ईंट की दीवार / जलालुद्दीन रूमी

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दो शब्द

मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन कृत 'मसनवी' फारसी साहित्य में अनूठा ग्रन्थ है। संसार की सर्वोत्तम पुस्तकों में उसकी गणना की जाती है और दुनिया की प्राय: सभी जीवित भाषाओं में उसका अनुवाद हो चुका है। उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी हुईं है कि फारसी-दां लोगों की दुनिया में शायद ही कोई ऐसा घर मिले, जहां रूमी का यह ग्रंथ न हो।

प्रसिद्ध विद्वान् निकलसन ने लिखा है, " 'मसनवी' में धार्मिक गीतों के सभी गुण वर्तमान हैं। पर्वत के गाने, गुलाब के रंग तथा सुगंध इत्यादि से पद ओत-प्रोत हैं। ईश्वर की व्यापकता सभी में दिखायी गयी है। मौलाना रूमी की कविता पढ़ने से ऐसा मालूम होता है, मानो हम किसी स्वर्गीय वेगवती सरिता का गान सुन रहे हैं। शब्द-योजना हृदय को हिलाने वाली और आनंददायिनी है।"

इस महान ग्रंथ में कथाओं और उपाख्यानों द्वारा भक्ति, वैराग्य अध्यात्म, नीति आदि के उपदेश दिये गए हैं और कहने का ढंग ऐसा हृदयहारी और चमत्कारपूर्ण है कि कैसा ही शुष्क व्यक्ति क्यों न हो, उसपर भी प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। प्रत्येक कथा के अन्त में ऐसा सुन्दर परिणाम निकाला गया है कि पढ़नेवाला मुग्ध हो जाता है।

'मसनवी' बहुत बड़ा ग्रन्थ है। मैंने उसमें से कुछ चुनी हुई शिक्षाप्रद कहानियों का हिन्दी अनुवाद किया है। आशा करता हूं कि वे पाठकों को रुचिकर होंगी।

अनुवाद करने में मैने निम्नलिखित पुस्तकों से सहायता ली है:

१. मरातुल मसनवी (फारसी): सं० काजी तलम्मुज़ हुसैन।

२. हिकायते रूमी (उर्दू): अनु० मिर्जा निज़ामशह 'लबीब'

३. सवाने उमरी-मौलाना रूमी (उर्दू): ले० मौलवी शिबली।

४. मौलाना रूमी और उनका उर्दू काव्य: ले० श्री जगदीश चन्द्र वाचस्पति।

मैं उनके लेखकों का आभारी हूं।

—चौधरी शिवनाथसिंह शांडिल्य

ईंट की दीवार

अनुक्रम

१. चोर बादशाह
२. अन्धा, बहरा और नंगा
३. लाहौल वला कूवत
४. चौपायों की बोली
५. साधु की कथा
६. फूट बुरी बला
७. खारे पानी का उपहार
८. स्वच्छ ह्रदय
९. मूर्खों से भागो
१०. मूसा और चरवाहा
११. ईश्वर की खोज
१२. चुड़ैल का जादू
१३. बुद्धिमानों को संग
१४. हजरत अली और काफिर
१५. मोह का जाल
१६. हवा और मच्छर का मुकदमा
१७. बाज़ और बादशाह
१८. मित्र की परख
१९. पथ-प्रदर्शक
२०. लुकमान की परीक्षा
२१. हुदहुद और कौआ
२२. चोर की चालाकी
२३. चूहा और ऊंट
२४. नि:स्वार्थ दान
२५. तोता और गंजा फकीर
२६. सच्चा प्रेम
२७. दूरदर्शी
२८. कांटों की झाड़ी
२९. वैयाकरण और मल्लाह
३०. मन को मार
३१. 'तू' और 'मैं'
३२. अच्छे-बुरे की परीक्षा
३३. ईंट की दीवार

ईंट की दीवार

१/ चोर बादशाह

बादशाह का नियम था कि रात को भेष बदलकर गज़नी की गलियों में घूमा करता था। एक रात उसे कुछ आदमी छिपछिप कर चलते दिखई दिये। वह भी उनकी तरफ बढ़ा। चोरों ने उसे देखा तो वे ठहर गये और उससे पूछने लगे, "भाई, तुम कौन हो? और रात के समय किसलिए घूम रहे हो?" बादशाह ने कहा, "मैं भी तुम्हारा भाई हूं और आजीविका की तलशा में निकला हूं।" चोर बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे, "तूने बड़ा अच्छा किया, जो हमारे साथ आ मिला। जितने आदमी हों, उतनी ही अधिक सफलता मिलती है। चलो, किसी साहूकार के घर चोरी करें।" जब वे लोग चलने लगे तो उनमें से एक ने कहा, "पहले यह निश्चय होना चाहिए कि कौन आदमी किस काम को अच्छी तरह कर सकता है, जिससे हम एक-दूसरे के गुणों को जान जायं जो ज्यादा हुनरामन्द हो उसे नेता बनायें।"

यह सुनकर हरएक ने आनी-अपनी खूबियां बतलायीं। एक बोला, "मैं कुत्तो की बोली पहचानता हूं। वे जो कुछ कहें, उसे मैं अच्छी तरह समझ लेता हूं। हमारे काम में कुत्तों से बड़ी अड़चन पड़ती है। हम यदि बोली जान लें तो हमारा ख़तरा कम हो सकता है और मैं इस काम को बड़ी अच्छी तरह कर सकता हूं।"

दूसरा कहने लगा, "मेरी आंखों में ऐसी शक्ति है कि जिसे अंधेरे में देख लूं, उसे फिर कभी नहीं भूल सकता। और दिन के देखे को अंधेरी रात में पहचन सकता हूं। बहुत से लोग हमें पचानकर पकड़वा दिया हैं। मैं ऐसे लोगों को तुरन्त भांप लेता हूं और अपने साथियों को सावधान कर देता हूं। इस तरह हमारी रक्षा हो जाती है।"

तीसरी बोला, "मुझमें ऐसी शक्ति है कि मज़बूत दीवार में सेंध लगा सकता हूं और यह काम मैं ऐसी फूर्ती और सफाई से करता हूं कि सोनेवालों की आंखें नहीं खुल सकतीं और घण्टों का काम मिनटों में हो जाता है।"

चौथा बोला, "मेरी सूंघने की शक्ति ऐसी विचित्र है कि ज़मीन में गड़े हुए धन को वहां की मिट्टी सूघकर ही बता सकता हूं। मैंने इस काम में इतनी योग्यता प्राप्त की है कि शत्रु भी सराहना करते हैं। लोग प्राय: धन को धरती में ही गाड़कर रखते हैं। इस वक्त यह हुनर बड़ा काम देता है। मैं इस विद्या का पूरा पंडित हूं। मेरे लिए यह काम बड़ा सरल हैं।"

पांचवे ने कहा, "मेरे हाथों में ऐशी शक्ति है कि ऊंचे-ऊंचे महलों पर बिना सीढ़ी के चढ़ सकता हूं और ऊपर पहुंचकर अपने साथियों को भी चढ़ा सकता हूं। तुममें तो कोई ऐसा नहीं होगा, जो यह काम कर सके।"

इस तरह जब सब लोग अपने-अपने गुण बता चुके तो नये चोर से बोले, "तुम भी अपना कमाल बताओ, जिससे हमें अन्दाज हो कि तुम हमारे काम में कितनी सहायता कर सकते है।" बादशाह ने जब यह सुना तो खुश हो कर कहने लगा, "मुझमें ऐसा गुण है, जो तुममें से किसी में भी नहीं है। और वह गुण यह है कि मैं अपराधों को क्षमा करा सकता हूं। अगर हम लोग चोरी करते पकड़े जायें तो अवश्य सजा पायेंगे। परन्तु मेरी दाढ़ी में यह खूबी है कि उसके हिलते ही अपराध क्षमा हो जाते हैं। तुम चोरी करके भी साफ बच सकते हो। देखो, कितनी बड़ी ताकत है मेरी दाढ़ी में!"

बादशाह की यह बात सुनकर सबने एक स्वर में कहा, "भाई तू ही हमारा नेता है। हम सब तेरी ही अधीनता में काम करेंगे, ताकि अगर कहीं पकड़े जायें तो बख्शे जा सकें। हमारा बड़ा सौभाग्य है कि तुझ-जैसा शक्तिशाली साथी हमें मिला।"

इस तरह सलाह करके ये लोग वहां से चले। जब बादशाह के महल के पास पहुंचे तो कुत्ता भूंका। चोर ने कुत्ते की बोली पहचानकर साथियों से कहा कि यह कह रहा है कि बादशाह हैं। इसलिए सावधान होकर चलना चाहिए। मगर उसकी बात किसीने नहीं मानी। जब नेता आगे बढ़ता चला गया तो दूसरों ने भी उसके संकेत की कोई परवा नहीं की। बादशाह के महल के नीचे पहुंचकर सब रुक गये और वहीं चोरी करने का इरादा किया। दूसरा चोर उछलकर महल पर चढ़ गया। और फिर उसने बाकी चोरों को भी खींच लिया। महल के भीतर घुसकर सेंध लगायी और खूब लूट हुई। जिसके जो हाथ लगा, समेटता गया। जब लूट चुके तो चलने की तैयारी हुई। जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और अपना-अपना रास्ता लिया। बादशाह ने सबका नाम-धाम पूछ लिया था। चोर माल-असबाब लेकर चंपत हो गये।

बादशाह ने मन्त्री को आज्ञा दी कि तुम अमुक स्थान में तुरन्त सिपाही भेजो और फलां-फलां लोगों को गिरफ्तार करके मेरे सामने हाजिर करो। मन्त्री ने फौरन सिपाही भेज दिये। चोर पकड़े गये और बादशाह के सामने पेश किये गए। जब इन लोगों ने बादशाह को देखा तो दूसरे चोर ने कहा है कि "बड़ा गजब हो गया! रात चोरी में बादशाह हमारे साथ था

और यह वही नया चोर था, जिसने कहा था कि "मेरी दाढ़ी में वह शक्ति है कि उसके हिलते ही अपराध क्षमा हो जाते हैं।"

सब लोग साहस करके आगे बढ़े और बादशाह का अभिवादन किया। बादशाह ने पूछा, "तुमने चोरी की है?" सबने एक स्वर में जवाब दिया, "हां, हूजर! यह अपराध हमसे ही हुआ है।"

बादशाह ने पूछा, "तुम लोग कितने थे?"

चोरों ने कहा, "हम कुल छ: थे।"

बादशाह ने पूछा, "छठा कहां है?"

चोरों ने कहां, "अन्नदाता, गुस्ताखी माफ हो। छठे आप ही थे।"

चारों की यह बात सुनकर सब दरबारी अचंभे में रह गये। इतने में बादशाह ने चोरों से फिर पूछा, "अच्छा, अब तुम क्या चाहते हो?"

चोरों ने कहा, "अन्नदाता, हममें से हरएक ने अपना-अपना काम कर दिखाया। अब छठे की बारी है। अब आप अपना हुनर दिखायें, जिससे हम अपराधियों की जान बचे।"

यह सुनकर बादशाह मुस्कराया और बोला, "अच्छा! तुमको माफ किया जाता है। आगे से ऐसा काम मत करना।"

[संसार का बादशाह परमेश्वर तुम्हारे आचराणों को देखने के लिए सदैवा तुम्हारे साथ रहता है। उसके साथ समझकर तुम्हें हमेशा उससे डरते रहना चाहिए और बुरे कामों की ओर कभी ध्यान नहीं देना चाहिए।]१

२/ अंधा, बहरा और नंगा

किसी बड़े शहर में तीन आदमी ऐसे थे, जो अनुभवहीन होने पर भी अनुभवी थे। एक तो उसमें दूर की चीज देख सकता था, पर आंखों से अंधा था। हजरत सुलेमान के दर्शन करने में तो इसकी आंखें असमर्थ थीं, परन्तु चींटी के पांव देख लेता था। दूसरा बहुत तेज़ सुननेवाला, परन्तु बिल्कुल बहरा था। तीसरा ऐसा नंगा, जैसे चलता-फिरता मुर्दा। लेकिन इसके कपड़ों के पल्ले बहुत लम्बे-लम्बे थे। अन्धे ने कहा, "देखो, एक दल आ रहा है। मैं देख रहा हूं कि वह किस जाति के लोगों का है और इसमें कितने आदमी हैं।" बहरे ने कहा, "मैंने भी इनकी बातों की आवाज सुनी।" नंगे ने कहा, "भाई, मुझे यह डर लग रहा है कि कहीं ये मेरे लम्बे-लम्बे कपड़े न कतर लें।" अन्धे ने कहा, "देखो, वे लोग पास आ गये हैं। अरे! जल्दी उठो। मार-पीट या पकड़-धकड़ से पहले ही निकल भागें।" बहरे ने कहा, हां, इनके पैरों की आवाज निकट होती जाती है।" तीसरा बोला, "दोस्तो होशियार हो जाओ और भागो। कहीं ऐसा न हो वे मेरा पल्ला कतर लें। मैं तो बिल्कुल खतरे में हूं!"

मललब यह कि तीनों शहर से भागकर बाहर निकले और दौड़कर एक गांव में पहुंचे। इस गांव में उन्हें एक मोटा-ताज़ा मुर्गा मिला। लेकिन वह बिल्कुल हड्डियों की माला बना हुआ था। जरा-सा भी मांस उसमें नहीं था। अन्धे ने उसे देखा, बहरे ने उसकी आवाज सुनी और नंगे ने पकड़कर उसे पल्ले में ले लिया। वह मुर्गा मरकर सूख गया था और कौव ने उसमें चोंच मारी थी। इन तीनों ने एक देगची मंगवायी, जिसमें न मुंह था, न पेंदा। उसे चूल्हे पर चढ़ा दिया। इन तीनों ने वह मोटा ताजा मुर्गा देगची में डाला और पकाना शुरु किया और इतनी आंच दी कि सारी हड्डियां गलकर हलवा हो गयीं। फिर जिस तरह शेर अपना शिकार खाता है उसी तरह उन तीनों ने अपना मुर्गा खाया। तीनों ने हाथी की तरह तृप्त होकर खाया और फिर तीनों उस मुर्गें को खाकर बड़े डील-डौलवाले हाथी की तरह मोटे हो गये। इनका मुटापा इतना बढ़ा कि संसार में न समाते थे, परन्तु इस मोटेपन के बावजूद दरवाज़े के सूराख में से निकल जाते थे।

[इसी तरह संसार के मनुष्यों को तृष्णा को रोग हो गया है कि वे दुनिया की प्रत्येक वस्तु को, भले ही वह कितनी ही गन्दी हो, पर प्रत्यक्ष रुप में सुन्दर हो, अपने पेट में उतारने की इच्छा रखते हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह हाल है कि बिन मृत्यु के मार्ग पर चले इन्हें चारा नहीं और वह अजीब रास्ता है, जो इन्हें दिखाई नहीं देती। प्राणियों के दल-के-दल इसी सूराब से निकल जाते हैं और वह सूराख नजर नहीं आता। जीवों का यह समूह इसी द्वार के छिद्र में घुस जाता है और छिद्र तो क्या, दरवाजा तक भी दिखाई नहीं देता और इस कथा में बहरे का उदाहरण यह है कि अन्य प्राणियों की मृत्यु का समाचार तो वह सुनता है, परन्तु अपनी मौत से बेखबर है।

तृष्णा का उदाहरण उस अन्धे से दिया गया है, जो अन्य मनुष्यों के थोड़े-थोड़े दोष तो देखता है, लेकिन अपने दोष उसे नजर नहीं आते। नंगे की मिसाल यह है कि वह स्वयं नंगा ही आया है और नंगा ही जाता है। वास्तव में उसका अपना कुछ नहीं हैं। परन्तु सारी उम्र मिथ्या भ्रम में पड़कर समाज की चोरी के भय से डरता रहता है। मृत्यु के समय तो ऐसा मनुष्य और भी ज्यादा तड़पता है। परन्तु उसकी आत्मा खूब हंसती है कि जीवनकाल में यह सदैव का नंगा मनुष्य कौनसी वस्तु के चुराये जाने के भय से डरता था। इसी समय धनी मनुष्य को तो यह मालूम होता है कि वास्तव में वह बिल्कुल निर्धन था। लोभी को यह पता चलता है कि सारा जीवन अज्ञानता में नष्ट हो गया।

इसलिए ए मनुष्य, तू अपने जीवन में इस बात को अच्छी तरह समझ जा कि परलोक में तेरा क्या परिणाम होगा और विद्याओं के जानने से अधिक तेरे लिए यह अच्छा है कि तू अपने स्वरुप को जाने]१

३/ लाहौल वला कूवत

एक सूफी यात्रा करते हुए रात हो जाने पर किसी मठ में ठहरा। अपना खच्चर तो उसने अस्तबल में बांध दिया और आप मठ के भीतर एक मुख्य स्थान पर जा बैठा। मठ के लोग मेहमान के लिए भोजन लाये तो सूफी को अपने खच्चर की याद आयी। उसने मठ के नौकरो को अज्ञा दी अस्तबल में जा और खच्चर को घास और जौ खिला।

नौकर ने निवेदन किया, "आपके फरमाने की जरुरत नहीं। मैं हमेशा यही काम किया करता हूं।"

सूफी बोला, "जौ पानी में भिगो कर देना, क्योंकि खच्चर बूढ़ा हो गया है और उसके दांत कमजोर हैं।"

"हरजत, आप मुझे सिखाते हैं लोग तो ऐसी-ऐसी युक्तियां मुझसे सीख कर जाते हैं।"

"पहले इसका तैरु उतारना। फिर इसकी पीठ के घाव पर मरहम लगा देना।"

"खुदा के लिए अपनी तदबीर किसी और मौके के लिए न रख लीजिए। मैं ऐसे सब काम जानता हूं। सारे मेहमान हमसे खुश होकर जाते है; क्योंकि हम अपने अतिथियों जान के बराबर प्यार समझते हैं।"

"और देख, इसको पानी भी पिलाना; परन्तु थोड़ा गर्म करके देना।"

"आपकी इन छोटी-छोटी बातों के समझाने से मुझे शर्म आती है।"

"जौ में जरा-सी घास भी मिला देना।"

"आप धीरज से बैठे रहिए। सबकुछ हो जायेगा।"

"उस जगह का कूड़ा-करकट साफ कर देना और अगर वहां सील हो तो सूखी घास बिछा देना।"

"ऐ बुजुर्गवार! एक योग्य सेवक से ऐसी बातें करने से क्या लाभ?"

