार-पांच भेड़ें रख लो।" तोते ने चार-पांच भेड़ें रख लीं और उनको आम के तने से बांध दिया।

बाद में उधर से घोड़ों का, हाथियों और ऊंटों का रखवाला निकला। घोड़ो के रखवाले ने तोते को एक घोड़ा दिया, हाथियों के रखवाले ने एक हाथी दिया और ऊंटों के रखवाले ने एक ऊंट दिया।

इसके बाद तोता गाय, भैस, बकरी, भेड़, घोड़ा, हाथी और ऊंट, इन सबको लेकर एक बड़े शहर में पहुंचा। वहां उसने इन सबको बेच दिया। बेचने से तोते को बहुत-से रुपए मिल गये। कुछ रुपयों से उसने सोना खरीदना, चांदी खरीदी और गहने बनवा लिए। गहने उसने नाक में, कान में और चोंच में पहन लिये। बचे हुए रुपयों को अपने पंखों में और अपनी चोंच में रख लिया। बाद में वह अपने घर की तरफ रवाना हुआ। घर पहुंचते-पहुंचते बहुत रात हो गई। घर के सब लोग सो चुके थे। तोते ने सांकल खटखटाई और मां को पुकारा:

मां, मां!

दरवाजा खोलो,

दरवाजा खोला,

बिछायन बिछवाओ,

खटिया लगवाओ,

शहनाई बजवाओ,

तोता पंख झाड़ेगा,

मां ने सोचा कि तोता इतनी रात बीते कैसे आ सकता है? यह तो कोई चोर होगा और झूठ बोल रहा होगा। मां ने दरवाजा नहीं खोला। तोता अपनी काकी के घर पहुंचा। वही बात उसने काकी से कही, पर काकी ने भी दरवाजा नहीं खोला। फिर वह बहन के यहां और बुआ के यहां गया। वहां भी वैसा ही हुआ।

तोता अपने कई रिश्तेदारों के घर गया, पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला। इसके बाद तोता अपनी दादी के घर पहुंचा। पहुंचकर उसने दादी मां को पुकारा:

दादी मां, दादी मां,

दरवाजा खोलो,

दरवाजा खोलो,

बिछायन बिछवाओ।

खटिया लगवाओ,

शहनाई बजवाओ,

तोता पंख झाड़ेगा।

दादी ने तोते की आवाज पहचान ली। उसने कहा, "बेटे मेरे! ज़रा ठहरो। मैं आती हूं। अभी दरवाजा खोलती हूं।" दादी ने दरवाजा खोला और घर के अन्दर पहुंचकर तोते ने दादी के पैर छुए। दादी मां ने तोते को आशीर्वाद दिया।

बाद में दादी ने तोते के लिए बिछायन बिछाई, खटिया लगाई और उस पर बढ़िया मुलायम गादी बिछाई। फिर दादी ने कहा, "बेटे! तुम यहीं बैठो। मैं अभी शहनाई वाले को बुलाकर लाती हूं।" दादी शहनाई वाले को बुला लाई और शहनाई बजने लगी।

तोता खुश हो गया और वह अपने पंखों और चोंच से रुपए झाड़ने लगा। खननन, खननन की आवाज के साथ रुपए झड़ने लगे। ढेर लग गया। कुछ ही देर में सारे घर के अन्दर रुपए-ही-रुपए हो गए।

सबेरा हुआ। सबको पता चला कि तोता कमाई करके आया है और बहुत-सारे रुपए लायो है। पड़ोस में एक कौवी रहती थी। उसे मालूम हुआ कि तोता बड़ी कमाई करके लाया है, तो उसने अपने लड़के कौए से कहा, "बेटा! तुम भी कमाने जाओ।"

कौआ कमाने निकला। लेकिन कौआ तो आखिर कौआ ही था। उसे घूरे और घूरों की गन्दगी अच्छी लगती थी। इसलिए वह घूरे पर पहुंचा और अपने पंखों में, चोंच में और कान में तरह-तरह की गन्दी चीजें भर लीं। जब रात हुई, तो कौआ घर लौटा और तोते की तरह दरवाजे की सांकल खटखटाते हुए बोला:

मां, मां!

दरवाजा खोलो,

दरवाजा खोला,

बिछायन बिछवाओ,

खटिया लगवाओ,

शहनाई बजवाओ,

कौआ पंख झाड़ेगा।

मां बेचारी झटपट उठीं उसने दरवाजा खोला। बिछायन बिछाई खटिया लगाई और शहनाई बजवाई। जब शहनाई बजने लगी, तो कौए ने अपने पंख झाड़ने शुरु किए और सारे घर में गन्दगी-ही-गन्दगी हो गई। बदबू का कोई हिसाब नहीं रहा। कौए की मां को इतना गुस्सा आ गया कि उसने कौए को घर के बाहर निकाल दिया।

एक थी चिड़िया

एक थी चिड़िया। एक बार वह राजा के महल में गई। वहां उसे एक गुड्डा मिला। राजा का गुड्डा लेकर वह कहने लगी—

राज के महल से मुझे गुड्डा मिला।

राजा के महल से मुझे गुड्डा मिला।

राजा ने सुना, तो उसे गुस्सा आ गया। वह बोला, "इससे गुड्डा छीन लो।"

जब गुड्डा छिन गया, तो चिड़िया कहने लगी:

राजा को भूख लगी, मेरा गुड्डा छीन लिया।

राजा को भूख लगी, मेरा गुड्डा छीन लिया।

राज ने सोचा—‘हम तो लोभी साबित हुए!’

वह बोला, "चिड़िया को गुड्डा वापस दे दो।"

गुड्डा वापस दे दिया, तो चिड़िया कहने लगी:

राजा मुझसे डर गया।

गुड्डा मुझको दे दिया।

राजा मुझसे डर गया।

गुड्डा मुझको दे दिया।

राजा को इतना गुस्सा आ गया कि उसने चिड़िया को मार डाला और उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर राजा ने कहा, "इन टुकड़ों पर हलदी, नमक और मिर्च डाल दो, मैं इन्हें खा जाऊंगा।"

चिड़िया ने सुना। वह बोली:

आज तो मैं लाल-पीली बनी,

मैं लाल-पीली बनी।

आज तो मैं लाल-पीली बनी,

मैं लाल-पीली बनी।

राजा बोला, "अरे, अभी तो यह चिड़िया जी रही है। इसे छौको और तलो, जिससे इसका बोलना बन्द हो।" चिड़िया को तेल में छौका गया। चिड़िया फ़िर बोली:

आज तो मैं छननन बनी,

मैं छननन बनी।

आज तो मैं छननन बनी,

मैं छननन बनी।

राता को बहुत गुस्सा आया, और गुस्से-ही-गुस्से में वह चिड़िया को खाने लगा। तभी राजा के गले में जाते-जाते चिड़िया बोली:

आज तो मैं तंग गली में पहुंची,

मैं तंग गली में पहुंची।

आज तो मैं तंग गली में पहुंची,

मैं तंग गली में पहुंची।

राजा ने कहा, "अब इसे पेट में जाने दो, फिर देखें यह कैसे बोलेगी?"