"मियां, जरा खुरेरा भी फिर देना, और ठंड का मौसम है खच्चर की पीठ पर झूल भी डाल देना।"

"हजरत, आप चिन्ता न कीजिए। मेरा काम दूध की तरह स्वच्छ और बेलग होता है। मैं आपने काम में आपसे ज्यादा होशियार हो गया हूं। भले-बुरे मेहमानों से वास्ता पड़ा है। जिसे जैसा देखता हूं, वैसी ही उसकी सेवा करता हूं।"

नौकर ने इतना कहकर कम कसी और चला गया। खच्चर का इन्तजाम तो उसे क्या करना था। अपने गुझ्टे मित्रों में बैठकर सूफि की हंसी उड़ाने लगा। सूफी रास्ते का हारा-थका ही, लेट गया और अर्द्धनिद्रा की अवस्था में सपना देखने लगा।

उसने सपने में देखा, उसके खच्चर को एक भेड़िये ने मार दिया है और उसकी पीठ और जांघ के मांस के लोथड़े को नोच-नोचकर खा रहा है। उसकी आंख खुल गयी। मन-ही-मन कहने लगा—यह कैसा पागलपन का सपना है। भला वह दयालू सेवक खच्चर को छोड़कर कहां जा सकता है! फिर सपने में देखा कि वह खच्चर रास्ते में चलते समय कभी कुंए में गिर पड़ता है, कभी गड्ढे में। ऐसी भयानक दुर्घटना सपने में वह बार-बार चौंक पड़ता और आंख खूलने पर कुरानशरीफ की आयतें पढ़ लेता।

अन्त में व्याकुल हो कर कहने लगा, "अब हो ही क्या सकता है। मठ के सब लोग पड़े सोते हैं और नौकर दरवाजे बन्द करके चले गये।"

सूफी तो गफलत में पड़ा हुआ था और खच्चर पर वह मुसीबत आयी कि ईश्वर दुश्मन पर भी न डाले। उस बेचारे को तैरु वहां की धूल और पत्थरों में घिसटकर टेढ़ा हो गया और बागडोर टूट गयी। बेचारा दिन भर का हारा-थका, भूखा-प्यास मरणासन्न अवस्था में पड़ रहा। बार-बार अपने मन में कहता रहा कि ऐ धर्म-नेताओं! दया करो। मैं ऐसे कच्चे और विचारहीन सूफियों से बाज आया।

इस प्रकार इस खच्चर ने रात-भर जो कष्ट और जो यातनाएं झेलीं, वे ऐसी थीं, जैसे धरती के पक्षी को पानी में गिरने से झेलनी पड़ती हैं। वह एक ही करवट सुबह तक भूखा पड़ा रहा। घास और जौ की बाट में हिनहिनाते-हिनहिनाते सबेरा हो गया। जब अच्छी तरह उजाला हो गया, तो नौकर आया और तुरन्त तैरु को ठीक करके पीठ पर रखा और निर्दयी ने गधे बेचनेवालों की तरह दो-तीन आर लगायीं। खच्चर कील के चुभ से तरारे भरने लगा। उस गरीब के जीभ कहां थी, जो अपना हाल सुनाता।

लेकिन जब सूफी सवार होकर आगे बढ़ा तो खच्चर निर्बलता के कारण गिरने लगा। जहां। जहां कहीं गिरता था, लोगा उसे उठा देते थे और समझते थे कि खच्चर बीमार है। कोई खच्चर के कान मरोड़ता, कोई मुंह खोलकर देखता, कोई यह जांच करता कि खुर और नाल के बीच में कंकर तो नहीं आ गया है और लोग कहते कि ऐ शेख तुम्हारा खच्चर बार-बार गिर पड़ता है, इसका क्या कारण है?

शेख जवाब देता खुदा का शुक्र है खच्चर तो मजबूत है। मगर वह खच्चर जिसने रात भर लाहौल खाई हो (अर्थात् चारा न मिलने के कारण रातभर 'दूर ही शैतान' की रट लगाता रहा), सिवा इस ढंग के रास्ता तय नहीं कर सकता और उसकी यह हरकत मुनासिब मालूम होती है, क्योंकि जब उसका चारा लाहौल था तो रात-भर इसने तसबीह (माला) फेरी अब दिन-भर सिज्दे करेगा (अर्थात् गिर-गिर पड़ेगा)

[जब किसी को तुम्हारे काम से हमदर्दी नहीं है तो अपना काम स्वयं ही करना चाहिए। बहुत से लोग मनष्य-भक्षक हैं। तुम उनके अभिवादन करने से (अर्थात् उनकी नम्रता के भम्र में पड़कर) लाभ की

आशा न रक्खो। जो मनुष्य शैतान के धोखे में फंसकर लाहौल खाता है, वह खच्चर की तरह मार्ग में सिर के बल गिरता है। किसी के धोखे में नहीं आना चाहिए। कुपात्रों की सेवा ऐसी होती है, जैसी इस सेवक ने की। ऐसे अनधिकारी लोगों के धोखे में आने से बिना नौकर के रहना ही अच्छा है।]१

४/ चौपायों की बोली

एक युवक ने हजरत मूसा से चौपायों की भाषा सीखने की इच्छा प्रकट की, ताकि जंगली पशुओं की वाणी से ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करे, क्योंकि मनुष्य की सारी वाक्शक्ति तो छल-कपट में लगी रहती है। सम्भव है, पशु अपने पेट भरने का कोई ओंर उपाय करते हों।

मूसा ने कहां, "इस विचार को छोड़ दे, क्योंकि इसमें तरह-तहर के खतरे हैं। पुस्तकों और वाणियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के बजाय ईश्वर से ही प्रार्थना कर कि वह तेरे ज्ञान-चक्षु खोल दे।" परन्तु जितना हजरत मूसा ने उससे माना किया, उतनी ही उसकी इच्छा प्रबल होती गयी। इस आदमी ने निवेदन किया, "जबसे आपको दिव्य ज्योति प्राप्त हुई है, किसी वस्तु का भेद बिना प्रकट हुए नहीं रहा है। किसी को निराश करना आपके दयालु स्वाभाव के विपरीत है। आप ईश्चर के प्रतिनिधि हैं। यदि मुझे इस विद्या के प्राप्त करने से रोकते हैं तो मुझे बड़ा दु:ख होगा।"

हजरत मूसा ने ईश्वर से प्रार्थना की, "ऐ प्रभु! मालू होता है कि यह बुद्धिमान मनुष्य शैतान के हाथ में खेल रहा है। यदि मैं इसे पशुओ की बोली सिखा दूं तो इसका अनिष्ट होता है और यदि न सिखऊं तो इसके हृदय को ठेस पहुंचती है।" ईश्चर की आज्ञा हुई, "ऐ मूसा! तुम इसे जरुर सिखाओ, क्योंकि हमने कभी किसी की प्रार्थना नहीं टाली।"

हजरत मूसा ने बड़ी नरमी से उसे समझाया, "तेरी इच्छा पूरी हो जायेगी, परन्तु अच्छा यह है कि तू ईश्वर से डर और इस विचार को छोड़ दे, क्योंकि शैतान की प्रेरणा से तुझे यह ख्याल पैदा हुआ है। व्यर्थ की विपत्ति मोल न ले, क्योंकि पशुओं की बोली समझने से तुझपर बड़ी आफत आयेगी।"

आदमी निवेदन किया, "अच्छा, सारे जानवरों की बोली न सही कुत्ते की, जो मेरे दरवाज़े पर रहता है और मुर्ग की, जो घर में पला हुआ है, बोलियां जान लूं तो यही काफी है।"

हजरत मूसा बोला, "अच्छा, ले आज से इन दोनों की बोली समझने का ज्ञान तुझे प्राप्त हो गया।"

अगले दिन प्रात:काल वह परीक्षा के लिए दरवाजे पर खड़ा हो गया। दासी ने भोजन लाकर सामने रखा। एक बासी रोटी का टुकड़ा, जो बच रहा था, नीचे गिर पड़ा। मुर्गा तो ताक में लगा हुआ था ही, तुरन्त उड़ा ले गया। कुत्ते ने शिकायत की, "तू कच्चे गेहूं भी चुग सकता है। मैं दाना नहीं चुग सकता। ऐ दोस्त! यह जरा-सा रोटी का टुकड़ा, जो वास्तव में हमारा हिस्सा है, वह भी तू उड़ा लेता है!"

मुर्गे ने यह सुनकर कहा, "जरा सब्र कर और इसका अफसोस मत कर। ईश्वर तुझको इससे बढ़िया भोजन देगा। कल हमारे मालिक का घोड़ा मर जायेगा। खूब पेट भरकर खाना। घोड़ा की मौत कुत्तों का त्यौहार है और बिना परिश्रम और मेहनत के खूब भोजन मिलता है।"

मालिक अब मुर्गें की बोली समझने लगा था। उसने यह सुनते ही घोड़ा बेच डाला और दूसरे दिन जब भोजन आया तो मुर्गा फिर रोटी का टुकड़ा ले गया। कुत्ते ने फिर शिकायत की, "ऐ बातूनी मुर्गे तू बड़ा झूठा है। और ज़ालिम तूने तो कहा था कि घोड़ा मर जायेगा। वह कहां मरा? तू अभागा है झूठ है।"

मुर्गे ने जवाब दिया, "वह घोड़ा दूसरी जगह मर गया। मालिक घोड़ा बेचकर हानि उठाने से बच गया और अपना नुकसान दूसरों पर डाल दिया, लेकिन कल इसका ऊंट मर जायेगा। तो कुत्तों के पौबारह हैं।"

यह सुनकर तुरन्त मालिक ने ऊंट को भी बेच दिया और उसकी मृत्यु के शोक और हानि से छुटकारा पा लिया। तीसरे दिन कुत्ते ने मुर्गें से कहा, "अरे झूठों के बादशाह! तू कबतक झूठ बोलता रहेगा? तू बड़ा कपटी है।"

मुर्गे ने कहा, "मालिक ने जल्दी से ऊंट को बेच डाला। लेकिन इसका गुलाम मरेगा और इसके सम्बन्धी खैरात की रोटियां फकीरों को बांटेंगे और कुत्तों को भी खूब मिलेंगी।"

यह सुनते ही मालिक ने गुलाम को भी बेच दिया और नुकसान से बचकर बहुत खुश हुआ।

वह खुशी से फूला नहीं समाता था और बार-बार ईश्वर को धन्यवाद देता था कि मैं लगातार तीन विपत्तियों से बच गया। जबसे मैं मुर्गां और कुत्तों की बोलियां समझने लगा हूं तबसे मैंने यमराज की आंखों में धूल झौंक दी है। चौथे दिन निराश कुत्ते ने कहा, "अरे, झेठे बकवादी मुर्गे तेरी भविष्यवाणियों का क्या हुआ? यह तेरा कपट-जाल कब तक चलेगा? तेरी सूरत से ही झूठ टपकता है!"

"मुर्गे ने कहा, "तोबा! मेरी जाति कभी झूठ नहीं बोलती। भला यह कैसे सम्भव हो सकता है? असली बात यह है कि वह गुलाम खरीदार के पास जाकर मर गया और खरीदार को नुकसान हुआ। मालिक ने खरीदार को तो हानि पहुंचायी, लेकिन खूब समझ ले कि अब खुद उसकी जान पर आ बनी है। कल मालिक ही खुद मर जायेगा। तब इसके उत्तराधिकारी गाय की कुरबानी करेंगी। मांस और रोटियां फकीरो और कुत्तों को बांटी जायेगी। फिर खूब मौज से माल उड़ाना। घोड़े, ऊंट और गुलाम की मौत इस मूर्ख के प्राणों का बदला था। माल के नुकसान और रंज से तो बच गया। लेकिन अपनी जान गंवायी"

मालिक मुर्गे की भविष्यवाणी को कान लगाकर सुन रहा था। दौड़ा-दौड़ा हजरत मूसा के दरवाजे पर पहुंचा और माथा टेककर फरियाद करने लगा, "ऐ खुदा के नायब, मुझ पर दया करो।"

हजरत मूसा ने कहा, "जा, अब अपने को भी बेचकर नुकासन से बच जा। तू तो इस काम में खूब चालाक हो गया है। अब की बार भी अपनी हानि दूसरी लोगों के सिर डाल दे और अपनी थैलियों को दौलत से भर ले। भवितव्यता तुझे इस समय शीशे में दिखाई दे रही है, मैं उसको पहले ही ईंट में देख चुका था।"

उसने रोना-धोना शुरु किया और कहा, "ऐ दयामूर्ति! मुझे निराश न कीजिए। मुझसे अनुचित व्यवहार हुआ है। परन्तु आप क्षमा करें।"

हजरत मूसा बोले, "अब तो कमान से तीर निकल चुका है, लौट आना सम्भ्व नहीं है। अलबत्ता मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मरते समय तू ईमान सहित मरे। जो ईमानदार रहकर मरता है वह जिन्दा रहता है और जो ईमान साथ ले जाये, वह अमर हो जाता है।"

उसी समय उसका जी मितलाने लगा। दिल उल-पुलट होने लगा। थोड़ी देर में वमन हुईं वह कै मौत की थी। उसे चार आदमी उठाकर ले गये। परन्तु उस समय उसे होश नहीं था। हजरत मूसा ने ईश्वर से प्रार्थना की, "हे प्रभु, इसे ईमान से वंचित न कर। यह गुस्ताखी इसने भूल में की थी। मैंने इसे बहुत समझाया कि वह विद्या तेरे योग्य नहीं। लेकिन वह मेरी नसीहत को टालने की बात समझा।"

ईश्वर ने उस आदमी पर दया की और हजरत मूसा की दुआ कबूल हुई। १

५/ साधु की कथा

एक साधु पहाड़ों पर रहा करता था। न उसके स्त्री थी और न बच्चे। वह एकान्तवास में ही मगन रहा करता था।

इस पहाड़ की घाटियों में सेव, अमरुद, अनार इत्यादि फलदार वृक्ष बहुत थे। साधु का भोजन यही मेवे थे। इनके छोड़ और कुछ नहीं खाता था। एक बार इस साधु ने प्रतिज्ञा की कि ऐ मेरे पालनकर्त्ता मैं इन वृक्षों से स्वयं मेवे नहीं तोडूगा और न किसी दूसरे से तोड़ने के लिए कहूंगा। मैं पेड़ पर लगे हुए मेवे नहीं खाऊंगा, जो हवा के झोंके से सड़कर गिर गये हों।