चिड़िया पेट में पहुंच गई। पर वह तो वहां से भी बोले बिना न रही।

आज तो मैं राजमहल में पहुंची,

मैं, राजमहल में पहुंची।

आज तो मैं राजमहल में पहुंची,

मै राजमहल में पहुंची।

राजा गुस्से से लाल-पीला हो गया। उसने सिपाहियों को अपने चारों ओर खड़ा किया और उनसे कहा, "जब यह चिड़िया बाहर निकले, तो उसे काट डालना।" राजा बैठ गया। नंगी तलवारों के साथ सिपाही राजा को घेरकर खड़े हो गए।

इसी बीच चिड़िया निकली और राजा की पीठ पर जा बैठी। जैसे सिपाही चिड़िया को तलवार से मारने दौड़े, चिड़िया फुर्र से उड़ गई। तलवार राजा की पीठ पर पड़ी और पीठ कट गई।

चिड़िया पेड़ पर जा बैठी और बैठी-बैठी बोलने लगी:

मुझको तो कुछ नहीं हुआ,

पर राजा की पीठ कट गई।

मुझको तो कुछ नहीं हुआ,

पर राजा की पीठ कट गई।

एक कौआ था। एक बार राजा ने उसे अपराधी ठहराया और अपने आदमियों से कहा, "जाओ, इस कौए को गांव के कुएं के किनारे के दलदल में रौंदकर मार डालो।" कौए को दलदल में डाल दिया। वह खुशी-खुशी गाने लगा:

दलदल में फिसलना सीखते हैं, भाई!

दलदल में फिसलना सीखते हैं।

राजा को और उसके आदमियों को यह देखकर अचम्भा हुआ कि दलदल में डाल देने के बाद दुखी होने के बदले कौआ आनन्द से गा रहा है। राजा को गुस्सा आया। उसने हुक्म दिया, "इसे कुएं में डाल दो, जिससे यह डूबकर मर जाय।"

कौए को कुएं में डाल दिया गया। कौआ कुएं में पड़े-पड़े बोला:

कुएं में तैरना सीखते है, भाई!

कुएं में तैरना सीखते हैं।

राजा ने कहा, "अब इसको इससे भी कड़ी सजा देनी चाहिए।"

बाद में कौए को कांटों की एक बड़ी झाड़ी में डाल दिया गया। लेकिन कौआ तो वहां भी वैसे ही रहा। बड़ आनन्दी स्वर में गाते-गाते बोला:

कोमल कान छिदवा रहे है भाई!

कोमल कान छिदवा रहे हैं।

राजा ने कहा, "कौआ तो बड़ा जबरदस्त है! दु:ख कैसा भी क्यों ने हो, यह तो दुखी होता ही नहीं। अब यह देखें कि सुख वाली जगह में रखने से दु:ख होता है या नही?" उन्होंने उसे तेल की एक कोठी में डलवा दिया।

कौए भाई के लिए तो यह भी मौज की जगह रही वह खुश होकर बोला:

कान में तेल डलवा रहे हैं, भाई!

कान में तेल डलवा रहे हैं।

इसके बाद राजा ने कौए को घी की नांद में डलवा दिया। नांद में पड़ा-पड़ा कौआ बोला:

घी के लोंदे खाता हूं, भाई!

घी के लोंदे खाता हूं।

राजा बहुत ही गुस्सा हुआ और उसने कौए को गुड़ की कोठी में डलवा दिया। कौए भाई मौज में आकर बोले:

गुड़ के चक्के खाते हैं, भाई!

गुड़ के चक्क खाते है।

राजा क्या करे! उसने अब कौए को झोपड़े पर फिकवा दिया। पर वहा बैठे-बैठे भी कौआ बोला:

खपरैल डालना सीखते है, भाई!

खपरैल डालना सीखते हैं।

आखिर राजा ने थकर कहा, "इस कौए को हम कोई सजा नहीं दे सकेंगे। यह तो किसी दु:ख को दु:ख मानता ही नहीं है। इसलिए अब इसे खुला छोड़ दो, उड़ा दो।" कौए को उड़ा दिया गया।

मूर्ख बहू

एक था बनिया। एक बार वह व्यापार के लिएपरदेस जाने लगा। जाते-जाते अपनी बहु को बुलाकर उसने कहा, "मैं परदेस जा रहा हूं। तुम अच्छी तरह रहना। बच्चों को भी संभालना। और, मेरी मां को भी अपने बच्चों की तरह ही सम्भाल करना। याद रखना, मां से कोई काम मत करवाना।"

बहू ने कहा, "अच्छी बात है। जैसा आप कह रहे हैं, मैं वैसा ही करुंगी। आप निश्चिंत होकर जाइए।"

बहू ने बात ध्यान में रखी। बनिया तो चला गया। बहू ने दूसरे ही दिन मांजी से कह दिया, "मांजह! आपके बेटे मुझसे कह गए है कि मां को अपने बच्चों की तरह संभालना, और उनको कोई काम मत करने देना। अब आप घर का कोई काम मत कीजिए। आप तो इन बच्चों के साथ खेलिए, खाइए और मौज करिये।"

मांजी गहरे सोच में पड़ गईं, फिर बोलीं, "बहू, ठीक है। अब मैं ऐसा ही करुंगी।"

कुछ दिनों के बाद बहू ने अपनी बेटी के कान छिदवाये। उस समय बहू

को अपने पति की यह बात याद आई कि मां को बच्चों की तरह ही संभालना। इसलिए बहू ने मांजी के कान छिदवाने की बात सोची। उसने मांजी से कहा, "मांजी, चलिए, आपके कान छिदवाने हैं।"

सुनकर मांजी घबरा उठीं। उन्होंने बहू से कहा, "बहू, मुझे अपने कान नहीं छिदवाने हैं। क्या अब अपने इस बुढ़ापे में मैं कान छिदवाऊं?"

बहू बोली, "नहीं, मांजी। यह तो नहीं होगा। कान तो छिदवाने ही होंगे। आपके बेटे मुझसे कह गए हैं कि मैं आपको अपने बच्चों को तरह ही रखूं। मेरे लिए तो दोनों आंखें बराबर हैं। जेसी यह लड़की है वैसी ही आप भी हैं।"

मांजी मन-ही-मन समझ गईं और सुनार के पास बैठकर उन्होंने अपने कान छिदवा लिए। सुनार ने कान छेदे और कान में धागा भी डाला। बहू जिस तरह रोज़-रोज़ लड़की के कान में तेल लगाती थी, उसी तरह मांजी के कान में भी लगाती रही।

कुछ दिन बीते। जब कान ठीक हो गए, तो बहू ने अपनी बेटी के कान में पहनाने के लिए बाली बनवाई। दूसरी बाली मांजी के लिए भी बनवाई। फिर मांजी के पास जाकर बहू ने कहा, "मांजी! आइए, आपको यह बाली पहना दूं।"

मांजी ने कहा, "बहू, मुझको बाली क्यों पहनाती हो? मेरे जैसी बुढ़िया के लिए बाली की क्या जरुरत है? बाली तुम अपनी बेटी को पहनाओं। मुझको नहीं पहननी है।" लेकिन बहू नहीं मानी। जबरदस्ती करके मांजी को बाली पहना दी।

बाद में मांजी बाली पहनकर बच्चों के साथ घूमती, फिरती और खेलती रहीं। होते-होते आखा तीज आ गई। अच्छा दिन देखकर बहू ने अपने बेटे के सिर पर चोटी रखवाई। बहू को तुरन्त मांजी की याद आ गई। मांजी बच्चों के साथ खेल रही थीं। उन्हें वहां से बुलवा लिया और कहा, "मां

जी, आइए। नाई के सामने बैठिए। अपने लड़के की तरह मुझे आपके सिर पर भी चोटी रखवानी है। जब गोविन्द के चोटी रखवाई है, तो आपके क्यों न रखवाऊं? उठिए, जल्दी कीजिए। बाद में गोविन्द को और आपको लपसी खिलानी है।"

मांजी ने बहू को बहुत समझाया, पर बहू टस-से-मस न हुईं आखिर मांजी नाई के सामने बैठीं और उन्होंने अपने सिर पर चोटी रखवाई। बहू ने गोविन्द के और मांजी के सिर पर स्वस्तिक बनाया, दोनों को दूध और शकर से नहलाया और फिर दोनों को लपसी खिलाई।

बाद में बहू रोज मांजी की चोटी में तेल डालती, चोटी गूंथते और सिर पर ओढ़नी डालकर मांजी को बच्चों के साथ खेलने के लिए भेजती। जब खाने का समय होता, तो बहू आवाज़ देकर बुलाती:

कान में बाली, सिर पर चोटी, छोटो में मोटी!

आओ, खाना खाने आ जाओ।

यह सिलसिला रोज़-रोज चलता रहा। होते-होते एक दिन मांजी का बेटा परदेस से वापस आया। घर में आने के बाद बेटे ने बहू से पूछा, "मां कहां हैं? मुझको मां के पैर छूने हैं।"

बहू बोली, "’मांजी तो गली में खेलने गई हैं। अभी आ जायेगी।"

बेटे पूछा, "क्या कहती हो! मां गली में खेलने गई हैं? गली में तो बच्चे खेलते हैं। क्या बूढ़ी मां कहीं खेलने जाती हैं!"

बहू ने कहा, "मैं तो मां को खेलने भेजती हूं। आपने कहा नहीं था कि मां को बच्चों की तरह रखना। मैंने तो लड़की की तरह ही मां के भी कान बिंधवाएं हैं और कानों में बालियां पहनाई हैं। जब लड़के की चोटी रखवाई, तो मैंने मां की भी चोटी रखवा ली थी। जब मैं सबो खेलने भेजती हूं, तो मां को क्यों न भेजू? मुझको सबके साथ एक-सा व्यवहार करना चाहिए


पति समझ गया कि उसकी मूर्ख स्त्री की अकल का दिवाला निकल गया है। बाद में पति के कहने पर बहू ने मां को पुकारा:

कान में बाली, सिर पर चोटी, छोटों में मोटी!

आओ, खाना खाने आ जाओ!

मांजी गली में से खेलती-खेलती आई और अपने बेटे को देखकर उनकी आंखों में आंसू छलछला आए। मां की हालत देखकर बेटा भी दुखी हो उठा। बहू की मूर्खता के लिए बेटे ने मां से माफी मांगी और बहू को बड़ी उल्टी-सीधी सुनाई।


कंजूस सेठ चटोरी सेठानी


एक थे सेठ और एक थी सेठानी। सेठानी खाने-पीने की बहुत शौक़ीन और चटोरी, थीं सेइ बड़ा कंजूस था। लेकिन सेठानी बड़ी चंट थी। जब सेठ घर में होते तो वह कम खाती और सेठ बाहर चले जाते, तो वह बढ़िया-बढ़िया खाना बनाकर खाया करती।

एक दिन सेठ के मन में शक पैदा हुआ। सेठने सोचा—‘मैं इतना सारा सामान घर में लाता रहता हूं, पर वह इतनी जल्दी ख़तम कैसे हो जाता है? पता तो लगाऊं कि कहीं सेठानी ही तो नहीं खा जाती?’

सेठ ने कहा, "पांच-सात दिन के लिए मुझे दूसरे गांव जाना है। मेरे लिए रास्ते का खाना तैयार कर दो।" सुनकर सेठानी खुश हो गई। झटपट खाना तैयार कर दिया और सेठ को बिदा किया। सेठ सारा दिन अपने एक मित्र के घर रहे। शाम को जब सेठानी मन्दिर में गई, तो सेठ चुपचाप घर में घुस गए और घर की एक बड़ी कोठी में छिपकर बैठ गए। रात हुई। सेठानी की तो खुशी का पार न था। सेठानी ने सोचा--‘अच्छा ही हुआ। अब पांच दिन मीठे-मीठे पकवान बनाकर भरपेट खाती रहूंगी।’

रात अपने पास सोने के लिए सेठानी पड़ोस की एक लड़की को बुला लाई। लड़की का नाम था, खेलती। भोजन करने के बाद दोनों सो गई। आधी रात बीतने पर सेठानी जागी। उन्होंने खेतली से पूछा:

खेतली, खेतली,

रात कितनी?

खेतली बोली, "मां! अभी तो आधी रात हुई है।"

सेठानी ने कहा, "मुझको तो भूख लगी है। उधर उस कोने में गन्ने के सात टुकड़े पड़े है। उन्हें ले आओ। हम खा लें।" बाद में सेठानी ने और खेतली ने जी भरकर गन्ने खाए और फिर दोनों सो गई।

अन्दर बैठे-बैठे सेठजी कोठी के छेद में से सबकुछ देखते रहे। उन्होंने सोचा—‘अरे, यह तो बहुत दुष्ट मालूम होती है।’

फिर जब दो बजे, तो सेठानी जागी और उन्होंने खेतली से पूछा:

खेतली, खेतली,

रात कितनी?

खेतली बोली, "मां, अभी दूसरा पहर हुआ है।"

सेठानी ने कहा, "लेकिन मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लगी है। तुम छह-सात मठरी बना लो। आराम से खा लेंगे।"

कोठी में बैठे सेठजी मन-ही-मन बड़-बड़ाए, ‘अरे, यह तो कमाल की शैतान लगती है!’

खेतली ने मठरी बनाई। दोनों ने मठरियां खाईं और फिर सो गईं।

जैसे ही चार बजे, सेठानी फिर जागी और बोली:

खेतली, खेतली,

रात कितनी?