दैवयोग से पांच दिन तक कोई फल हवा से नहीं झड़ा। भूख की आग ने साधु को बेचैन कर दिया। उसने एक डाली की फुनगी पर अमरुद लगे हुए देखे। परन्तु सन्तोष से काम लिया और अपने मन को वश में किये रहा। इतने में हवा का एक ऐसा झोंका आया कि शाख की फुनगी नीचे झुक आयी, अब तो उसका मन वश में नहीं रहा और भूख ने उसे प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए विवश कर दिया। बस फिर क्या था, वृक्ष से फल तोड़ते ही इसकी प्रतिज्ञा टूट गयी। साथ ही ईश्वर का कोप प्रकट हुआ, क्योंकि उसकी आज्ञा है कि जो प्रतिज्ञा करो, उसे अवश्य पूरा करो।

इसी पहाड़ में शायद पहले से ही चोरों का एक दल रहा करता था और यहीं वे लोग चोरी का माल आपस बांट करते थे। दैवयोग से उसी समय चोरो के यहां मौजूद होने की खबर पाकर कोतवाली के सिपाहियों ने इस पहाड़ी को घेर लिया और चोरों के साथ साधु को भी पकड़कर हथकड़ी-बेड़ी डाल दी। इसके बाद कोतवाल ने जल्लाद को आज्ञा दी कि इनमें से हरएक के हाथ-पांव काट डालो। जल्लाद ने सबका बांया पांव और दायां हाथ काट डाला। चोरों के साथ साधु का हाथ भी काट डाला गया और पैर काटने की बारी आने-वाली थी कि अचानक एक सवार घोड़ा दौड़ाता हुआ आया और सिपाहियों को ललकार कर कहा, "अरे देखों, यह अमुक साधु है और ईश्चर-भक्त है। इसक हाथ क्यों काट डाला?" यह सुनकर सिपाही ने अपने कपड़े फाड़ डाले और जल्दी से कोतवाल की सेवा में उपस्थित होकर इस घटना की सूचना दी। कोतवाल यह सुनकर नंगे पांव माफी मांगता हुआ हाजिर हुआ।

बोला "महाराज! ईश्वर जानता है कि मुझे खबर नहीं थी। ऐ दयालु, मुझे

साधु बोला, "मैं इस विपत्ति का कारण जानता हूं और मुझे अपने पापों का ज्ञान है। मैंने बेईमानी से अपना मान घटाया और मेरी ही प्रतिज्ञा ने मुझे इसकी कचहरी में धकेल दिया। मैंने जान-बूझकर प्रतिज्ञा भंग की। इसलिए इसकी सजा में हाथ पर आफत आयी। हमारा हाथ हमारा पांव, हमारा शरीर तथा प्राण मित्र की आज्ञा पर निछावर हो जाये तो बड़े सौभाग्य की बात है। तुझसे कोई शिकायत नहीं, क्योंकि तुझे इसका पता नहीं था।"

संयोग से एक मनुष्य भेंट करने के अभिप्राय से उनकी झोंपड़ी में घुस आया। देखा कि साधु दोनों हाथों से अपनी झोली सी रहे हैं।

साधु ने कहा, "अरे भले आदमी! तू बिना सूचना दिये मेरी झोंपड़ी में कैसे आ गया।"

उसने निवेदन किया कि प्रेम और दर्शनों की उत्कंठा के कारण यह अपराध हो गया।

साधु ने कहा, "अच्छा, तू चला आ। लेकिन खबरदार, मेरे जीवन-काल में यह भेद किसीसे मत कहना!"

झोंपड़ी की बाहर मनुष्यों का एक समूह झांक रहा था। वह यह हाल जान गया। साधु ने कहा, "ऐ परमात्मा! तेरी माया तू ही जाने। मैं इस चमत्कार को छिपाता हूं और तू प्रकट करता है।

साधु ने आकाश-वाणी सुनी कि अभी थोड़ी ही दिन में लोग तुझपर अविश्वास करने लगते, और तुझे कपटी और प्रपंची बताने लगते। कहते कि इसीलिए ईश्वर ने इसकी यह दशा की है। वे लोग काफिर न हो जायें और अविश्वास और भ्रम में ग्रस्त न हो जायें, जन्म के अविश्वासी ईश्वर से विमुख न हो जायें, इसलिए हमने तेरा यह चमत्कार प्रकट कर दिया है कि आवश्यकता के समय हम तुझे हाथ प्रदान कर देते हैं। मैं तो इन करामातों से पहले भी तुझे अपनी सत्ता का अनुभव करा चुका हूं। ये चमत्कार प्रकट करने की शक्ति जो तुझको प्रदान कीह गयी है, वह अन्य लोगों में विश्चास पैदा करने के लिए है। इसीलिए इसे उजागर किया गया है। ¬१

६/ फूट बुरी बला

एक माली ने देखा कि उसके बाग में तीन आदमी चोरों की तरह बिना पूछे घुस आये हैं। उनमें से एक सैयद है, एक सूफी है और एक मौलवी है, और एक से बढ़कर एक उद्दंड और गुस्ताख है। उसने अपने मन में कहा कि ऐसे धूर्तों को दंड देना ही चाहिए, परन्तु उनमें परस्पर बड़ा मेल है और एका ही सबसे बड़ी शक्ति है। मैं अकेला इन तीनों को नहीं जीत सकता। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि पहले इनको एक-दूसरे से अलग कर दूं। यह सोचकर उसने पहले सूफी से कहा, "हजरात, आप मेरे घर जाइए और इन साथियां के लिए कम्बल ले आइए।" जब सूफी कुछ दूर गया, तो कहने लगा, "क्यों श्रीमान! आप तो धर्म-शास्त्र के विद्वान हैं और ये सैयद हैं। हम तुम-जैसे सज्जनों के प्रताप से ही रोटी खाते हैं और तुम्हारी समझ के परों पर उड़ते हैं। दूसरे पुरुष हमारे बादशाह हैं, क्योंकि सैयद हैं और हमारे रसूल के वंश के हैं। लेकिन इस पेटू सूफी में कौन-सा गुण है, जो तुम-जैसे बादशाहों के संग रहे? अगर वह वापस आये तो उसे रुई की तरह धुन डालूं। तुम लोग एक हफ्ते तक मेरे बाग में निवास करो। बाग ही क्या, मेरी जान भी तुम्हारे लिए हाजिर हैं, बल्कि तुम तो मेरी दाहिनी आंख हो।"

ऐसी चिकनी-चुपड़ी बातों से इनको रिझाया और खुद डंडा लेकर सूफी के पीछे चला और उसे पकड़कर कहा, "क्यों रे सूफी, तू निर्लल्जता से बिना आज्ञा लिये लोगों के बाग में घुस आता है! यह तरीका तुझको किसने सिखाया है? बता, सिक शेख और किस पीर ने आज्ञा दी?" यह कहकर सूफी को मारते-मारते अधमर कर दिया।

सूफी ने जी में कहा, "जो कुछ मेरे साथ होनी थी, वह तो हो चुकी; परन्तु मेरे साथियो! जरा अपनी खबर लो। तुमने मुझको पराया समझा, हालांकि मैं इस दुष्ट माली से ज्यादा पराया न था। जो कुछ मैंने खाया है, वही तुम्हें भी खाना है और सच बात तो यह है कि धूर्तों को ऐसा दण्ड मिलना चाहिए।"

जब माली ने सूफी को ठीक कर दिया तो वैसा ही एक बहाना और ढूंढा और कहा, "ऐ मेरे प्यारे सैयद, आप मेरे घर पर तशरीफ ले जायें। मैंने आपके लिए बढ़िया खाना बनवाया है। मेरे दरवाजे पर जाकर दासी को आवाज देना। वह आपके लिए पूरियां और तरकारियां ला देगी।"

जब उसकी विदा कर चुका तो मौलवी से कहने लगा, "ऐ महापुरुष! यह तो जाहिर और मुझे भी विश्वास है कि तू धर्म-शास्त्रों का ज्ञात है: परन्तु तेरे साथी को सैयदपने का दावा निराधार है। तुझे क्या मालूम, इसकी मां ने क्या-क्या किया?" इस प्रकार सैयद को जाने क्या-क्या बुरा भला कहा। मौलवी चुपचाप सुनता रहा, तब उस दुष्ट ने सैयद का भी पीछा किया और रास्ते में रोककर कहा, "अरे मूर्ख! इस बाग में तुझे किसने बुलाया? अगर तू नबी सन्तान होता तो यह कुकर्म न करता।"

फिर उसने सैयद को पीटना शुरु किया और जब वह इस ज़ालिम की मार से बेहाल हो गया तो आंखों में आसूं भरकर मौलवी से बोला, "मियां, अब तुम्हारी बारी है। अकेले रह गये हो। तुम्हारी तोंद पर वह चोटी पड़गी कि नक्करा बन जायेगी। अगर मैं सैयद नहीं हूं और तेरे साथ रहने योग्य नहीं हूं तो ऐसे ज़ालिम से तो बुरा नहीं हूं।"

इधर जब वह माली सैयद से भी निबटन चुका तो मौलवी की ओर मुड़ा और कहा, "ऐ मौलवी, ! तू सारे धूर्तों का सरदार है। खुदा तुझे लुंजा करे। क्या तेरा यह फतवा है कि किसी के बाग में घुस आये और आज्ञा भी न ले? अरे मूर्ख, ऐसा करने की तुझे किसने आज्ञा दी है? या किसी धार्मिक ग्रन्थ में तूने ऐसा पढ़ा है?" इतना कहकर वह उस पर टूट पड़ा और उसे इतना मारा कि उसका कचूमर निकाल दिया।

मौलवी ने कहा, "तुझे निस्सन्देह मारने का अधिकार है। कोई कसर उठा न रखा। जो अपनों से अलग हो जाये, उसकी यही सजा है। इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी सौगुना दण्ड मिलना चाहिए। मैं अपने निजी बचाव के लिए अपने साथियों से क्यों अलग हुआ?"

[जो अपने साथियों से अलग होकर अकेला रह जाता है, उसे ऐसी ही मुसीबतें उठानी पड़ती हैं। फूट बला है।]

७/खारे पानी का उपहार

पुराने जमाने में एक खलीफा था, जो हातिम से भी बढ़कर उदार और दानी था। उसने अपनी दानशीलता तथा परोपकार के कारण निर्धनता याचना का अंत कर दिया था। पूरब से पच्छिम तक इसकी दानशीलता की चर्चा फैल गयी।

एक दिन अरब की स्त्री ने अपने पति से कहा, "गरबी के कारण हम हर तरह के कष्ट सहन कर रहे हैं। सारा संसार सुखी है, लेकिन हमीं दुखी हैं। खाने के लिए रोटी तक मयस्सर नहीं। आजकल हमारा भोजन गम है या आंसू। दिन की धूप हमारे वस्त्र हैं, रात सोने का बिस्तर हैं, और चांदनी लिहाफ है। चन्द्रमा के गोल चक्कर को चपाती समझकर हमारा हाथ आसमान की तरफ उठ जाता है। हमारी भूख और कंगाली से फकीरों को भी शर्म आती है और अपने-पराये सभी दूर भागते हैं।"

पति ने जवाब दिया, "कबतक ये शिकायतें किये जायेगी? हमारी उम्र ही क्या ऐसी ज्यादा रह गयी है! बहुत बड़ा हिस्सा बीत चुका है। बुद्धिमान आदमी की निगाह में अमीर और गरीब में कोई फर्क नहीं है। ये दोनों दशाएं तो पानी की लहरें हैं। आयीं और चली गयीं। नदी की तरेंग हल्की हो या तेज, जब किसी समय भी इनको स्थिरता नहीं तो फिर इसक जिक्र ही क्या? जो आराम से जीवन बिताता है, वह बड़े दु:खों से मरता है। तू तो मेरी स्त्री है। स्त्री को अपने पति के विचारो से सहमत होना चाहिए, जिससे एकता से सब काम ठीक चलते रहें। मैं तो सन्तोष कियो बैठा हूं। तू ईर्ष्या के कारण क्यों जली जा रही है?"

पुरुष बड़ी हमदर्दी से इस तरह के उपदेश अपनी औरत को देता रहा। स्त्री ने झुंझलाकर डांटा, "निर्लज्ज! मैं अब तेरी बातों में नही आऊंगी। खाली नसीहत की बातें न कर। तूने कब से सन्तोष करना सीखा है? तूने तो केवल सन्तोष का नाम ही नाम सुना है, जिससे जब मैं रोटी-कपड़े की शिकायत करुं तो तू अशिष्टता और गुस्ताखी का नाम लेकर मेरा मुंह बन्द कर सके। तेरी नसीहत ने मुझे निरुत्तर नहीं किया। हां, ईश्वर की दुहाई सुनने से मैं चुप हो गयी। लेकिन अफसोस है तुझपर कि तूने ईश्चर के नाम को चिड़ीमार का फंदा बना लिया। मैंने तो अपना मन ईश्वर को सौंपा दिया है, ताकि मेरे घावों की जलन से तेरा शरीर अछूता न बचे या तुझको भी मेरी तरह बन्दी (स्त्री) बना दे।" स्त्री ने अपने पति पर इसी तरह के अनेक ताने कसे। मर्द औरत के ताने चुपचाप सुनता रहा।

मर्द ने कहा, "तू मेरी स्त्री है या बिजका? लड़ाई-झगड़े और दर्वचनों को छोड़। इन्हें नहीं छोड़ती तो मुझे ही छोड़। मेरे कच्चे फोड़ों पर डंक न मार। अगर तू जीभ बन्द करे तो ठीक, नहीं तो याद रख, में अभी घरबार छोड़ दूंगा। तंग जूता पहनने से नंगे पैर फिरना अच्छा है। हर समय के घरेलू झगड़ों से यात्रा के कष्ट सहना बेहतर है।"

स्त्री ने जब देखा कि उसका पति नाराज हो गया है तो झट रोने लगी। फिर गिड़गिड़ाकर कहने लगी, "मैं सिर्फ पत्नी ही नहीं बल्कि पांव की धूल हूं। मैंने तुम्हें ऐसा नहीं समझा था, बल्कि मुझे तो तुमसे और ही आशा थी। मेरे शरीर के तुम्हीं मालिक हो और तुम्हीं मेरे शासक हो। यदि मैंने धैर्य और सन्तोष को छोड़ा तो यह अपने लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए। तुम मेरी सब मुसीबतों और बीमारियों की दवा करते हो, इसलिए मैं तुम्हारी दुर्दशा को नहीं देख सकती। तुम्हारे शरीर की सौगन्ध, यह शिकायत अपने लिए नहीं, बल्कि यह सब रोना-धोना तुम्हारे लिए है। तुम मुझे छोड़ने का जिक्र करते हो, यह ठीक नहीं हैं।"

इस तरह की बातें कहती रही और फिर रोते-रोते औंधे मुंह गिर पड़ी। इस वर्षा से एक बिजली चमकी और मर्द के दिल पर इसकी एक चिनगारी झड़ी। वह अपने शब्दों पर पछतावा करने लगा, जैसे मरते समय कोतवाल अपने पिछले अत्याचारों और पापों को याद कर रोता है। मन में कहने लगा, जब मैं इसका स्वामी हूं तो मैंने इसको कष्ट क्यों दिया? फिर उससे बोला, "मैं अपनी इन बातों के लिए लज्जित हूं। मैं अपराधी हूं। मुझे क्षमा कर। अब मैं तेरा विरोध नहीं करुगा। जो कुछ तू कहेगी, उसके अनुसार काम करुंगा।"

औरत ने कहा, "तुम यह प्रतिज्ञा सच्चे दिल से कर रहे हो या चालाकी से मेरे दिल का भेद ले रहे हो?"

वह बोला, "उस ईश्वर की सौगन्ध, जो सबके दिलों का भेद जानेवाले हैं, जिसने आदम के समान पवित्र नबी को पैदा किया। अगर मेरे ये शब्द केवल तेरा भेद लेने के लिए हैं तो तू इनकी भी एक बार परीक्षा करके देख ले।"

औरत ने कहा, "देख, सूरज चमक रहा है और संसार इससे जगमगा रहा है। खुदा के खलीफा का नायाब जिसके प्रताप से शहर बगदाद इंद्रपुरी बना हुआ है, अगर तू उस बादशाह से मिले तो खुद भी बादशाह हो जायेगा, क्योंकि भाग्यवानों की मित्रता पारस के समान है, बल्कि पारस भी इसके सामने छोटा है। हजरत रसूल की निगाह अबू बकर पर पड़ी तो वह उनकी जरा-सी कृपा से इस महान पद को पहुंच गये।"

मर्द ने कहा, "भला, बादशाह तक मेरी पहुंच कैस हो सकती है? बिना किसी जरिये के वहां तक कैसे पहुंच सकता हूं?"