खेतली बोली, "मां, अभी तो सबेरा होने में थोड़ी देर है।"

सेठानी ने कहा, "बहन! मुझे तो बहुत भूख लगी है। थोड़ा हलुआ बना लो।" लड़की ने थोड़ा हलुआ बनाया। हलुए में खूब घी डाला। फिर दोनों ने हलुवा खाया और दोनों सो गईं। कोठी में बैठ-बैठे सेठजी दांत पीसने लगे। फिर ज्यों ही छह बजे, सेठानी उठ बैठी और बोली:

खेतली, खेतली!

रात कितनी?

खेतली ने कहा, "मां, बस, अब सबेरा होने को है।"

सेठानी बोली, "मैं तो भूखी हूं। तुम थोड़ी खील भून लो। हम खील खा लें और पानी पी लें।"

खेतली ने खील भून ली। दोनों ने खील खा लीं।

कोठी में बैठे सेठजी ने मन-ही-मन कहा—‘सबेरा होते ही है मैं इस सेठानी को देख लूंगा!’

खेतली अपने घर चली गई और सेठानी पानी भरने गई। इसी बीच सेठजी कोठी में से बाहर निकले, और गांव में गए। थोड़ी देर बाद हाथ में गठरी लेकर घर लौटे। सेठ को देखकर सेठानी सहम गई। उन्हें लगा, कैसे भी क्यों न हो, सेठ सबकुछ जान गए है।

सेठानी ने पूछा, "आप तो पांच-सात दिन के लिए दूसरे गांव गए थे। फिर इतनी जल्दी क्यों लौट आए?"

सेठ ने कहा, "रास्ते में मुझे अपशकुन हुआ, इसलिए वापस आ गया।"

सेठानी ने पूछा, "ऐसा कौन-सा अपशकुन हुआ?"

सेठ ने कहा, "एक बड़ा-सा सांप रास्ता काटकर निकल गया।"

सेठानी ने कहा,”हाय राम! सांप कितना बड़ा था?"

सेठ बोले, "पूछती हो कि कितना बड़ा था? सुनो वह तो गन्ने के सात टुकड़ों के बराबर था।"

सेठानी ने पूछा, "लेकिन उसका फन कितना बड़ा था?"

सेठ ने कहा, "फन तो इतना बड़ा था, जितनी सात मठरियां होती हैं।"

सेठानी ने पूछा, "वह सांप चल कैसे रहा था?"

सेठ ने कहा, "बताऊं? जिस तरह हलुए में घी चलता था।"

सेठानी ने पूछा, "क्या वह सांप उड़ता भी था?"

सेठ ने कहा, "हां-हां जिस तरह तबे में खील उड़ती है, उसी तरह सांप भी उड़ रहा था।"

सेठानी को शक हो गया कि सचमुच सेठ सारी बातें जान चुके हैं।

उसी दिन से सेठ ने अपनी कंजूसी छोड़ दी, और सेठानी ने अपना चटोरा-पन छोड़ा।

बनियों को स्वांग

बीस बनिये थे। बीसों यात्रा पर निकले। रास्ते में एक नाला मिला। नाले का नाम था, जांबुड़िया। नाला बहुत गहरा था। दिन में भी वहां धूप नहीं पहुंचती थी।

बनिये उस नाले के रास्ते जा रहे थे। वही उन्हें सामने से आते हुए चोर मिले। एक तो बनिये, जिस पर उन्हें चोर मिल गए। बनियों को घबराहट होने लगी। इतने में चोरों ने आवाज लगाई, "आप कौन लोग हैं? अपने कपड़े-लत्ते, जेवर-गहने सब यहीं उतार दो, नहीं तो मारे जाओगे।"

बनिये सब समय को पहचानने वाले थे। विरोध करके भी क्या कर पाते? बोली, "भैया, इनकार कौन करता है? लो ये कपड़े, ये लत्ते और ये सारे जेवर-गहने।" चोरों को तो मुंह मांगी मुराद मिल गई। उन्होंने जेवर-गहने, कपड़े-लत्ते सब फुरती से समेट लिए और गठरी बांधकर चल पड़े।

बनिये सब खड़े-के-खड़े रह गए, लेकिन मन-ही-मन सोचने लगे—‘यह तो कोई अच्छी बात नहीं कि चोर हमें इस तरह लूटकर चले जायं। इससे तो हमारी चतुर जात की लाज ही जायगी। इसलिए हमें कोई तरकीब जरुर सोचनी चाहिए।’

तरक़ीब सोचकर एक बनिया चोरों के पीछे दौड़ा। पास पहुंचकर उसने अपने दोनों हाथ जोड़े और गिड़गिड़ाकर बोला, "भाइयो, मेरी एक विनती है, ज़रा सुनिए।"

चोर बोले, "जाओ-जाओ, इस तरह गिड़गिड़ाओ मत। हम इतने भोले नहीं हैं कि तुम्हारी बातों में आ जायं। तुम बनिये हो, तो हम सवाये बनिये हैं!"

बनिये ने कहा, "भैया! इसमें भुलावा देने की तो कोई बात नहीं है। हम आपकी बराबरी कैसे कर सकते है?"

एक चोर बोला, "ठीक है। ज़रा ठहरें और सुने लें कि यह क्या कहना चाहता है?"

बनिये ने कहा, "हमने एक नया स्वांग सीखा है। हम चाहते हैं कि कुछ देर रुककर आप उसे देखते जाइए। हमें अपना यह स्वांग आगे के गांव में दिखाना है। आप पारखी लोग हैं। देखकर हमें बताइए कि यह काम हमको अच्छी तरह आता है या नहीं।"

दूसरा चोर बोला, "भाइयो, खबरदार! कहीं इसमें बनिया भाई की कोई चाल न हो! बनियों की चालाकी तो बनिये ही जानते हैं।"

बनिये ने कहा, "इसमें कोई चालाकी-वालाकी नहीं है। हम तो आपको अपना स्वांग भर दिखाना चाहत हैं। देखकर जायंगे, तो अच्छा ही है, नहीं तो आप पर हमारा कोई हुक्म तो चलता ही नहीं है।"

तीसरे चोर ने कहा, "अरे, तुम किसे समझा रहे हो? स्वांग तो भांडों का काम है। बनिये भी कहीं स्वांग करते हैं?"

बनिया बोला, "स्वांग बनिये भी करते हैं और उनके बाप भी करते हैं। मुसीबत के मारे सब कोई करते हैं। आप देखना चाहे, तो आपकों दिखा दें, नहीं तो रहने दें।"

चोरों ने कहा, "भाइयो! चलो, देखते चलें। हमकों इन बनियों-बक्कालों का डर ही क्या है। फिर हमारी ये बन्दूकें और तलवारे कहां गई हैं?"

चोर स्वांग देखने बैठ गए और बनियों ने स्वांग दिखाना शुरु किया।

बनिया पहला वेश गणपति बाबा का धरकर आया और गया।

चोर कहने लगे, "हां भाई, ये लोग स्वांग करना तो जानते हैं।"

फिर ब्राह्मण का वेश आया। ब्राह्मण बना बनिया बाबड़ी खोदता जाता था और गाता जाता था:

एक बम्मन बावड़ी खोदता,

दूसरा राम, राम बोलता।

चोरों ने कहा, "सचमुच, ये बनिये स्वांग रचना तो जानते हैं।" फिर बोले, "अरे हो बनियो! ये कोई नए स्वांग नहीं है। ये तो वे ही स्वांग हैं, जो सब जगह होते हैं।"

बनिये बोले, "भाइयो, नए स्वांग तो आगे आयंगे। अपने गए स्वांग ही तो हम आपको दिखाना चाहते हैं।" फिर एक बनिये ने जांबुड़िया का स्वांग रचा। जांबुड़िया बना बनिया कूदने, नाचने और गाने लगा।

यह करो, वह करो,

जांबुड़िया जाकर खबर करो।

बनिये सब नाचने और गाने लगे:

यह करो, वह करो,

जांबुड़िया जाकर खबर करो।

चोर एक-दूसरे के सामने देखने लगे और आपस में कहने लगे, "देखो, इन बनियों को तो देखो! ये दुकान चलाना छोड़कर स्वांग रचाने लगे है। स्वांग तो बढ़िया रचा लेते हैं।"

इसी बीच सब बनियों से हटकर एक बनिया अलग चलने लगा और गाने लगा:

यह करुं, वह करुं,

जांबुड़िया जाकर खबर करुं।

दूसरे सब बनिये दोहराने लगे और यह बनिया गाता-गाता पिछले पैरों जाने लगा। चोर तो देखते ही रहे। इस तरह गाता-गाता वह बनिया कहीं-

का –कहीं पहुंच गया। दूर जाने के बाद वह जांबुड़िया गांव पहुंचा। वहां थानेदार को सारी जानकारी देकर सिपाहियों के साथ नाले की तरफ रवाना हुआ।

इधर दूसरे बनियों ने एक के बाद दूसरा स्वांग पेश करना जारी रखा। केरबा नाच का स्वांग किया। विदूषक का स्वांग किया। और भी कई स्वांग दिखाये। इतने में घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी बनिये समझ गए कि सिपाही आ पहुंचे हैं। अब चोर पकड़े जायंगे।

घोड़ों की टापों की आवाज सुनकर चोर चौके। लेकिन इसी बीच बनियों ने घोड़े का स्वांग रचा और गाने लगे:

स्वांग वाले बनिये हाजिर हैं,

घोड़े का स्वांग लाये हैं।

चोरों ने सोचा कि यह तो घोड़े का स्वांग आया है, और इसीलिए घोड़ों की टापों की आवाज़ आ रही है। चोर बैठे रहे। इसी बीच खाकी पोशक वाले थानेदार और सिपाही दिखायी पड़े। चोर डरे और भागने लगे। तभी बनियों ने गाना शुरु किया:

स्वांग वाले बनिये हाजिर हैं,

थानेदार का स्वांग लाये हैं।

चोरों ने कहा, "अरे, यह तो स्वांग है! सचमुच इन बनियों ने बहुत ही बढ़िया स्वांग रचा है।"

इसी बीच थानेदार और सिपाही वहां आ पहुंचे और उन्होंने चोरों का पकड़ लिया।

बाद में बनियों ने अपने कपड़े-लत्ते और जेवर-गहने सब संभाल लिये और अपने घर पहुंच गए।

अभिमानी मेंढकी

एक मेंढकी थी। उसने एक मेंढक से ब्याह किया। एक बार मेंढकी हाथ में छाछ की दोहनी लेकर बाजार से छाछ लाने निकली। रास्ते में उसको एक हाथी मिला। नई दुलहन बनी मेंढकी को अपने रुप का थोड़ा अभिमान हो आया। उसने हाथी से कहा:

ओ, छपर पगे हाथी!

ज़रा देखकर चल,

नहीं तो कीमती रतन कुचल जायगा।

मेंढकी की शेखी भरी बात से हाथी को गुस्सा आ गया और उसने कहा:

ओ, फूले पेटवाली मेंढकी!

भगवान तुझे देखता है।

हाथी ने मेंढकी बाई को ‘फूले पेटवाली’ कहा, इससे अपने रुप का अपमान हुआ जानकर मेंढकी ने अपने पति मेंढक से कहा:

ओ बाड़ में बैठे राजा जी!

यह छपर पगा हाथी,

मुझको ‘फूले पेटवाली मेंढकी’ कहता है।

मेंढक ने सोचा कि यह मूर्ख मेंढकी घमण्ड में आकर कुचल जायगी। इसलिए अपना और मेंढकी का मान रखते हुए मेंढक ने कहा:

इधर आ जाओ, कोमलांगी गोरी!

हाथी झख मारता है।

जू बाई का भाग्य

एक थी जूं। एक बार उसकी इच्छा ब्याह करने की हुई, और वह ब्याह के लिए निकल पड़ी। चलते-चलते रास्ते में उसे एक कौआ मिला।

कौए ने पूछा, "जूं बाई! कहां जा रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

कौआ बोला, "मुझसे ही ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा, "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या ओढूंगी क्या?"

कौए ने कहा, "दाने खाना, पानी पीना, पंख पहनना और पंख ओढ़ना।"

जूं बोली, "नहीं-नहीं, मुझकों ब्याह नहीं करना है।"

कुछ दूर जाने पर जूं बाई को एक कुत्ता मिला।

कुत्ते ने पूछा, "जू बाई! कहां जो रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

कुत्ता बोला, "मुझसे ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा, "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या और ओढूंगी क्या?"

कुत्ते ने कहा, "रोटी खाना, पानी पीना, पहनने-ओढ़ने को कुछ नहीं मिलेगा।"

जूं बोली, "नहीं, नहीं, मुझको ब्याह नहीं करना है।"

जूं कुछ और आगे बढ़ी। रास्ते में मोर मिला।

मोर ने पूछा, "जूं बाई! कहां जा रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

मोर बोला, "मुझसे ही ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा, "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या और ओढूंगी क्या?"

मोर ने कहा, "मोती खाना, पानी पीना, पंख पहनना और पंख ओढ़ना।"

जूं बोली, "नहीं, नहीं मुझको ब्याह नहीं करना है।"

कुछ दूर और जाने पर उसे एक भैसा मिला।

भैंसे ने पूछा, "जूं बाई! कहां जा रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

भैंसा बोला, "मुझसे ही ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा, "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या और ओढ़नी क्या?"

भैंस बोला, "घास खाना, पानी पीना, पहनने-ओढ़ने को कुछ नहीं।"

जूं बोली, "नहीं, नहीं, मुझको ब्याह नहीं करना है।"

जूं बाई कुछ दूर और गई, तो रास्ते में पीपल का पेड़ मिला।

पीपल ने पूछा, "जूं बाई! कहां जा रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

पीपल बोला, "मुझपे ही ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या और ओढूंगी क्या?"