औरत ने कहा, "हमारी मशक में बरसाती पानी भरा रक्खा है। तुम्हारे पास यही सम्पत्ति है। इस पानी की मशक को उठाकर ले जाओ और इसी उपहार के साथ बादशाह की सेवा में हाजिर हो जाओ और प्रार्थना करो कि हमारी जमा-पूंजी इसके सिवा कुछ है नहीं। रेगिस्तान में इससे उत्तम जल प्राप्त होना असम्भव है। चाहे उसके खजाने में मोती और हीरे भरे हुए हैं, लेकिन ऐसे बढ़िया जल का वहां मिलना भी दुश्वार है।"

मर्द ने कहा, "अच्छी बात है। मशक का मुंह बन्द कर। देखें, तो यह सौगात हमें क्या फायदा पहुंचाती है? तू इसे नमदे में सी दे, जिससे सुरक्षित रहे और बादशाह हमारी इस भेंट से रोज़ खोले। ऐसा पानी संसार भर में कहीं नहीं। पानी क्या, यह तो निथरी हुई शराब है।"

उसने पानी की मशक उठायी और चल दिया। सफर में दिन को रात और रात को दिन कर दिया। उसको यात्रा के कष्टों के समय भी मशक की हिफाजत का ही ख्याल रहता था।

इधर औरत ने खुदा से दुआ मांगनी शुरु की कि ऐ परवरदिगार, रक्षा कर, ऐ खदा! हिफाजत कर।

स्त्री की प्रार्थना तथा अपने परिश्रम और प्रयत्न से वह अरब हर विपत्ति से बचता हुआ राजी-खुशी राजधानी तक पानी की मशक को ले पहुंचा। वहां जाकर देखा, बड़ा सुन्दर महल बना हुआ है और सामने याचकों का जमघट लागा हुआ है। हर तरफ के दरवाजों से लोग अपनी प्रार्थना लेकर जाते हैं और सफल मनोरथ लौटते हैं।

जब यह अरब महल के द्वारा तक पहुंचा ता चोबदार आये। उन्होंने इसके साथ बड़ा अच्छा व्यवहार किया। चोबदारों ने पूछा, "ऐ भद्र पुरुष! तू कहां से आ रहा है? कष्ट और विपत्तियों के कारण तेरी क्या दशा हो गयी है?"

उसने कहा, "यदि तुम मेरा सत्कार करो तो मैं भद्र पुरुष हूं और मुंह फेर लो तो बिल्कुल छोटा हूं। ऐ अमीरो! तुम्हारे चेहरों पर एश्चर्य टपक रहा है। तुम्हारे चेहरों का रंग शुद्ध सोने से भी अधिक उजला है। मैं मुसाफिर हूं। रेगिस्तान से बादशाह की सेवा में भिखारी बनकर हाजिर हुआ हूं। बादशाह के गुणों की सुगन्धित रेगिस्तान तक पहुंच चुकी है। रेत के बेजान कणों तक में जान आ गयी है। यहां तक तो मैं अशर्फियों के

लोभ से आया था, परन्तु जब यहां पहुंचा तो इसके दर्शनों के लिए उत्कण्ठित हो गया।" फिर पानी की मशक देकर कहा, "इस नजराने को सुलतान की सेवा में पहुंचाओ और निवेदन करो कि मेरी यह तुच्छ भेंट किसी मतलब के लिए नहीं है। यह भी अर्ज करना कि यह मीठा पानी सौंधी मिट्टी के घड़े का है, जिसमें बरसाती पानी इकट्ठा किया गया था।"

चोबदारों को पानी की प्रशंसा सुनकर हंसी आने लगी। लेकिन उन्होंने प्राणों की तरह मशक को उठा लिया, क्योंकि बुद्धिमान बादशाह के सदगुण सभी राज-कर्मचारियों में आ गये थे।

जब खलीफा ने देखा और इसका हाल सुना तो मशक को अशर्फियों से भर दिया। इतने बहुमल्य उपहार दिये कि वह अरब भूख-प्यास भूल गया। फिर एक चोबदार को दयालु बादशाह ने संकेत किया, "यह अशर्फी-भरी मशक अरब के हाथ में दे दी जाये और लौटते समय इसे दजला नदी के रास्ते रवाना किया जाये। वह बड़े लम्बे रास्ते से यहां तक पहुंचा है। और दजला का मार्ग उसके घर से बहुत पास है। नाव में बैठेगा तो सारी पिछली थकान भूल जायेगा।"

चोबदारों ने ऐसा ही किया। उसको अशर्फियां से भरी हुई मशक दे दी और दजला पर ले गये। जब वह अरब नौका में सवार हुआ और दजला नदी को देखा तो लज्जा के कारण उसका सिर झुक गया, फिर सिर झुक गया, फिर सिर झुकाकर कहने लगा कि दाता की देन भी निराली है और इससे भी बढ़कर ताज्जुब की बात यह है कि उसने मेरे कड़वे पानी तक को कबूल कर लिया।

८/स्वच्छ ह्रदय

चीनियों को अपनी चित्रकला पर घमंड था और रुमियों को अपने हुनर पर गर्व था। सुलतान ने आज्ञा दी कि मैं तुम दोनों की परीक्षा करुंगा। चीनियों ने कहा, "बहुत अच्छा, हम अपना हुनर दिखायेंगे।" रुमियों ने कहा, "हम अपना कमाल दिखायेंगे।" मतलब यह कि चीनी और रुमियों में अपनी-अपनी कला दिखाने के लिए होड़ लग गई।

चीनियों ने रुमियों से कहा, "अच्छा, एक कमरा हम ले लें और एक तुम ले लो।" दो कमरे आमने-सामने थे। इनमें एक चीनियों को मिला और दूसरा रुमियों कों चीनियों ने सैकड़ों तरह के रंग मांगें बादशाह ने खजाने का दरवाज खोल दिया। चीनियों को मुंह मांगे रंग मिलने लगे। रुमियों ने कहा, "हम न तो कोई चित्र बनाएंगे और न रंग लगायेगे, बल्कि अपना हुनर इस तरह दिखायेंगे कि पिछला रंग भी बाकी न रहें।"

उन्हों दरवाजे बन्द करके दीवारों को रगड़ना शुरु किया और आकाश की तरह बिल्कुल और साफ सादा घाटा कर डाला। उधर चीनी अपना काम पूरा करके खुशी के कारण उछलने लगे।

बादशाह ने आकर चीनियों का काम देखा और उनकी अदभुत चित्रकारी को देखकर आश्चर्य-चकित रह गया। इसके पश्चात वह रुमियों की तरफ आया। उन्होंने अपने काम पर से पर्दा उठाया। चीनियों के चित्रों का प्रतिबिम्ब इन घुटी हुई दीवार इतनी सुन्दर मालूम हुई कि देखनेवालों कि आंखें चौंधिसयाने लगीं।

[रूमियां की उपमा उन ईश्वर-भक्त सूफियों की-सी है, जिन्होंने न तो धार्मिक पुस्तकें पढ़ी और न किसी अन्य विद्या या कला में योग्यता प्राप्त की है। लेकिन लोभ, द्वेष, दुर्गुणों को दूर करके अपने हृदय को रगड़कर, इस तरह साफ कर लिया है कि उसके दिल स्वच्छ शीशें की तरह उज्जवल हो गये है।, जिनमें निराकार ईश्चरीय ज्योति का प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकता है।]१

९/ मूर्खों से भागो

हजरत ईसा एक बार पहाड़ की तरफ इस तरह दौड़े जा रहे थे कि जैसे कोई शेर उनपर हमला करने के लिए पीछे से आ रहा हो। एक आदमी उनके पीछे दौड़ा और पूछा, "खैर तो है? हजरत, आपके पीछे तो कोई भी नहीं, फिर परिन्दे की तरह क्यों उड़े चले जा रहे हो?" परन्तु ईसा ऐसी जल्दी में थे कि कोई जवाब नहीं दिया। कुछ दुर तक वह आदमी उनके पीछे-पीछे दौड़ा और आखिर बड़े जोर की आवाज देकर उनको पुकार, "खुदा के वास्ते जरा तो ठहरिये। मुझे आपकी इस भाग-दौड़ से बड़ी परेशानी हो रही है। आप इधर से क्यों भागे जा रहे हैं? आपके पीछे न शेर है, दुश्मन!"

हजरत ईसा बोलो, "तेरा कहना सच है। परन्तु मैं एक मूर्ख मनुष्य से भाग रहा हूं।"

उसने कहा, "क्या तुम मसीहा नहीं हो, जिनके चमत्कार से अन्धे देखने लगते हैं और बहरों को सुनायी देने लगता है?"

वह बोले, "हां।"

उसने पूछा, "क्या तुम वह बादशाह नहीं कि जिनमें ऐसी शक्ति है कि यदि मुर्दे पर मन्त्र फंक दे तो वह मुर्दा भी जिंदा पकड़ें गए शेर की तरह उठा खड़ा होता है।"

ईसा ने कहा, "हां, मैं वही हूं।"

फिर उसने पूछा, "क्या आप वह नहीं कि मिट्टी को पक्षी बनाकर जरा मन्त्र पढ़े तो जान पड़ जाये और उसी वक्त हव में उड़ने लगे?"

ईसा ने जवाब दिया, "बेशक, वही हूं।"

फिर उसने निवदन किया।"ऐ पवित्र आत्मा! आप जो चाहें कर सकते हैं, फिर आपको किसका डर है?"

हजरत ईसा ने कहा, "ईश्वर की कसम, जो और जीव का पैदा करनेवाला है,

और जिसकी महान् शक्ति के मुकाबले में आकाश भी तुच्छ हैं, जब उसके पवित्र नाम को मैंने बहारों और अन्धों पर पढ़ा तो वे अच्छे हो गये, पहाड़ों पर चढ़ा तो उनके टुकड़े-टुकड़े हो गये, मृत शरीरों पर पढ़ा तो जीवित हो गये, परन्तु मैंने बड़ी श्रद्धा से वही पवित्र नाम जब मूर्ख पर पढ़ा और लाखों बार पढ़ा तो अफसोस कि कोई लाभ नहीं हुआ!"

उस आदमी ने आश्चर्य से पूछा कि हजरत, यह क्या बात है कि ईश्वर का नाम वहां फायदा करता है और यहां कोई असर नहीं करता? हालांकि यह भी एक बीमारी है और वह भी। फिर क्या कारण है कि उस सृष्टि-कर्ता का पवित्र नाम दोनों पर समान असर नहीं करता?

हजरत ईसा ने कहा, "मूर्खता का रोग ईश्वर की ओर से दिया हुआ दंड है और अन्धेपन की बीमारी दंड नहीं, बल्कि परीक्षा के तौर पर जो बीमारी है, उसपर दया आती है, और मूर्खता वह रोग है, जिससे दिल में जलन होती है।"

[हजरत ईसा की तरह मूर्खों से दूर भागना चाहिए। मूर्खों के संग ने बड़े-बड़े झगड़े पैदा किये है। जिस तरह हवा आहिस्ता-आहिस्ता पानी को खुश्क कर देती हैं, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी धीरे-धीरे प्रभाव डालते है और इसका अनुभव नहीं होता।]१

१०/ मूसा और चरवाहा

एक दिन हजरत मूसा ने रास्ता चलते एक चरवाहे को यह कहते सुना, "ऐ प्यारे खुदा तू कहां है? बता, जिससे मैं तेरी खिदमत करुं। तेरे मोजे सीऊं और सिर में कंघी करुं। मैं तेरी सेवा में जाऊं। तेरे कपड़ों में थेगली लगाऊं। तेरे कपड़े धोऊं और ऐ प्यारे, तेरे और तेरे आगे दूध रक्खूं और अगर तू बीमार हो जाये तो संबंधियों से अधिक तेरी सेवा-टहल करुं। तेरे हाथ चूमूं, पैरों की मालिश करुं और जब सोने का वक्त हो तो तेरे बिछौने को झाड़कर साफ करुं और तेरे लिए रोज घी और दूध पहुंचाया करुं। चुपड़ी हुई रोटियां और पीने के लिए बढ़िया दही और मठा तैयार करके सांझ-सवेरे लाता रहूं। मतलब यह है कि मेरा काम मेरा काम लाना हो और तेरा काम खना हो। तेरे दर्शनों के लिए मेरी उत्सुकता हद से ज्यादा बढ़ गयी है।"

यह चरवाह इस तरह की बेबुनियाद बातें कर रहा था। मूसा ने पूछा, "अरे भाई,

तू ये बातें किससे कह रहा है?"

उस आदमी ने जवाब दिया, "उसने, जिससे, हमको पैदा किया है, यह पृथ्वी और आकाश बनाये हैं।"

हजरत मूसा ने कहा, "अरे आभागे! तू धर्म-शील होने के बजाय काफिर हो गया है क्या? काफिरों जैसी बेकार की बातें कर रहा है। अपने मुंह में रुई ठूंस। तेरे कुफ्र की दुर्गंध सारे ससार में फैल रही है। तेरे धर्म-रूपी कमख्वाब में थेगली लगा दी। मोजे और कपड़े तुझे ही शोभा देते हैं। भला सूर्य को इन चीजों की क्या आवश्यकता है? अगर तू ऐसी बातें करने से नहीं रुकेगा तो शर्म के कारण सारी सृष्टि जलकर राख हो जायेगी। अगर तू खुदा को न्यायकारी और सर्वशक्तिमान मानता है तो इस बेहूदी बकवास से क्या लाभ? खुदा को ऐसी सेवा की आवश्यकता नहीं। अरे गंवार! ऐसी

बातें तू किससे कर रहा है? वह ज्योतिस्वरुप (परमेश्वर) तो शरीर और आवश्यकताओं से रहित है। दूध तो वह पिये, जिसका शरीर और आयु घटे-बढ़े और मोजे वह पहने, जो पैरों के अधीन हो।"

चरवाहे ने कहा, "ऐ मूसा! तूने मेरा मुंह बन्द कर दिया। पछतावे के कारण मेरा शरीर भुनने लगा है।"

यह कहकर उस चरवाहे ने कपड़े फाड़ डाले, एक ठंडी सांस ली और जंगल में घुसकर गायब हो गया। इधर मूसा को आकाशावाणी सुनायी दी, "ऐ मूसा! तूने हमारे बन्देको हमसे क्यों जुदा कर दिया? तू संसार में मनुष्यों को मिलाने आया है या अलग करने? जहां तक सम्भव हो, जुदा करने का इरादा न कर। हमने हर एक आदमी का स्वभाव अलग-अलग बनाया है और प्रत्येक मनुष्य को भिन्न-भिन्न की बोलियां दी हैं। जों बात इसके लिए अच्छी है, वह तेर लिए बुरी है। एक बात इसके हक में शहद का असर रखती है और वही तेरे लिए विष का। जो इसके लिए प्रकाश है, वह तेरे लिए आग है। इसके हक में गुलाब का फूल और तेरे लिए कांटा हैं। हम पवित्रता, अपवित्रता, कठोरता और कोमलता सबसे अलग हैं। मैंने इस सृष्टि की रचना इसलिए नहीं की कि कोई लाभ उठाऊं, बल्कि मेरा उद्देश्य तो केवल यह है कि संसार के लोगों पर अपनी शक्ति और उपकार प्रकट करुगं। इनके जाप और भजन से मैं कुछ पवित्र नहीं हो जाता, बल्कि जो मोती इनके मुंह से झड़ते हैं, उनसे स्वयं ही इनकी आत्मा शुद्ध होती है। हम किसीके वचन या प्रकट आचरणों को नहीं देखते। हम तो ह्दय के

आन्तरिक भावों को देखते हैं। ऐ मूसा, बुद्धिमान मनुष्यों की प्रार्थनाएं और हैं और दिलजलों की इबादत दूसरी है। इनका ढंग ही निराला है।"

जब मूसा ने अदृष्ट से ये शब्द सुने तो व्याकुल होकर जंगल की तरफ चरवाहे की तलाश में निकले। उसके पद-चिह्नों को देखते हुए सारे जंगल की खाक छान डाली। आखिर उसे तलाश कर लिया। मिलन पर कहा, "तू बड़ा भाग्यवान है। तुझे आज्ञा मिल गयी। तुझे किसा शिष्टाचार या नियम की आवश्यकता नहीं। जो तेरे जी में आये, कहा। तेरा कुफ्र धर्म और तेरा धर्म ईश्वर-प्रेम है। इसलिए तेरे लिए सबकुछ माफ है बल्कि तेरे दम से ही सृष्टि कायम है। ऐ मनुष्य! खुदा की मर्जी से माफी मिल गयी। अब तू निस्संकोच होकर जो मुंह आये, कह दे।"

चरवाहे ने जवाब दिया, "ऐ मूसा! अब मैं इस तरह की बातें मुंह से नहीं निकालूंगा। तूने जो मेरे बुद्धि-रुपी घोड़े को कोड़ा लगाया तो वह एक छलांग में सातवे आसमान पर जा पहुंचा। अब मेरी दशा बयान से बाहर है, बल्कि मेरे ये शब्द भी मरे हार्दिक दशा को प्रकट नहीं करते।"

[ऐ मनुष्य! तो जो ईश्वर की प्रशंसा और स्तुति करता है, तेरी दशा भी इस चरवाहे से अच्छी नहीं है। मू महा अधर्मी और संसार में लिप्त है। तेरे कर्म और वचन भी निकृष्ट हैं। यह केवल उस दयालु परामात्मा की कृपा है कि वह तेरे अपवित्र उपहार को भी स्वीकार कर लेता है।]१

११/ईश्वर की खो

इब्राहीम आधी रात में अपने महल में सो रहा था। सिपही कोठे पर पहरा दे रहे थे। बादशाह का यह उद्देश्य नहीं था कि सिपाहियों की सहायता से चोरों और दुष्ट मनुष्यों से बचा रहे, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि जो बादशाह न्यायप्रिय है, उसपर कोई विपत्ति नहीं आ सकती, वह तो ईश्वर से साक्षात्कार करना चाहता था।

एक दिन उसने सिंहासन पर सोते हुए किसके कुछ शब्द और धमाधम होने की आवाज सुनी।

वह अपने दिल में विचारने लगा कि यह किसीकी हिम्मत है, जो महल के ऊपर चढ़कर इस तरह धामाके से पैरे रक्खे! उसने झरोखों से डांटकर कहा, 'कौन है?"