पीपल बोला, "हवा खाना, पानी पीना, पत्ते पहनता और पत्ते ओढ़ना।"

जूं बोली, "नहीं, नहीं। मुझको ब्याह नहीं करना है।"

और कुछ दूर जाने पर रास्ते में एक चूहा मिला।

चूहे ने पूछा, "जूं बाई! कहां जा रही हो?"

जूं ने कहा, "ब्याह करने।"

चूहा बोला, "मुझसे ही ब्याह कर लो।"

जूं ने पूछा, "खाऊंगी क्या? पीयूंगी क्या? पहनूंगी क्या और ओढूंगी क्या?"

चूहे ने कहा, "रोटी खाना, घी-गुड़ खाना, दूध पीना, पीताम्बर पहनना और चीर ओढ़ना।"

जूं बोली, "बहुत अच्छा। मैं तुम्हीं से ब्याह करती हूं।" ऐसा कहकर जूं बाई ने चूहे के गले में वरमाला पहना दी।

चूहे ने पीपल के एक पेड़ पर घर बनाया और वह जूं बाई के खाने के लिए रोज़-रोज अच्छी-अच्छी चीजें लाने लगा।

जूं बाई मन-ही-मन कहतीं, ‘चूहा अच्छा पति है।’

होते-होते एक दिन चूहा गुड़ से भरी गाड़ी में से गुड़ लेने पहुंचा। चूहे को पता नहीं चला कि गाउ़ी चल पड़ी। इसलिए वह गाड़ी के पहिए के नीचे आ गया और कुचल गया।

जब जूं बाई को पता चला कि उसका पति मर गया है, तो वह पीपल से नीचे उतरी और चूहे के पास पहुंची। घंघट निकालकर वह रोने-बिलखने लगी:

कौए पर रीझी नहीं, कुत्ते पर रीझी नहीं,

मोती चुगने वाले मोर पर, रीझी नहीं।

भैंसे पर रीझी नहीं, पीपल पर रीझी नहीं।

कैसे मेरे भाग, चूहे पर रीझी।

रला भाई गढ़वी

भारणिया नाम का एक छोटा-सा गांव थां उस गांव में सात-आठ घर राजा परिवार से जुड़े भाइयों और भतीजों के थे। ये सब ‘भायात’ कहलाते थें जो भी पैदावार होती, सो खा-पी लेते और पड़े रहते। उनके बीच एक गए़वी रहते थे। नाम था, रलाभाई। पर रलाभाई की किसी से कभी पटती नहीं थी। रलाभाई मुंहफट थे। कोई उनसे कुछ कहता, तो वे फौरन ही उलटकर सवाल पूछते और सामनेवाले को चूप कर दिया करते।

भायातों के पास भैसें बहुत थीं। पर रलाभाई के पास एक भी भैस नहीं थी। हां, एक भैंसा जरुर था। वह बड़े डील-डौल वाला था। भैसे के गले में एक घण्टी बंधी रहती थी। जब भैंसा चलता, तो घण्टी टन-टन-टन बजती रहती। जब रोज़ सुबह भायातों की भैसें चरने को निकलतीं, तो उनके पीछे-पीछे रलाभाई भी अपने भैंसे के साथ निकल पड़ते और कहते:

टन-टन घण्टी बजती है,

रला का भैसा चरने जाता है।

होते-होते कई दिन बीत गए। गांव के लोगों को लगा कि ये सारी भैसें रलाभाई की होंगी, इसीलिए वे कहते हैं:

टन-टन घण्टी बजती है,

रला का भैंसा चरने जाता है।

जब भायातों को इसका पता चला, तो वे नाराज हो गये। सब कहने लगें, "लो, देखा, यह स्वयं इतनी भैसों का मालिक बन गया है! इसकी अपनी तो एक बांडी भैंसे भी नहीं है। फिर यह क्यों कहता है:


टन-टम घण्टी बजती है,

रला के ढोर चरने जाते है।

इसका तो अपना एक बड़ा भैंसा ही है। भैंसे के गले में इसने एक घण्टी बांध रखी है। बस, इतने में ही यह बहक गया-सा लगता है। अच्छा है, किसी दिन इसे भी समझ लेंगे।",

मौका पाकर भायातों ने रलाभाई के भैंसे को मार डाला। सबने कहा, "बला टली!"

रलाभाई बड़े घाघ थे। वे इस बात को पी गए। मन ही मन बोले, ‘ठीक है, कभी मौक़ा मिलेगा, तो मैं देख लूंगा।‘,

रलाभाई ने भैंसे की पूरी खाल चमार से उतरवा ली। खाल की सफाई करवा लेने के बाद उन्होंने उसकी तह काट ली और सिर पर उठाकर चल पड़े।

चलते-चलते एक घने जंगल में पहुंचे। वहां बरगद का एक पेड़ था। उसका नाम था, चोर बरगद।सब चोर जब भी चोरी जब भी चोरी करके आते, तो इसी बरगद के नीचे बैठकर चोरी के माल का बंटवारा किया करते। रलाभाई बरगद पर चढ़कर ‘बैठ गए। डाल पर चमड़ा टांग दिया।

जब रात के दो बजे, तो चोऱ वहां पहुंचे। किसी नगर सेठ की हेवली में सेंध लगाकर और बड़ी चोरी करके वे वहां आए थे। चोर चोरी के माला का बंटवारा करने बैठे। एक चोर नपे कहा, " सुनों भैया, कोई अपने पास का माल दबाकर रखेगा, तो उस ऊपर से आसमान टूट पड़ेगा"

बंटवारा करते सयम एक चोर ने पीछे कोई चीज़ छिपाई। रलाभाई नेइसे देख लिया। उनहोंने ऊपर से चमड़ा फेका, जो कड़कड़ाता हुआ नीचे गिरा।

चारे बोले, "भागो रे, भागो! यह तोक कड़कड़ाती हुई बिजली गिरी है।"

चोर डर गए और भाग खड़े हुए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तक नहीं। बाद में बड़े आराम के साथ रलाभाई नीचे उतरे और सारी माया लेकर अपने घर पहुंचे।

अपने झोंपडे का दरवाजा बन्द करके रलाभाई रुपए गिनने बैठे। वे सुनकर पास-पड़ोस के लोग कहने लगे, "अरे, इपन रलभाई के पास तो एक कानी कौड़ी तक नहीं थी अब ये इतने बड़े पैसे वाले कैसे बन गए?",

सबने पूछा, "रलाभाई! इतनी बड़ी कमाई आप कहां से कर लाये?"

रलाभाई ने कहा, "मैंने अपने भैंसे का चमड़ा जो बेचा, उसी के ये दाम मिले हैं। ओहो, उधर चमड़े की कितनी मांग है! बस, कूछ पूछिए मत। मेरा तो एक ही भैंसा था। उसके मुश्किल से इतने रुपए मिले हैं। अगर कई भैंसे होते, तो एक लाख रूपय मिल जाते ।"

भायातों को पता चला। उन्होंने कहा, "तो आओ हम भी चलें, और रलाभाई की रतह कमाई करके लायें।" भायातों ने अपनी सब भैंसें मार डालीं। उनकी खालें उतरवाई। खालों की सफाई करवाई, और सिर पर खालें रखकर बेचने चले ।

लेकिन इतनी सारी खालें कौन खीरदता? मुश्किल से चार-छह खालें बिकीं और दस-पन्द्रह रूपए मिले। खालों के लाख रूपये कौन देने बैठा था!

शाम हुई और भायात सब इकट्ठे हुए। सबने कहा, "अरे, इन रलाभाई ने तो हम सबकों ठग लिया है! ठीक हैं, कभी देखेंगे।"

कुछ दिनों के बाद भायातों ने इकट्ठे होकर रलाभाई का झोपड़ा जला डाला। रलाभाई बोले, " अच्छी बात है। आप लोगों ने मेरा तो झोंपड़ा ही

जलाया है, लेकिन मैं आप सबके घर न जलवा दूं, तो मेरा नाम रला गढ़वी नहीं।"

रलाभाई ने झोपड़े की राख एक थैले में इकट्ठी की। एक लद्दू बैल पर राख का थैला लादा और पालीनाना जा रहे यात्रियों के एक संघ के साथ रलाभाई भी जुड गए। संघ मे एक बूढ़ी मांजी थीं। बेचारी चल नहीं पाती थी।

मांजी के पास बहुत-सा धन था। रलाभाई के लद्दू बैल को देखकर मांजी ने कहा, "भैया! क्या अपने इस बैल पर मुझे बैठा लोगे?"

रलाभाई बोले, " मांजी, मैं ज़रुर बैठा लूंगा। लेकिन इस थैले में मेरा धन भरा है। अगर बैल पर बैठे-बैठे आपने हवा नहीं निकालें, तो मैं आपको बैठने दूं।"

मांजी ने कहा, "भैया! मुझे तुम्हारी बात मंजूर है।"

चलते-चलते पालीनाना आ पहुंचा और मांजी बैल पर से उतर पड़ी। रलाभाई ने कहा, "मांजी, जरा, ठहरिए। मुझे अपना धन देख लेने दीजिए।"

थैले में तो राख ही थी। देखने पर राख ही दिखाई पड़ी। रलाभाई ने कहा, "मांजी! इसमें तो राख है। क्या आपनें हवा निकाली?"

मांजी सच बोलनेवाली थीं। बेचारी बोलीं, "हां भैया! थोड़ी हवा निकाली तो थी।"

रलाभाई बोले, "तब तो मांजी! आपको अपना सब धन मुझको दे देना होगा।"

मांजी ने लाचार होकर अपना सारा धन दे दिया।

रलाभाई मांजी का धन लेकर घर लौटे। रात होते ही रलाभाई फिर रुपये खनखनाने बैठ गए।

लोगों ने पूछा, "रलाभाई! इतने रुपये तुम और कहां से ले आए!

रलाभाई ने कहा, "मेरे झोंपड़े की जो राख निकली थी, उसे मैंने बेचडाला। उसी के ये रूपय मिले हैं। मेरा कोई बड़ा घर तो था ही नहीं, जो मुझे ज्यादा रूपय मिलते, नहीं तो एक लाख रुपय मिल जाते।"

भायातों ने सोचा-‘आओं, हम सब भी वहीं करें, जो रलाभाई ने किया है। रलाभाई इतने मालदार बन जायं,तो भला हम क्यों पीछे रहें?’

भायातों ने जमा होकर अपने सारे घर जला डाले। इन घरों की राख के बड़े बड़े ढेर खड़े हो गए। भायात टोकनों में राख भर-भरकर उसे बेचने निकले बोलते चले-" लेनी है, किसी को राख? राख लेनी है?"

गांव के लोगों ने कहा, " राख को तो तुम अपने सिरों पर ही मल लो भला इतनी राख कौन खरीदेगा?"

सब उदास चेहरे लेकर घर वापस आए। सबने कहा, " इन रलाभाई तो हमें खूब ही ठगा!"

फिर रलाभाई ने अपने लिए बड़े-बड़े घर बनवाए। बहुत-सी भैंसे खरी ली। एक भैंसा भी पला लिया, और उसके गले में एक घण्टी लटका दी।

अब तो रलाभाई अपनी भैंसों के साथ भैसें को जगंल मे चराने ले जा और रास्ते-भर गाते जाते:

टन-टन घण्टी बजती है,

रलाभाई की भैंसे चरती हैं।.

नाई और बाघ

एक था नाई। वह बड़ी समझवाला आदमी था। एक बार नाई दूसरे गांव जाने के लिए निकला। साथ में हजामत बनाने की पेटी भी थी।

रास्ते में एक बहुत बड़ा और घना जंगल पड़ा। नाई अपने रास्ते चला जा रहा था कि इसी बीच उसे एक बाघ आता दिखाई पड़ा। नाई घबरा उठा।

सोचा- ‘अब तो बेमौत मरे! यह बाघ मुझे क्यों छोड़ने लगा?’

इसी बीच नाई को एक तरकीब सूझी। जैसे ही बाघ पास आया, नाई गरजकर बोला, "आ जा कुत्ते! अब तेरी क्या ताक़त है कि तू मेरे हाथ से छूट-कर भाग सके। देख, इस एक बाघ की तो मैंने अन्दर बन्द किया ही है, और अब तेरी बारी है।" नाई ने बाघ को कुत्ता कहा था, इसलिए बाघ तो आग-बबूला हो उठा था। वह छलांग मारकर नाई पर झपटा। तभी नाई ने आईना मुंह देखा।

उसने सोचा-‘सचमुच इस नाई की बात तो सही मालूम होती है। एक बाघ


तो पकड़ा हुआ दीख ही रहा है। अब यह मुझे भी पकड़ लेगा।’ फिर तो बाघ इतना डरा कि वहां से जान लेकर भागा।

नाई ने आईना अपनी पेटी मे रख लिया और वह आगे बढ़ा। चलते- चलते रात हो गई। नाई एक बड़े से बरगद पर जा बैठा और रात वहीं रह गया।हजामत की पेटी उसने एक डाल पर टांग दी, और वह आराम से बैठ गया। कुछ ही देर के बाद बरगद के नीचे बाघ इकट्ठे होने लगे। एक, दो तीन चार इस तरह कई बाघ जमा हो गए।

आज वहां बाघों को अपना वन-भोजन था। उन बहुत से बाघों में वह बाघ बोला, "अरे भैया! आज तो गज़ब हो गया!"

सब बाघ पूछने लगें, "क्या हुआ?"

बाघ बोला, "आज एक नाई मुझे रास्ते में मिला। जब मैं उस पर झपटा और उसे खाने दौड़ा तो, वह बोला, ‘अरे कुत्ते! एक को तो मैंने बन्द किया ही है, अब तेरी बारी है। तू भी आ जा।’ जैसे ही मैं उसे खाने दौड़ा,उसने अपनी पेटी में से एक बाघ निकाला और मुझे दिखाया। मैं तो इतना डर गया कि पूंछ उठाकर भाग खड़ा हुआ।"

एक बाघ ने कहा, " बस करो, बस करो, बेमतलब की गप मत हांको। भला, कोई नाई किसी बाघ को इस तरह पकड़ सकता है?"