ऊपर से लोगों ने सिर झुकाकर कहा, "रात में हम यहां कुछ ढूंढ़ने निकले हैं।"

बादशाह ने पूछा, "क्या ढूंढ़ने निकले हैं?"

लोगों ने उत्तर दिया, "हमारा ऊंट खो गया है उसे।"

बादशाह ने कहा, "ऊपर कैसे आ सकता है?"

उन लोगों ने उत्तर दिया, "यदि इस सिंहासन पर बैठकर, ईश्वर से मिलने की इच्छा की जा सकती है तो महल के ऊपर ऊंट भी मिल सकता हैं।"

इस घटना के बाद बादशाह को किसीने महल में नहीं देखा। वह लोगों की नजर से गायब हो गया।

[इब्राहीम का आन्तरिक गुण गुप्त था और उसकी सूरत लोगों के सामने थी। लोग दाढ़ी और गुदड़ी के अलावा और क्या देखते हैं?]१

१२/ चुड़ैल का जादू

एक राजा था। उसके एक नौजवान लड़का था। लड़का बड़ा सुंदर था। राज ने एक दिन स्वप्न में देखा कि लड़का मर गया। इकलौता बेटा, फिर सुन्दर और होनहार। राजा खूब रोया और सिर धुनने लगा। इतने में उसकी निद्रा भंग हो गयी। जागा तो सब भ्रम था। लड़का बड़े आनंद में था। पुत्र के जन्म पर जो खुशी हुई थी, अब उसके मरकर जीने पर उससे अधिक खुशी हुई।

जब राज-ज्योतिषियों को यह हाल मालूम हुआ तो वे दौड़े आये कहने लगे कि यह स्वप्न विवाह का सूचक है। अब जल्द राजकुमार का विवाह हो जाना चाहिए।

राजा एक साधु से परिचित थे, जो अपनी तपस्या और विद्या के कारण विख्यात था। साधु एक बड़ी सुन्दर लड़की थी। उसीसे राजा ने राजकुमार का विवाह करने का निश्चय किया। साधु के पास सन्देश भेजा। साधु बड़ा खुश हुआ और विवाह के लिए राजी हो गया। राजा के लड़के और साधु की लड़की का विवाह हो गया।

जब रानी को यह हाल मालूम हुआ कि पुत्र-वधू एक साधारण साधु की लड़की है, तो उसे बड़ा क्रोध आया। राजा से बोली, "तुमने अपनी प्रतिष्ठा का कुछ भी ख्याल न किया। राजा होकर साधु से रिश्ता जोड़ लिया!"

राजा ने रानी की बात सुनी तो कहने लगा, "तू उसको साधु न समझ, वह तो राजा है। जिसने अपनी इच्छाओं को वश में कर लिया वही राजा है। इन्द्रियों के दास को कौन बुद्धिमान मनुष्य राजा कह सकता है? बस, अब चिन्ता न कर मैंने राजा से रिश्ता जोड़ा है, साधु से नहीं।"

इधर तो यह हुआ और उधर राजकुमार को वह साधु की लड़की, जो वास्तव में बड़ी रुपवती थी, पसन्द नहीं आयी। उसे एक दूसरी ही स्त्री पसन्द थी।

वह स्त्री बिलकुल चुड़ैल थी। सब उससे नफरत करते थे। पर राजकुमार उसपर मुग्ध था। उसे इस चुड़ैल का इतना मोह हो गया था कि इसके लिए जान देने को भी तैयार था।

राजा का जब यह हाल मालूम हुआ तो सन्न रह गया। बार-बार राजकुमार के सौन्दर्य और उसकी वधू के रूप की याद करके उसके भाग्य पर रोने लगा। अब राजा को यह चिन्ता हुई कि किसी तरह राजकुमार का मन अपनी विवाहित स्त्री की ओर आकर्षित हो और इस चुड़ैल से छुटकारा मिले। यत्न करने से कार्य सिद्ध होता है। राजा ने जब यत्न करने का बीड़ा उठाया तो सफलता नज़र आने लगी। राजा को एक

जादूगर मिल गया। उसने कहा, "मैं अपनी विद्या से राजकुमार को चुड़ैल के चक्कर से निकाल दूंगा। आप घबराएं नहीं।"

यह कहकर जादूगर राजकुमार के पास पहुंचा और उसको अपनी जादू-भरी वाणी से उपदेश करने लगा। उपदेश सुनना था कि राजकुमार के होश ठिकाने आ गये और चुड़ैल को डांटकर कहने लगा कि तूने मुझे इतने दिनों तक बहकाये रक्खा। अब मैं एक क्षण के लिए भी तेरी सूरत नहीं देखना चाहता। चुडैल तुरन्त वहां से भाग गयी। राजकुमार उसके फन्दे से निकलकर अपनी परी-जैसी पत्नी के पास आ पहुंचा। जब उसे इस देवी के दर्शन हुए तो फूला न समाया। अब व अपने को सचमुच धन्य समझने लगा।

[यह दुनिया चुड़ैल के समान है, जो भोले मनुष्य को अपने जाल में फंसा कर, मक्ति-पथ से विचलित कर देती हैं परन्तु जब जादूगर की तरह कोई सच्चा ज्ञानी मिल जाता है तो मनुष्य के मन को परमात्मा की ओर लगा देता है।]१

१३/ बुद्धिमानों का संग

एक तुर्क घोड़े पर सवार चला आ रहा था। उसने देखा कि एक सोते हुए मनुष्य के मुंह में एक सांप घुस गया। सांप को मुंह से निकालने की कोई युक्ति समझा में न आयी तो मुसाफिर सोनेवाले के मुंह घूंसे लगाने लगा। सोनेवाला गहरी नींद से एकदम उछल पड़ा। देखा, एक तुर्क तड़ातड़ घूंसे मारता जा रहा है। वह मार को सहन न कर सका और उठकर भाग खड़ा हुआ। आगे-आगे वह और पीछे-पीछे तुर्क। एक पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां बहुत से सेव झड़े हुए पड़े थे। तुर्क कहा, "ऐ भाई! इन सेवों में से जितने खाये जायें, उतने तू खा। कमी मत करना।"

तुर्कं ने उसे ज्यादा सेव खिलाये कि सब खाया-पिया उगल-उगलकर मुंह से निकालने लगा। उसने तुर्कं से चिल्लाकर कहा, "ऐ अमीर! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था तू मेरी जान लेने पर उतारू हो गया? अगर तू मेरे प्राणों का ही गाहक है तो तलवार के एक ही वार से मेरा जीवन समाप्त कर दे। वह भी क्या बुरी घड़ी थी जबकी मैं तुझे दिखाई दिया।"

वह इसी तरह शोर मचाता और बुरा-भला कहता रहा और तुर्कं बराबर मुक्के-पर मुक्का मारता रहा। उस आदमी का सारा बदन दुखने लगा। वह थककर चूर-चूर हो गया। लेकिन वह तुर्कं दिन छिपने तक मार-पीट करता रहा, यहां तक कि पित्त के प्रकोप से उस आदमी का अब बार-बार बमन होनी शुरु हो गयी। सांप वमन के साथ बहार निकल आया।

जब उसेन अपने पेट से सांप को बाहर निकलते देखा तो डर का कारण थर-थर कांपने लगा। शरीर में जो पीड़ा घूंसों की मार से उत्पन्न हो गयी थी, वह तुरन्त जाती रही।

वह आदमी तुर्कं के पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा, "तू तो दया का अवतार है और मेरा परम हितकारी है। मैं तो मर चुका था। तूने ही मुझे नया जीवन दिया है। ऐ मेरे बादशाह, अग तू सच्चा हाल जरा भी मुझे बाता देता साथ ऐसी अशिष्टता क्यों करता है? परन्तु तूने अपनी खामोशी से मुझे हैरान कर दिया, और बिना कारण बताए बदन पर घूंसा मारने लगा। ऐ परोपकारी पुरुष! जो कुछ गलती से मेरे मुंह से निकल गया, उसके लिए मुझे क्षमा करना।"

तुर्कं ने कहा, "अगर मैं इस घटना का जरा भी संकेत कर देता ता उसी समय तेरा पित्त हो जाता और डर के मारे तेरी आधी जान निकल जाती। उस समय न तुझमें

इतने सेव खाने की हिम्मत होती और न उल्टी होने की नौबत आती है। इलिए मैं तो तेरे दुर्वचनों को भी सहन करता रहा। कारण बताना उचित नहीं था और तुझे छोड़ना भी मुनासिब नही था।"

[बुद्धिमानों की शत्रुता भी ऐसी होती है कि उनका दिया हुआ विष भी अमृत हो जाता है। इसके विपरीत मूर्खो की मित्रता से दु:ख और पथ-भ्रष्टता प्राप्त हाती है।]१

१४/हजरत अली और काफिर

हजरत अली खुदा के शेर थे। उनका आचरण दुर्वासनाओं से मुक्त था। एक बार युद्ध में तलावार लेकर शत्रु की तरफ झपटे। उसने हजरत अली के चेहरे पर थूक दिया। परन्तु हजरत अली अपने क्रोध को दबा गए। उन्होंने उसी समय तलवार फेंकर, इस काफिर पहलवान पर वार करने से हाथ खींच लिया। वह पहलवान उनके इस व्यवहार से ताज्जुब करने लगा कि दया-भाव प्रकट करने का यह क्या अवसर था?

उसने पूछा, "तुम अभी तो मुझप वार करना चाहते थे और अब तुरन्त ही तलवार फेंककर मुझे छोड़ दिया। इसका क्या कारण है! तुमने ऐसी क्या बात देखी कि मुझपर अधिकार प्राप्त करने के बाद भी मुकाबले से हट गये।"

हजरत अली ने कहा, "मैं केवल खुदा के लिए तलवार चलाता हूं, क्योंकि मैं खुदा का गुलाम हूं। अपनी इन्द्रियों का दास नहीं। मैं खुद का शेर हूं दुर्वासनाओं का शेर नहीं। मेरे आचरण धर्म के साक्षी हैं। सन्तोष की तलवार ने मेरे क्रोध को भस्म कर दिया है। ईश्वर का कोप भी मेरे ऊपर दया की वर्षा करता है।

"हजरत पैगम्बर ने मेरे नौकर के कान में फरमाया कि एक दिन वह मेरा सिर तन से जुदा कर दे। वह नौकर मुझसे कहता रहता है कि आप पहले मुझे ही कत्तल कर दीजि, जिससे ऐसा घोर अपराध मुझसे न होने पाये। परन्तु मैं उसे यही जवाब देता हूं—'जब मेरी मौत मेरे हाथ होनेवली है तो मैं खुदा के मुकाबले में बचने की क्यों कोशिश करूं?' इसी तरह दिन-रात मैं अपने कातिल को अपनी आंखों से देखत हूं। मगर मुझे उस पर क्रोध नहीं आता, क्योंकि जिस तरह आदमी को जान प्यारी है, उसी तरह मुझको मौत प्यारी है, क्योंकि इसी मौत से मुझे दूसरा (जन्नत का) जीवन प्राप्त होगा। बिना मौत मरना हमारे लिए हलाल है और आडम्बर रहित जीवन व्यतीत करना हमारे लिए नियामत है।

फिर हजरत अली ने पहलवान से कहा, "ऐ जवान! जबकि युद्ध के समय तूने मेरे मुंह पर थूका तो उसी समय मेरे विचार बदल गये। उस वक्त युद्ध का उद्देश्य आधा खुदा के वास्ते और आधा तेरे जुल्म करने का बदला लेने के लिए हो गया, हालांकि खुदा के काम में दूसरे के उद्देश्य को सम्मिलित करना उतिच नहीं है। तू मेरे मालिक की

बनायी हुई मूरत है और तू उसीकी चीज है। खुद की बनायी हुई चीज को सिर्फ उसीके हुक्म से तोड़ना चाहिए।"

इस काफिर पहलवान ने जब यह उपदेश सुना तो उसे ज्ञान हो गया। कहा, "हाय! अफसोस, मैं अबतक जुल्म के बीज बो रहा था। मैं तो तुझे कुद और समझता था। लेकिन तू तो खुदा का अन्दाज लगाने की न सिर्फ तराजू है, बल्कि उस तराजू की डंडी है। मैं उस ईश्वरीय ज्योति का दास हूं, जिससे तेरा जीवन-दीप प्रकाशित हो रहा है। इसलिए मुझे अपने मजहब का कलमा सिखा, क्योंकि तेरा पद मुझसे बहुत ऊंचा है।"

इस पहलवान के जितने निकट संबंधी और सजातीय थे, सबने उसी वक्त हजरत अली का धर्म ग्रहण कर लिया। हजरत अली ने केवल दया की तलवार से इतने बड़े दल को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया।

[दया की तलवार सममुच लोहे की तलवार से श्रेष्ठ है।] १

१५/ मोह का जाल

एक लड़का अपने बाप के ताबूत पर फूट-फूटकर रोता ओर सिर पीटता था, "पिताजी, लोग तुम्हें ले जा रहे हैं? ये तुम्हें एक अंधेरे गड्ढे में डाल देंगे, जहां न कालीन है, न बोरिया है, न वहां रात को जलाने के लिए दीपक है, न खाने के लिए भोजन। न इसका दरवाजा खुला है, न बन्द है। न वहां पड़ोसी हैं, जिससे सहारा मिल सके। तुम्हारा पवित्र शरीर, जिसे सम्मानपूर्वक लोग चूमते थे, उस सूने और अंधेरे घर में, जो रहने के बिल्कुल अयोग्य है, जिसमें रहने से चेहरे का रूप और सौन्दर्य जाता रहता है, क्योंकर रहेगा?" इस तरह वह लड़का कब्र का हाल बयान करता था और खून के आंसू उसकी आंखों से टपकते जाते थे। एक मसखरे ने ये शब्द सुनकर अपने आप से कहा, "पिताजी! भगवान् की कसम, मालूम होता है कि ये लोग इस लाश को हमारे घर ले जा रहे हैं।"

बाप ने मसखरे बेटे से कहा, "अरे मूर्ख, यह क्या अनुचित बात कहता है?"