बाघ बोला, " अरे भैया! मैंने तो उसे अपनी आंखों से देखा है।"

दूसरे बाघ ने कहा, "ऊहं! तुम तो डरपोक हो, इसलिए डरकर भाग खड़े हुए। तुम्हारी जगह मैं होता,तो उसे वहीं खत्म कर देता।"

बाघों को बातें सुनकर नाई तो पसीना-पसीना हो गया। वह इस तरह थर-थर कांपने लगा कि बरगद की डालियां हिल उठीं एक डाल पर एक बंदर सो रहा था। डाल के हिलने पर वह नीचे आ गिरा। तभी नाई ने होशियारी से काम लेकर कहा, "भैया, पकड़ लो उसे बाघ को। ख़बरदार, छोड़ना मत! यह बाघ बहुत सयाना बन रहा है।"

सुनकर बाघ ने कहा, " देखों, मैं कहता था न कि कोई बाघों को पकड़ने निकला है?"

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि बंदर उस बाघ पर ही आ गिरा । बाघ तो छलांगे मारता हुआ भाग निकला। उसके पीछे-पीछे दूसरे सब बाघ भी भागे। सब-के सब बाघ गायब हो गये।

सबेरा होने पर नाई आराम के साथ बरगद से नीचे उतरा और अपने घर पहुंच गया।

मां-जाया भाई

एक था भाई और एक थी बहन। दोनों को छोटा। छोड़कर मां-बाप मर गये थे। घर में एक दिन का खाना भी नहीं रह गया था, इसलिए भाई बहन दोनों कमाने-खाने के इरादे से एक दूसरे गांव जाने के लिए रवाना हुए।

चलते-चलते रास्ते में उनकों एक बड़ा नगर मिला। नगर के बाहर एक बड़ा-सा बगीचा था। शाम हो चुकी थी, इसलिए भाई बहन दोनों रात को बगीचे में ही रहे। रात ही रात में बहन की आंखें जोरों से दुखने लगीं। वह रोनलगी। इस पर भाई ने कहा, " तुम यहीं बैठना। मैं नगर में जाकर तुम्हारे लिए दवा ले आता हूं। बाद में हम इस बगीचे की मालिन के पास चलेंगे, तो वह तुम्हारी आंख में दवा लगा देगी।"

बहन ने कहा, " अच्छी है।"

भाई तो सुबह जल्दी उठकर नगर की तरफ चला गया। उस नगर का राजा पिछली रात को ही मर गया था। राजा का अपना कोई लड़का था नहीं।

राजा के मंत्रियों के सामने सवाल खड़ा हुआ कि गद्दी पर किसे बैठाया जाय? सब मंत्रियों ने आपस में सलाह की ओर यह तय किया। कि सबेरे-सबेरे नगर के गढ़ का फाटक खुलते ही जो भी कोई सबसे पहले सामने आ जाये, उसी को गद्दी पर बैठा दिया जाय।

सबेरा हुआ। सब गढ़ का दरवाजा खोलने चले। ज्योंही मंत्रियों ने दरवाजा खोला, वह भाई उनको दिखाई दिया। सब उसको राज दरबार में ले आए और उसे राजगद्दी पर बैठा दिया। अचानक राज्य मिल जाने से भाई तो इतना खुश हो गया कि अपनी बहन की बिलकुल भूल गया। वह राज के काम-काज में उलझ गया और मौज से रहने लगा।

उधर बगीचे में बैठी-बैठी बहन भाई की बाट बराबर देखती रही।

दोपहर का समय हुआ,पर भाई वापस नहीं आया। शाम हो गयी, पर भाई कहीं दिखाई नहीं पड़ा। बहन घबराकर रोने लगी। इसी बीच बगीचे की मालिन वहां आई कहने लगी, "पता नहीं तुम्हारा भाई कहां चला गया है। अब तुम मेरे साथ चलो। मेरी अपनी एक भी बेटी नहीं है। तुम मेरी बेटी बन जाओं।"

बाद में बहन रोती-रोती मालिन के घर पहुंची और वहां उसकी बेटी बनकर रहने लगी।

बहन ने भाई की खोज शुरु की। खोजने खाजते उसे पता चला कि भाई तो राजा बनकर राज कर रहा है। वह कुछ बोली नहीं, और सारी बात मन ही मन समझकर चुप रह गई।

इन्हीं दिनों एक बार राजा नगर के बाहर घूमने निकला। उसने बगीचे में मालिन की बेटी को देखा। वह अब सयानी हो चुकी थी, इसलिए राजा के मन में उससे ब्याह कर लेने की इच्छा पैदा हुई। राजा ने मालिन को बुलवाया और कहा, "तुम अपनी इस बेटी का ब्याह मुझसे कर दो।"

मालिन बहुत खुश हुई। उसने राजा से कहा, "बहुत अच्छी बात है।मैं अपनी बेटी का ब्याह आपके साथ कर दूंगी।"

मालिन की बेटी तो जानती थी कि राजा उसका अपना सगा भाई है। उसने राजा के साथ ब्याह करने से इनकार कर दिया । पर मालिन ने उस बेचारी की बात मानी नहीं । उसने कहा, :तुमको राजा के साथ ब्याह करना ही होगा।"


बाद में ब्याह का दिन तय हुआ और जब मालिन ने बहन को ब्याह के मण्डप में बैठा दिया, तो राजा की तरफ देखकर बहन कहने लगी:

मण्डप में मत बैठो, ऐ मेरे मां जाए भाई,

हम एक ही मां के बच्चे हैं, मेरे मां जाए भाई।

हम ठहरे थे। बगीचेक में, मेरे मां जाए भाई,

म गए थे दवा लेने मेरे मां जाए भाई।

राजा ने यह सब सुना पर वह कुछ समझा नहीं। आगे जब राजा मण्डप में आकर बैठा, तो बहन फिर बोली:

मण्डप में मत बैठो, ऐ मेरे मां जाए भाई,

हम एक ही मा के बच्चे हैं, मेरे मां जाए भाई।

हम ठहरे थे। बगीचे में, मेरे मां जाए भाई,

तुम गए थे दवा लेने, मेरे मां जाए भाई।

राजा फिर भी कुछ नहीं समझा। बहन ने तीसरी बार फिर अपनी बात दोहराई:


राजा सोचने लगा, ‘भला यह ऐसा क्यों कह रही है?’इसी बीच बहन चौथी बार फिर वही कहा।

अब राजा ने सोचा, ‘कहीं यह मेरी बहन तो नहीं हैं?’ ध्यान से देखा तो उसने बहन को पहचान लिया। भाई शर्मिन्दा हो गया। उसके मन में भारी पछतावा हुआ और वह अचानक खिड़की से कूदकर मर गया। भाई के पीछे। बहन भी खिड़की से कूदी और मर गई। ]

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