मसखरे ने जवाब दिया "जो निशानियां इसने बतायी हैं, उन्हें तो सुनिए। ये जो चिह्न इसने एक-एक करके गिने हैं, वे वास्तव में सब-के-सब हमारे घर के हैं। हमारे घर मेंभी न बोरिया है, न चिराग हे, न खाना है, न दरवाजा है, न चौक है और न कोठा है।"

[इस तरह के शिक्षा ग्रहण करने के योग्य चिह्न सब मनुष्यों की दशा में विद्यमान हैं, परन्तु वे सांसारिक मोह में फंसे रहने के कारण इनपर ध्यान नहीं देते। यह हृदय, जिसमें ईश्वरीय ज्योति का प्रकाश नहीं पहुंचता, नास्तिक की आत्मा की तरह अन्धकारमय है। ऐसे हृदय से तो कब्र ही अच्छी है।]

१६/ हवा और मच्छर का मुकदमा

एक बार एक मच्छर ने न्यायी राज सुलेमान के दरबार में आकर प्राथ्रना की, "हवा ने हमपर ऐसे-ऐसे जुल्म किये हैं कि हम गरीब बाग की सैर भी नहीं कर सकते। जब फूलों के पास जाते हैं तो हवा आकर हमें उड़ा ले जाती है।, जिससे हमारे सुख-साम्राज्य पर हवा के अन्याय की बिजली गिर पड़ती है और हम गरीब आनन्द से वंचित कर दिये जाते हैं। हे पशु-पक्षियों तथा दीनों के दु:ख हरनेवाले, दोनों लोकों में तेरे न्याय-शासन की धूम है। हम तेरे पास इसलिए आये हैं कि तू हमारा इन्साफ करें।"

पैगम्बर सुलेमान ने मच्छर की जब यह प्रार्थना सुनी तो कहने लगे, "ऐ इंसान चाहनेवाले मच्छर! तुझको पता नहीं कि मेरे शासनकाल में अन्याय का कहीं भी नामोनिशान नहीं है। मेरे राज्य में जालिम का काम ही क्या! तुझको मालूम नहीं कि जिसदिन मैं पैदा हुआ था, अन्याय की जड़ उसी दिन खोद दी गयी थी। प्रकाश के सामने अंधेरा कब ठहर सकता है?"

मच्छर ने कहा, "बेशक, आपका कथन सत्य है, पर हमारे ऊपर कृपा-दृष्टि रखना भी तो श्रीमान ही का काम है। दया कीजिए और दुष्ट वायु के अत्याचारों से हमारी जाति को बचाइए।"

सुलेमान ने कहा, "बहुत बच्छा, हम तुम्हारा इंसाफ करते हैं, मगर दूसरे पक्ष का होना भी जरूरी है! जबतक प्रतिवादी उपस्थित न हो और दोनों ओर के बयान न लिखे जाये तबतक तहकीकात नहीं हो सकती, इसलिए हवा को बुलाना जरूरी है।"

सुलमान के दरबार से जब वायु के नाम हुक्म पहुंचा तो वह बड़े वेग से दौड़ता हुआ हाजिर हो गया। वायु के आते ही मच्छर ठहर नहीं सके। उन्हें भागते ही बना। जब मच्छर भाग रहे थे उस समय उनसे सुलेमान ने कहा, "यदि तुम न्याय चाहते हो तो भाग क्यों रहे हो? क्या इसी बलबूते पर न्याय की पुकार कर रहे हो?"

मच्छर बोला, "महाराज, हवा से हमारा जीवन ही नहीं रहता। जब वह आता है तो हमें भागना पड़ता हैं यदि इस तरह न भागें तो जान नहीं बच सकती।"

[यही दशा मनुष्य की है। जब मनुष्य आता है अर्थात जबतक उसमें अहंभाव विद्यमान रहता है, उसे ईश्वर नहीं मिलता और जब ईश्वर मिलता है तो मनुष्य की गन्ध नहीं रहती अर्थात उसका अहंभव बिलकुल मिट जाता है।]१

१८/ बाज और बादशाह

एक बादशाह ने बाज पाल रखा था। वह उस पक्षी से बड़ा प्रेम करता था और उसे कोई कष्ट नहीं होने देता था। एक दिन बाज के दिल में न जाने क्या समायी कि बादशाह को छोड़कर चला गया। पहले तो बादशाह को बहुत रंज हुआ। परन्तु थोड़े दिन बाद वह उसे भूल गया। बाज़ छूट कर एक ऐसे मूर्ख व्यक्ति के हाथ में पड़ गया कि जिसने पहले उसके पर काट डाले और नाखून तराश दिये फिर एक रस्सी से बांध कर उसके आगे घास डाल दी और कहने लगा, "तेरा पहला मालिक कैसा मूर्ख था कि जिसने नाखून भी साफ न कराये, बल्कि उल्टे बढ़ा दिये। देख मैं, आज तेरी कैसी सेवा कर रहा हूं। तेरे बढ़े हुए बालों को काट कर बड़ी सुन्दर हजामत बना दी है और नाखुनों को तराश कर छोटा कर दिया है।

"तू दुर्भाग्य से ऐसे गंवार के पल्ले पड़ गया, जो देखभाल करना भी नहीं जानता था। अब तू यहीं रह और देख कि मैं तुझको किस तरह घास चरा-चरा कर हृष्ट-पुष्ट बनाता हूं।"

पहले तो बादशाह ने बाज का खयाल छोड़ दिया था, लेकिन कुछ दिन बाद उसे फिर उसकी याद सताने लगी। उसने उसको बहुत ढुंढ़वाया, परन्तु कहीं पता न चला। तब बादशाह स्वयं बाज की तलाश में निकला। चलते-चलते वह उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां बाज अपने पर कटवाये रस्सी से बंधा घास में मुंह मार रहा था। बादशाह को उसकी यह दशा देखकर बड़ा दु:ख हुआ और वह उसे साथ लेकर वापस चला आया। वह रास्ते में बार-बार यही कहता रहा, "तू स्वर्ग से नरक में क्यों गया था?"

[बाज की तरह आदमी भी, अपने स्वामी परमात्मा को छोड़कर दु:ख उठाता हैं। संसार की माया उसे पंगु बना देती है और मूर्ख मनुष्य अपनी मूर्खता के कामों को भी बुद्धिमानी का कार्य समझते हैं।] १

१८/ मित्र की परख

मिस्र-निवासी हजरत जुन्नून ईश्वर-प्रेम में विह्वल होकर पागलों-जैसे आचरण करने लगे। शासन-सूत्र गुण्डों के हाथ में था। उन्होंने जुन्नून को कैद में डाल दिया। जब दुष्ट मनुष्यों को अधिकार प्राप्त होता है तो मंसूर-जैसा सन्त भी सूली पर लटका दिया जाता है। जब अज्ञानियों का राज होता है तो वे नबियों तक को कत्ल करा देते हैं।

जुन्नून पैरों में बेड़ियां और हाथों में हथकड़ियां पहने कैदखाने में पहुंचे। उनके भक्त हाल पूछने के लिए कैदखाने के चारो ओर जमा हो गये। वे लोग आपस में कहने लगे, "हो सकता है कि हजरत जान-बूझकर पागल बने हों। इसमें कुछ-न-कुद भेद जरू है, क्योंकि ये ईश्वर के भक्तों में सबसे ऊंचे हैं। ऐसे प्रेम से भी परमात्मा बचाये, जो पागलपन के दर्जे तक पहुंचा दे।"

इस तरह की बातें करते-करते जब लोग हजरत जुन्नून के पास पहुंचे तो उन्होंने दूर से ही आवाज दी, "कौन हो? खबरदार, आगे न बढ़ना!"

उन लोगों ने निवेदन किया, "हम सब आपके भक्त हैं। कुशल-समाचार पूछने के लिए सेवा में आये हैं। महात्मन्! आपका क्या हाल है? आपको यह पागलपन का झूठा दोष क्यों कर लगाया गया है? हमसे कोई हाल न छिपाकर इस बात को साफ-साफ बतायें। हम लोग आपके हितैषी हैं। अपने भेदों को मित्रों से न छिपाइए।"

जुन्नून ने जब ये बातें सुनीं तो उन्होंने इन लोगों की परीक्षा करने का विचार किया। वे उन्हें बुरी-बुरी गालियां देने और पागलों की तरह ऊट-पटांग बकने लगे। पत्थर-लकड़ी, जो हाथ लगा, फेंक-फेंककर मारने लगे।

यह देखकर लोग भाग निकले। जुन्नून ने कहकहा लगाकर सिर हिलाया और एक साधु से कहा, "जरा इन भक्तों को तो देखो। ये दोस्ती का दम भरते हें। दोस्तों को तो अपने मित्र का कष्ट अपनी मुसीबतों के बराबर होता है, और उनको मित्र से जो कष्ट पहुंचे उसे वह सहर्ष सहन करते हैं।"

[मित्र के कारण मिले हुए कष्टों और मुसीबतों पर खुश होना मित्रता की चिह्न है। मित्र का उदाहरण सोने के समान है और उसके लिए परीक्षा अग्नि के तुल्य है। शुद्ध सोना अग्नि में पड़कर निर्मल और निर्दोष होता है।] १

१९/ पथ-प्रदर्शक

हजरत मुहम्मद के एक अनुयायी बीमार पड़े और सूखकर कांटा हो गये। वे उसकी बीमारी का हाल पूछने के लिए गये। अनुयायी हजरत के दर्शनों से ऐसे संभले कि मानो खुदा ने उसी समय नया जीवन दे दिया हो। कहने लगे, "इस बीमारी ने मेरा भाग ऐसा चमकाया कि दिन निकलते ही यह बादशाह मेरे घर आया। यह बीमारी और बुखार कैसा भाग्यवान है! यह पीड़ा और अनिद्रा कैसी शुभ है!"

हजरत पैगम्बर ने उस बीमार से काह, "तूने कोई अनुचित प्रार्थना की हैं। तूने भूल में विष खा लिया है। याद कर, तूने क्या हुआ की?"

बीमार ने कहा, "मुझे याद नहीं। परन्तु मैं यह अवश्य चाहता हूं कि आपकी कृपा से वह दुआ याद आ जाये।"

आखिर हजरत मुहम्मद की कृपा से वह दुआ उसको याद आ गयी।

उसने का, "लीजिए, वह दुआ मुझे याद आ गयी। आप सदैव अपराधियों को पाप करने से मना करते थे और पापों के दंड का डर दिलाते थे। इससे मैं व्याकुल हो जाता था। न मुझे अपनी दशा पर संतोष था और न बचने की राह दिखायी देती थी। न प्रायश्चित की आश थी, न लड़ने की गुंजाइश और न भगवान् को छोड़ कोई सहायक दिखायी देता था। मेरे हृदय में ऐसा भ्रम पैदा हो गया था कि मैं बार-बार यही प्रार्थना करता था कि हे ईश्वर, मेरे कर्मों का दण्ड मुझे इसी संसार में दे डाल, जिससे मैं संतोष के साथ मृत्यु का आलिंगन कर सकूं। मैं इसी प्रार्थना पर अड़कर बैठ जाता था। धीरे-धीरे बीमारी ऐसी बढ़ी कि घुल-घुलकर मरने लगा। अब तो यह हालत हो गयी है कि खुदा की याद का भी खयाल नहीं रहता और अपने-पराये का ध्यान भी जाता रहा। यदि मैं आपके दर्शन न करता तो प्राण अवश्य निकल जाते। आपने बड़ी कृपा की।"

मुहम्मद साहब ने काह, "खबरदार, ऐसी प्रार्थना फिर न करना! ऐ बीमार चींटी, तेरी यह सामर्थ्य कहां कि खुदा तुझपर इतना बड़ा पहाड़ रक्खे?"

अनुयायी ने कहा, "तोबा! तोबा! ऐ सुलतान! अब मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि कोई प्रार्थना बेसोच-समझे नहीं करूंगा। ऐ पथ-प्रदर्शक! इस निर्जन बन में आप ही मुझे मार्ग दिखाइए और अपनी दया से मुझे शिक्षा दीजिए।"

हजरत रसूल ने बीमार से कहा, "तू खुदा से दुआ कर कि वह तेरी कठिनाइयों को आसान करे। ऐ खुदा! तू लोग और परलोक में हमें धैर्य और सुख प्रदान कर। जब हमारा निर्दिष्ट स्थान तू ही है तो रास्ते की मंजिल को भी सुखमय बना दे।"१

२०/ लुकमान की परीक्षा

हजरत लुकमान यद्यपि स्वयं गुलाम और गुलाम पिता के पुत्र थे, परन्तु उनका हृदय ईर्ष्या और लोभ से रहित था। उनका स्वामी भी प्रकट में तो मालिक था, परन्तु वास्तव में इनके गुणों के कारण दिल से इनका गुलाम हो गया था। वह इनको कभी का आजाद कर देता, पर लुकमान अपना भेद छिपाये रखना चाहते थे और इनका स्वामी इनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहता था। उसे तो हजरत सुकमान से इतना प्रेम और श्रद्धा हो गयी थी कि जब नौकर उसके लिए खाना लाते तो वह तुरन्तु लुकमान के पास आदमी भेजता, ताकि हले वह खालें और उनका बचा हुआ वह खुद खाये। वह लुकमान का जूठा खकर खुश होता था और यहां तक नौबत पहुंच गयी थी कि जो खाना वह न खाते, उसे वह फेंक देता था और यदि खाता भी था तो बड़ी अरुचि के साथ।

एक बार किसी ने उनके मालिक के लिए खरबूज भेजे। मालिक ने गुलाम से कहा, "जल्दी जाओ और मेरे बेटे लुकमान को बुला लाओ।"

लुकमान आये और सामने बैठ गये। मालिक ने छुरी उठायी और अपने हाथ से खरबूजा काटकर एक फांक लुकमान को दी। उन्होंने ऐसे शौक से खायी कि मालिक ने दूसरी फांक दी, यहां तक कि सत्रहवीं फांक तक वे बड़े शौक से खाते रहे। जब केवल एक टुकड़ा बाकी रह गया तो मालिक ने कहा, "इसको मैं खाऊंगा, जिससे मुझे भी यह मालूम हो कि खरबूजा कितना मीठा है।"

जब मालिक ने खरबूजा खाया तो कड़वाहट से कष्ठ में चिरमिराहट लगने लगी और जीभ में छाले पड़ गये। घंटे-भर तक मुंह का स्वाद बिगड़ा रहा। तब उसने आश्चर्य के साथ हजरत मुकमान से पूछा, "ऐ दोसत, तूने इस जहर को किस तरह खाया और इस विष को अमृत क्यों समझ लिया? इसमें तो कोई संतोष की बात नहीं है। तूने खाने से बचने के लिए कोई बहाना क्यों नहीं किया?"

हजरत लुकमान ने जवाब दिया, "मैंने आपके हाथ से इतने स्वादिष्ट भोजन खाये हैं कि लज्जा के कारण मेरा सिर नीचे झुका जाता है। इसीसे मेरे दिल ने यह गवारा नहीं किया कि कड़वी चीज आपके हाथ से न खाऊं। मैं केवल कड़वेपन पर शोर मचाने लगूं तो सौ रास्तों की खाक मेरे बदन पर पड़े। ऐ मेरे स्वामी, आपके सदैव शक्कर प्रदान करने वाले हाथ ने इस खरबूजे में कड़वाहट कहां छोड़ी थी कि मैं इसकी शिकायत करता!" १

२१/ हुदहुद और कौआ

जब सुलेमान के उत्तम शासन की धूम मची, तो सब पक्षी उनके सामने विनीत भाव से उपस्थित हुए। जब उन्होंने यह देखा कि सुलेमान उनके दिल का भेद जाननेवाला और उनकी बोली समझने में समर्थ है तो पक्षियों का प्रत्येक समूह बड़े अदब के साथ दरबार में उपस्थित हुआ।

सब पक्षियों ने अपनी चहचहाहट छोड़ दी और सुलेमान की संगति में आकर मनुष्यों से भी अधिक उत्तम बोली बोलने लगे। सब पक्षी अपनी-अपनी चतुराई और बुद्धिमानी प्रकट करते थे। यह आत्म-प्रशंसा कुद शेखी के कारण न थी; बल्कि वे सुलेमान के प्रति पक्षी-जगत् के भाव व्यक्त करना चाहते थे, जिससे सुलेमा को उचित आदेश देने और प्रजा की भलाई करने में सहायता मिले। होते-होते हुदहुद की बारी आयी। उसने कहा, "ऐ राज! एक ऐसा गुण, जो सबसे तुच्छ है, मैं बतलाता हूं, क्योंकि संक्षिप्त बात ही लाभकारी होती है।"

सुलेमान ने पूछा, "वह कौन-सा गुण है?"

हुदहुद ने उत्तर दिया, "जब मैं ऊंचाई पर उड़ता हूं तो पानी को, चाहे वह पाताल में भी हो, देख लेता हूं और साथ ही यह भी देख लेता हूं कि पानीद कहां हे, किस गहराई में है और किस रंग का है? यह भी जान लेता हूं कि वह पानी धरती में से उबल रहा है या पत्थर से रिस रहा है? ऐ सुलेमान! तू अपनी सेना के साथ मुझ-जैसे जानकार को भी रख।"

हजरत सुलेमान ने कहा, "अच्छा, तू बिना पानीवाले स्थानों और खतरनाक रेगिसतानों में हमारे साथ रहा कर, जिससे तू हमें मार्ग भी दिखाता रहे और साथ रहकर पानी की खोज भी करता रहे।"

जब कौए ने सुना कि हुदहुद को यह आज्ञा दे दी गयी, अर्थात् उसे आदर मिल गया है तो उसे डाह हुई और उसने हजरत सुलेमान से निवेदन किया, "हुदहुद ने बिल्कुल झूठ कहा है और गुस्ताखी की है। यह बात शिष्टाचार के खिलाफ है कि बादशाह के आगे ऐसी झूठ बात कही जाये, जो पूरी न की जा सके। अगर सचमुच उसकी निगाह इतनी तेज होती तो मुठ्टी-भर धूल में छिपा हुआ फन्दा क्यों नहीं देख पता, जाल में क्यों फंसता और पिंजरे में क्यों गिरफ्तार होता?" हजरत सुलेमान बोले, "क्यों रे हुदहुद! क्या यह सच है कि तू मेरे आगे जो दावा करता है वह झूठ है?"

हुदहुद ने जवाब दिया, "ऐ राजन्, मुझे निर्दोश गरीब के विरुद्ध शत्रु की शिकायतों पर ध्यान न दीजिए। अगर मेरा दावा गलत हो तो मेरा यह सिर हाजिर है। अभी गर्दन उड़ा दीजिए। रही बात मृत्यु और परमात्मा की आज्ञा से गिरफ्तारी की, सो इसका इलाज मेरे क्या, किसी के भी पास नहीं है। यदि ईश्वर की इच्छा मेरी बुद्धि के प्रकाश को न बुझाये तो मैं उड़ते-उड़ते ही फन्दे और जाल को भी देख लूं। परन्तु जब ईश्वर की मर्जी ऐसी ही हो जाती है तो अकल पर पर्दा पड़ जाता हैं। चन्द्रमा काला पड़ जाता है और सूजर ग्रहण में आ जाता है। मेरी बुद्धि और दृष्टि में यह ताकत नहीं है कि परमात्मा की मर्जी का मुकाबला कर सके।"

२२/ चोर की चालाकी

एक मनुष्य ने अपने घर में एक चोर को देखा और जब वह निकलकर भागा तो उसके पीछे दौड़ा कि देह थककर चूर-चूर हो गयी। जब चोर के इतना पास पहुंच गया कि उसको पकड़ ले तो दूसरे चोर ने पुकारकर कहा, "अरे मियां! यहां आओ। यहां तो देखों कि यहां कितने निशान मौजूद हैं। जल्दी लौटकर आओ।"

गृहस्वामी ने यह आवाज सुनी तो उसे डर लगने लगा। सोचने लगा, शायद दूसरे चोर ने किसी को मार डाला है या हो सकता है, वह मुझपर भी पीछे से टूट पड़। हो सकता है कि बाल-बच्चों पर भी हाथ साफ करे। तो फिर इस चोर के पकड़ने से क्या लाभ होगा?

यह सोचकर पहले चोर का पीछा करना छोड़ दिया और लौटकर वापस आया और उस आदमी से पूछा, "दोस्त! क्या बात है? तुम क्यों चिल्ला रहे थे?"

वह कहने लगा, "यह देखिए चोर के पैरों के निशान। वह दुष्ट अवश्य इस रास्ते से भागकर गया है। यह खोज मॉजूद है। बस, इसीको देखते-भालते उसके पीछे चले जाओ।"

गृहस्वामी ने कहा, "अरे मूर्ख! मुझे खोज क्या बताता है। मैंने असली चोर को दबा लिया था। तेरी चीख-चिल्लाहट सुनकर उसे छोड़ दिया। अरे बेवकूफ! यह तू क्या बेहूदा बक-वाद करता है। मैं तो लक्ष्य को पहुंच चुका था। भला निशान क्या चीज है! या तो तू गुण्डा है या बिल्कुल मूर्ख है। हो सकता है कि चोर तू ही हो और यह सब हाल तुझे मालूम हो।"

[मनष्य को अधिक लाभ का लालच देकर असली भलाई को रोका जा सकता है। इस तरह लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ती है।] १

२३/ चूहा और ऊंट

एक चूहे के हाथ ऊंट की नकेल लग गयी। वह बड़ी शान से खींचता हुआ चला। ऊंट जो तेजी से उसके पीछे चला तो चूहे के दिमाग में यह घमण्ड पैदा हो गया कि मैं भी पहलवान हूं। ऊंट चूहे के भावों को ताड़ गया और दिल में सोचा, अच्छा, तुझे इसका मजा चखाऊंगा। चलते-चलते वे एक बड़ी नदी के किनारे पहुंचे, जहां इतना गहरा पानी था कि हाथी भी डूब जाये। चूहा वहीं ठिठककर बैठ गया।

ऊंट ने कहा, "जंगलों और पहाड़ों के साथी, तुम क्यों रुक गये और इस समय क्या चिन्ता है? आओ, साहस करके नदी में उतरो। तुम तो सरदार और आगे-आगे चलनेवाले हो, बीच रास्ते में ठहरकर हिम्मत न हारो।"

चूहे ने जवाब दिया, "नदी का पाट बहुत चौड़ा है और मुझे इसमें डूब जाने का डर है।"

ऊंट ने कहा, "अच्छा, मैं देखू पानी कितना गहरा है।"

यह कहकर नदी में पैर रखा और कहा, "अरे चूहे, इसमें तो सिर्फ जांघ तक पानी हैं तू ऐसा विचलित और परेशान क्यों हो गया?"

चूहे ने कहा, "जो चीज तेरे आगे चींटी है, वही हमारे लिए अजगर है, क्योंकि जांघ जांघ का भी फर्क हैं अगर पानी तेरी जांघ तक है तो मेरे सिर से भी गजों ऊंचा होगा।"

ऊंट ने कहा, "खबरदार, आगे फिर कभी ऐसी गुस्ताखी न करना, नहीं तो स्वयं हानि उठायेगा। अपने जेसे चूहों के आगे तुम चाहे कितनी ही डींग हांको, परन्तु ऊंट के आगे चूहा जीभ नहीं हिला सकता!"

चूहे ने कहा, "मैं तौबा करता हूं। ईश्वर के लिए इस खतरनाक पानी से मेरी जान बचाओ।"

ऊंट को दया आयी और कहा, "अच्छा, मेरे कोहान पर चढ़कर बैठ जा। इस तरह आर-पार होना मेरा काम है। तुझ जैसे हजारों को नदी पार करा चुका हूं।"

[ऐ मनुष्य, जब तू पैगम्बर नहीं तो निर्दिष्ट मार्ग से चल, जिससे कि कुएं-खाई से बचकर आसानी से अपने लक्ष्य पर पहुंच जाये। जब तू बादशाह नहीं तो प्रजा बनकर रह और जब तू मल्लाह नहीं तो नाव को न चला। तांबे की तरह रसायन का सहारा ले। ऐ मनुष्य! तू महापुरुषों की सेवा कर।] १

२४/ नि:स्वार्थ दान

हजरत उमर की खिलाफत के जमाने में एक शहर में आग लग गयी। वह ऐसी प्रचंड अग्नि थी, जो पत्थर को भी सूखी लकड़ी की तरह जलाकर राख कर देती थी। वह मकान और मुहल्लों को भी जलाती हुई पक्षियों के घोंसलों तक पहुंची और अंत में उनके परो में भी लग गयी। इस आग की लपटों ने आधा शहर भून डाला, यहां तक कि पानी भी इस आग को न बुझा सका। लोग पानी और सिरका बरसाते थे, परन्तु ऐसा मालूम होता था कि पानी और सिरका उल्टा आग को तेज कर रहो हैं। अन्त में प्रजा-जन हजरत उमर के पास दौड़ आये और निवेदन किया कि आग किसी से भी नहीं बुझती।

हजरत उमर न फरमाया, "यह आग भगवान के कोप का चिह्न है और यह तुम्हारी कंजूसी की आग का एक शोला हैं। इसलिए पानी छोड़ दो और रोटी बांटना शुरू करो। यदि तुम भविष्य में मेरी आज्ञा का पालन करना चाहते हो तो मंजूसी से हाथ खींच लो।"

जनता ने जवाब दिया, "हमने पहले से खैरात के दरवाज खोल रखे हैं और हमेशा दया और उदारता का व्यवहार करते रहे हैं।"

हजरत उमर ने उत्तर दिया, 'यह दान तुमने निष्काम भावना से नहीं किया, बल्कि जो कुछ तुमने दिया है, वह अपना बड़प्पन प्रकट करने और प्रसिद्धि के लिए दिया है। ईश्वर के भय और परोपकार के लिए नहीं दिया। ऐसे दिखावे को उदारता और दान से कोई लाभ नहीं है।"१

२५/ तोता और गंजा फकीर

एक पंसारी के यहां तरह-तरह की बोलियां बोलने वाला एक बहुत सुन्दर तोता था। वह तोता दुकान की देख-रेख करता और प्यारी-प्यारी बोलियां बोलकर आन-जानेवालों का मनोरंजन किया करता था। एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि मालिक अपने घर गया हुआ था और तोता दुकान की निगरानी कर रहा था। इतने में एक बिल्ली चूहे पर झपटी, तोता अपनी जान बचाने के लिए जैसे ही एक तरफ को भागा कि दौड़-धूप में बादाम रोगन की कुछ बोतले लुढ़क गयीं।

जब मालिक घर से आया तो देखा कि तेल से तमाम फर्श चिकना हो गया है। पंसारी ने गुस्सा होकर तोते को ऐसी चोट मारी कि उसके सिर के बाल उड़ गये। इस रंज की वजह से तो तोते ने बोलना-चालना बिल्कुल छोड़ दिया। पंसारी अपने इस आचरण पर पश्चात्ताप करने लगा। वह बार-बार अपने जी में कहा कि क्या ही अच्छा होता, यदि मेरे हाथ उस घड़ी से पहले ही टूट जाते, जिस समय मैंने इस तोते को मारा था।

पंसारी ने अनेक प्रयत्न किये कि तोता बोलने लगे, परन्तु उसने एक शब्द तक भी अपने मुंह से नहीं निकाला। इसी तरह कई दिन गुजर गये, पंसारी अपनी दुकान पर बैठा हुआ इसी चिन्ता में मग्न था और सोचता था कि मेरा तोता कभी बोलेगा भी या नहीं, इतने में एक साधु सिर घुटाये हुए उस तरफ से निकले।

तोते ने तुरन्त साधु पर कटाक्ष किया और कहा कि ओ गंजे, शायद तूने भी तेल की बोतल गिरायी है, तो तुझे गंजा होना पड़ा।

सुननेवाले खूब हंसे कि लो साहब, यह तोता साधु को भी अपने समान समझता है।

[अपनी दशा के अनुसार संसार के अन्य सज्जन मनुष्यों और महापुरुषों की हालत का अन्दाज नहीं करना चाहिए। अक्सर ऐसा हुआ है कि लोगों ने महान आत्माओं को नही पहचाना, उनके उपदेशों पर अमल नहीं किया और पथ-भ्रष्ट हो गये।] १

२६/ सच्चा प्रेम

एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री थी, परी के समान। वह रास्ता चले हुए किसी कारण से खड़ी हो गयी। उसने देखा कि एक आदमी उसकी तरफ चला आ रहा है। जब पास आया तो उस स्त्री पर वह ऐसा मोहित हुआ कि उसे तन-मन की सुधि तक न रही। जब जरा होश हुआ तो उस सत्री की तरफ देखने लगा और फिर ऐसा आपे से बाहर हुआ कि उस सुन्दर रूप को अपने बाहु-पाश में बन्दी बनाने को तैयार हो गया। इस इरादे से वह आगे बढ़ा ही था कि स्त्री तुरन्त पीछे हट गयी और कहने लगी, "क्या बात है, जो इस तरह बढ़े चले आ रहे हो और सभ्यता की सीमा से बाहर जा रहे हो?"

पुरुष ने जवाब दिया, "यह सब तेरे रूप का जादू है। तेरे हाव-भावो ने तीर बरसाये हैं। क्या कहूं, तेरे सौन्दर्य ने मेरे हृदय को छीन लिया है। और जब अपने ऊपर तेरा अधिकार होते देखा है तो मुझे भी यह साहस हो गया कि अपनी रक्षा के लिए आगे बढ़कर वार करना चाहिए। अब तो मैं तेरा ही इच्छुक हूं। जबतक तुझे नहीं पा लूंगा, शान्ति नहीं मि सकती।"

वह स्त्री बोली, "मेरे पीछे मेरी एक दासी है। मुझसे भी अधिक सुन्दरी है। जब तू उसे देखेगा तो बड़ा खुश होगा। देख यह सामने से चली आ रही है।"

पुरुष ने पीछे मुड़कर देखा। दासी का कहीं पता न चला। जब देखते-देखते थक गया तो उस सुन्दरी ने बड़े जोर से एक तमाचा मारा और बोली, "ऐ कपटी! तुमको शर्म नहीं आती कि मेरे प्रेम का दावा करता हुआ भी दूसरे की तलाश करता है? तुझको प्रेमी बनने का अधिकार नहीं। तू प्रेमी नहीं, बल्कि धोखेबाज है।"

[हे आत्मन्! तू केवल परमात्मा का प्रेमी बन और माया-रूपी दुनिया कितनी सुन्दर हो, उससे मन न लगा, यहां तक कि सिवा परमात्मा के किसी से भी इच्छा न कर। न किसी के स्पर्श करने की कामना कर। किसी की गन्ध तक मल ले और न उसके अतिरिक्त किसी का ध्यान कर। तू भ्रम-जाल में फंसेगा तो उस परमात्मा के हाथों हानि उठायेगा] १

२७/ दूरदर्शी

एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, "मियां, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।"

उसने कहा, "मजाक न कर, भाई, मुझे तराजू चाहिए।"

सुनार ने कहा, "मेरी दुकान में झाडू नहीं हैं।"

उसने कहा, "मसखरी को छोड़ दे, मैं तराजू मांगने आया हूं, वह दे दे और बहरा बन कर ऊटपटांग बातें न कर।"

सुनार ने जवाब दिया, "हजरत, मैंने तुम्हारी बात सुन ली थी, मैं बहरा नहीं हूं। तुम यह न समझो कि मैं गोलमाल कर रहा हूं। तुम बूढ़े आदमी सूखकर कांटा हो रहे हो। सारा शरीर कांपता हैं। तुम्हारा सेना भी कुछ बुरादा है और कुछ चूरा है। इसलिए तौलते समय तुम्हारा हाथ कांपेगा और सोना गिर पड़ेगा तो तुम फिर आओगे कि भाई, जरा झाड़ू तो देना ताकि मैं सोना इकट्ठा कर लूं और जब बुहार कर मिट्टी और सोना इकट्ठा कर लोगे तो फिर कहोगे कि मुझे छलनी चाहिए, ताकि खाक को छानकर सोना अलग कर दूं। हमारी दुकान में छलनी कहां? मैंने पहले ही तुम्हारे काम के अन्तिम परिणाम को देखकर दूरदर्शी

कहा था कि तुम कहीं दूसरी जगह से तराजू मांग लाओ।"

[जो मनुष्य केवल काम के प्रारम्भ को देखता है, वह अन्धा है। जो परिणाम को ध्यान में रक्खे, वह बुद्धिमान है। जो मनुष्य आगे होने वाली बात को पहले ही से सोच लेता है, उसे अन्त में लज्जित नहीं होना पड़ता।]१

२८/ कांटों की झाड़ी

एक मुंह के मीठे और दिल के खोटे मनुष्य ने रास्ते के बीच में कांटों की झाड़ी उगने दी। जो पथिक उधर से निकलता, वही धिक्कार कर कहता कि इसको उखाड़ दे; लेकिन उसको वह उखाड़ता नहीं था, न उखाड़ा। इस झाड़ी की यह दशा थी कि प्रत्येक पल बढ़ती जाती थी और लोगों के पैर कांटे चुभने से लहू-लुहान हो जाते। जब हाकिम को इसकी खबर पहुंची और इस मनुष्य के पूर्ण आचरण का ज्ञान हुआ तो उसने झाड़ी को तुरन्त उखाड़ देने की आज्ञा दी। इस पर भी वह मनुष्य और जवाब दिया कि किसी फुर्सत के दिन उखाड़ डालूंगा। इस तरह बराबर टालमटोल करता रहा, यहां तक कि झाड़ी ने खूब मजबूत जड़ पकड़ ली।

एक दिन हाकिम ने कहा, "ऐ प्रतिज्ञा भंग करनेवाले, हमारी आज्ञा का पालन कर। बस अब एड़ियां न रगड़। तू जो रोज कल का वादा करता है। यह समझ कि जितना अधिक समय गुजरता जायेगा, उतना ही अधिक बुराई का वृक्ष पनपता जायेगा और उखाड़ने वला बुड्ढा और भी कमजोर होता जायेगा। पेड़ मजबूत और बड़ा होता जाता है। जल्दी कर और मौके को हाथ से न जाने दे।"

[मनुष्य की हर बुरी आदत कांटों की झाड़ी है। वह अनेक बार अपने आचरणों पर लज्जित होकर पश्चात्ताप करता है। वह अपनी आदतों से स्वयं भी तंग आ जाता है, फिर भी उसकी आंखें नहीं खुलतीं। दूसरों के कष्ट जो उसके ही स्वभाव के कारण हैं, अगर वह उसकी परवा नहीं करता तो न सही; लेकिन उसे अपने घाव का अनुभव तो होना ही चाहिए।] १

२९/ वैयाकरण और मल्लाह

एक वैयाकरण नाव में सवार था। वह घमंड में भरकर मल्लाह से कहने लगा, "क्या तुमने व्याकरण पढ़ा है?"

मल्लाह बोला, "नहीं।"

वैयाकरण ने कहा, "अफसोस है कि तुने अपनी आधी उम्र यों ही गंवा दी!"

मांझी को बड़ा क्रोध आया। लेकिन उस समय वह कुछ नहीं बोला। दैवयोग से वायु के प्रचंड झोंकों ने नाव को भंवर में डाल दिया।

नाविक ने ऊंचे स्वर में वैयाकरण से पूछा, "महाराज, आपको तैरना भी आता है कि नहीं?"

वैयाकरण ने कहा, "नहीं, मुझे तैरना नही आता।"

नाविक ने कहा, "वैयाकरण, तेरी सारी उम्र बरबाद हो गयी, क्योंकि नाव अब भंवर में डूबने वाली है।"

[मनुष्य को किसी एक विद्या या कला में दक्ष हो जाने पर गर्व नहीं करना चाहिए।] १

३०/ मन को मार

एक आदमी ने अपनी स्त्री को मार डाला। परिचितों ने कहा, "अरे दुष्ट! तूने अपनी स्त्री को मार डाला और उसकी सेवा को भूल गया। हाय-हाय, अभागे! भला बता तो सही, स्त्री-हत्या का पाप किसी भी जन्म में धो सकेगा? बात क्या थी और उसने क्या अपराध किया था?"

वह बोला, "उसने वह किया कि जिसमें उसकी बदनामी थी और मैंने उसको इसलिए मार डाला कि मिट्टी उसके दोषों को छिपा लेगी। उसका एक आदमी से अनुचित संबंध था इसलिए मैंने उसको मार डाला और खून में लिथड़ी हुई उसकी लाश को कब्र की मिट्टी में छिपा दिया।"

उस आदमी ने कहा, "ऐसा लज्जाशील था तो उस दुराचारी आदमी को क्यों नहीं मार डाला?"

उसने जवाब दिया, "फिर तो प्रतिदिन एक मनुष्य का वध करना पड़ता। बस उसको मारकर मैं रोज-रोज के रक्तपात से बच गया। उस अकेली का गला काटना बहुत से लोगों के गले काटने से अच्छा था।"

[मन उस दुराचारिणी स्त्री के समान है, जिससे सारा वातावरण दूषित हो रहा है। अत: उसको मारना चाहिए, अर्थात् वश में करना चाहिए, क्योंकि इस दुष्ट के कारण हर घड़ी किसी न किसीसे लड़ाई होने का अंदेशा है। मन की वासनाओं के कारण यह सुखमय संसार दु:खदायी बना हुआ है। यदि मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया जाये तो दु:ख और सुख पास न आयें और सारा संसार मित्र बनकर रहे।] १

३१/ 'तू' और 'मैं'

एक मनुष्य अपने प्रेमपात्र के दरवाजे पर आया और कुंडी खटखटायी। प्रेमपात्र ने पूछा, "कौन है?"

बाहर से जवाब मिला, 'मैं' हूं।"

प्रेमपात्र ने कहा, "तुम्हें लौट जाना चाहिए। अभी भेंट नहीं हो सकती। तुम जैसी कच्ची चीज के लिए यहां स्थान नहीं।"

उसने समझा कि प्रेमपात्र का मुझसे अपमान हुआ है।

यह जवाब सुनकर वह बेचारा प्रेमी निराश होकर अपने प्रेमपात्र के द्वारा से लौट गया। बहुत दिनों तक वियोग की आग में जलता रहा। अन्त में उसे फिर प्रेमपात्र से मिलने की उत्कण्ठा हुई और उसके द्वार पर चक्कर काटने लगा। कहीं फिर काई अपमानसूचक शब्द मुंह से न निकल जाये, इसलिए उसने डरते-डरते कुंडी खटखटायी। प्रेमपात्र ने भीतर से पूछा, "दरवाजे पर कौन है?"

उसने उत्तर दिया, "ऐ मेरे प्यारे, 'तू' ही है।"

प्रेम-पात्र ने आज्ञा दी कि अब जबकि 'तू' 'मैं' ही है, तो अन्दर चला आ।"

[एकता में दो की गुंजाइश नहीं। जब एक ही एक है तो फिर दुई कहां?] १

३२/ अच्छे-बुरे की परीक्षा

एक बादशाह ने दो गुलाम सस्ते दाम में खरीदे। एक से बातचीत की तो वह गुलाम बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ, और जब होठ ही मिठास के बने हुए हों तो उनमें शरबत को छोड़ और क्या निकलेगा? मनुष्य की मनुष्यता उसकी वाणी में भरी हुई है। जब इस गुलाम की परीक्षा कर चुका तो दूसरे को पास बुलाकर बादशाह ने देखा कि इसके दांत काले-काले हैं और मुंह गन्दा है। बादशाह इसके चेहरे को देखकर खुश नहीं हुआ, परन्तु उसकी योग्यता और गुणों की जांच करने लगा। पहले गुलाम को तो उसने कह दिया कि जा, और नहा-धोकर आ। दूसरे से कहा, "तू अपना हाल सुना। तू अकेला ही सौ गुलामों के बराबर है। तू ऐसा मालूम नहीं होता, जैसा तेरे साथी ने कहा था और उसने हमें तेरी तरफ से बिल्कुल निरश कर दिया था।"

गुलाम ने जवाब दिया, "यह बड़ा सच्चा आदमी है। इससे ज्यादा भला आदमी मैंने कोई नहीं देखा। यह स्वभाव से ही सत्यवादी है। इसलिए इसने जो मेरे संबंध में कहा है, यदि ऐसा ही मैं इसके बारे में कहूं तो झूठा दोष लगाना होगा। मैं इस भले आदमी की बुराई नहीं करुंगा। इससे तो यही अच्छा है कि अपने को दोषी मान लूं। बादशाह सलामत! सम्भव है कि वह मुझमें जो ऐब देखता हैं, वह मुझे खुद न दीखते हों।"

बादशाह ने कहा, "तू भी इसके अवगुणों का बखान कर, जैसा कि इसने तेरे दोषों का किया है, जिससे मुझे इस बात का विश्वास हो जाये कि तू मेरा हितैशी है और शासन के प्रबन्ध में मेरी सहायता कर सकता है।"

गुलाम बोला, "बादशाह सलामत! इस दूसरे गुलाम में नम्रता और सच्चाई हैं। वीरता और उदारता भी ऐसी है कि मौका पड़ने पर प्राण तक न्यौछावर कर सकता है। चौथी बात यह है कि वह अभिमानी नहीं और स्वयं ही अपने अवगुण प्रकट कर देता है। दोषों को प्रकट करना और ऐब ढ़ूंढ़ना हालांकि बुरा है तो भी वह दूसरे लोगों के लिए अच्छा है और अपने लिए बुरा हे।"

बादशाह ने कहा, "अपने साथी की प्रशंसा में अति न कर और दूसरे की प्रशंसा के सहारे अपनी प्रशंसा न कर, क्योंकि यदि परीक्षा के लिए इसे मैं तेरे सामने बुलाऊं तो तुझको लज्जित होना पड़ेगा।"

गुलाम ने कहा, "नहीं, मेरे साथी के सदगुण इससे भी सौ गुने हैं। जो कुछ मैं अपने मित्र के संबंध में जानता हूं, यदि आपको उसपर विश्वास नहीं तो मैं और क्या निवेदन करूं!"

इस तरह बहुत-सी बातें करके बादशाह ने उस कुरूप गुलाम की अच्छी तरह परीक्षा कर ली और जब पहला गुलाम स्नान करके बाहर आया तो उसको अपने पास बुलाया। बदसूरत गुलाम को वहां से बिदा कर दिया। उस सुन्दर गुलाम के रूप और गुणों की प्रशंसा करके कहा, "मालूम नहीं, तेरे साथी को क्या हो गया था कि इसने पीठ-पीछे तेरी बुराई की!"

इसगुलाम ने भौं चढ़ाकर कहा, "ऐ दयासागर! इस नीच ने मेरे बारे में जो कुछ कहा; उसका जरा-सा संकेत तो मुझे मिलना चाहिए।"

बादशाह ने कहा, "सबसे पहले मेरे दोगलेपन का जिक्र किया कि तू प्रकट में दवा और अन्तर में दर्द है।"

जब इसने बादशाह के मुंह से ये शब्द सुने तो इसका क्रोध भड़क उठा, चेहरा तम-तमाने लगा और अपने साथी के संबंध में जो कुछ मुंह में आया, बकने लगा। बुराइयां कतरा ही चला गया तो बादशाह ने इसके होंठों पर हाथ रख दिया कि बस, हद हो गयी। तेरी आत्मा गन्दी है और उसका मुंह गन्दा है। ऐ गन्दी आत्मावाले! तू दूर बैठ। वह गुलाम अधिकारी बने और तू उसके अधीन रह।

[याद रखो, सुन्दर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं तो उसका मान नहीं हो सकता। और यदि रूप बुरा, पर चरित्र अच्छा है तो उस मनुष्य के चरणों में बैठकर प्राण विसर्जन कर देना भी श्रेष्ठ है।] १

३३/ ईंट की दीवार

एक नदी के किनारे पर ऊंची दीवार थी। उसपर एक प्यासा आदमी बैठा हुआ था। बिना पानी के उसके प्राण निकले जा रहे थे। दीवार पानी तक पहुंचने में रुकावट डालती थी और वह प्यास के मारे व्याकुल हो रहा था। उसने दीवार की एक ईंट उखाड़कर पानी में जो फेंकी तो पानी की आवाज कान में आयी। वह आवाज भी उसे ऐसी प्यारी लगी, जैसे प्रेमपात्र की आवाज होती है। इसी एक आवाज ने शराब की सी मस्ती पैदा कर दी।

उस दुखियारे को पानी की ध्वनि में इतना आनन्द आया कि वह दीवार में से ईंटें उखाड़कर पानी में फेंकने लगा। पानी की यह दशा थी, मानो वह कह रहा था कि ऐ भद्र परुष, भला मेरे ईंटें मारने से तुझे क्या लाभ? प्यासा भी मानो अपनी दशा से यह प्रकट कर रहा था कि मेरे इसमें दो लाभ हैं। इसलिए मैं इस काम से कभी हाथ नहीं रोकूंगा। पहला लाभ तो पानी की आवाज का सुनना है। यह प्यासों के लिए रबाब (एक प्रकार का बाजा) की आवाज से अधिक मधुर है। दूसरा लाभ यह है कि जितनी ईंटें मैं इस दीवार की उखाड़ता जाता हूं, उतना ही निर्मल जल के निकट होता जाता हूं, क्योंकि इस ऊंची दीवार से जितनी ईंटें उखड़ती जायेंगी, उतनी ही दीवार नीची होती चली जायेगी। दीवार का नीचा होना पानी के निकट होना है।"

[ईंटों की चिनाई का उखाड़ना वन्दना (प्रणति) है। जबतक इस दीवार की गर्दन ऊंची हे, वह सिर को झुकाने नहीं देती। इसलिए जबतक इस पंच भौतिक शरीर से मुक्ति न प्राप्त हो, अमृत (अमर जीवन) के आगे सिर नहीं झुक सकता। इस यौवन के महत्व को समझकर सिर झुकाना चाहिए और बुढ़ापा आने से पहले यानी उस समय से पहले जब कि तेरी गर्दन बढ़ी हुई रस्सी से बंध जायेगी और बुरी आदतों की जड़ें ऐसी मजबूत हो जायेंगी कि उनके उखाड़ने की ताकत न रहे, अपनी दीवार (दुर्वासनाओं) के ढेलों और ईंटों को उखाड़कर फेंक दे।]१

संबंधित कड़ियाँ[edit]

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विलियम शेक्सपियर(बप्तिस्मा (baptised) 26 अप्रैल 1564 - 23 अप्रैल 1616), एक अंग्रेज़ी (English) कवि और नाटककार (playwright) थे, उन्हें व्यापक रूप से अंग्रेजी भाषा में सबसे महान लेखक और विश्व की पूर्व सुप्रसिद्ध नाटककार माना जाता था.[१]उन्हें आमतौर पर इंग्लैंड के राष्ट्रीय कवि (national poet) और " एवोन (Avon) का कवि (Bard) " कहा जाता है. ( या केवल "कवि")उनकी उपलब्ध कृतियों में 38 नाटक (plays), 154 सोंनेट (sonnets) , दो लम्बी वर्णनात्मक कवितायें (narrative poem) और अन्य कई दूसरी कवितायें हैं. उनके नाटक प्रायः दुनिया की हर एक भाषा में अनुवादित किए गए हैं और किसी भी दूसरे नाटककार की तुलना में कहीं अधिक बार उनका मंचन किया गया है.[२]

शेक्सपियर का जन्म और उनका पालन पोषण एवोन नदी के तट पर बसे स्ट्रेफोर्ड / स्ट्रेफोर्ड अपोन एवोन में हुआ. (Stratford-upon-Avon)18 वर्ष की उम्र में उन्होंने एन्ने हैथवे (Anne Hathaway) से शादी की, जिनसे उनकी तीन संताने हुईं : सूजैन (Susanna), और जुड़वा हैम्नेट (Hamnet) और जुडिथ (Judith). 1585 और 1592 के बीच उन्होंने लन्दन में एक अभिनेता, लेखक, और नाटक कंपनी (playing company) दी लोर्ड चम्बेर्लें'स मेन (Lord Chamberlain's Men)जिसे बाद में किंग'स मेन (King's Men) के नाम से जाना गया, के एक हिस्से के मालिक के रूप में एक सफल कैरियर शुरू किया.ऐसा मालूम पड़ता है की सन 1613 ईसवी के आस पास वे स्ट्रैटफ़ोर्ड चले आए , जहाँ पर तीन वर्षों के बाद उनकी मृत्यु हो गई. शेक्सपियर की निजी ज़िन्दगी दे जुड़े कुछ तथ्य मौजूद हैं , और इससे जुड़े कुछ मामलों जैसे, उनकी कामुकता (sexuality), धार्मिक विश्वास (religious beliefs)और क्या उनकी कृतियाँ वास्तव में दूसरों के द्वारा लिखी गई थीं (written by others) [३], के बारे में अलग अलग विचार हैं.

शेक्सपियर की सबसे अधिक प्रसिद्धः कृतियों का रचनाकाल सन 1590 ईसवी से सन 1613 ईसवी के बीच का है. उनके आरंभिक नाटक मुख्यतः हास्य प्रधान /प्रहसन (comedies)और ऐतिहासिक ( histories) हैं. इनमे सोलहवीं सदी के अंत तक आते आते उनकी शैली अभिजात्यता और कलात्मकता के शिखर पर पहुँच जाती है. लगभग सन 1608 ईसवी तक उन्होंने मुख्य रूप से दुखांत नाटक ( tragedies)लिखे, जिनमे शामिल हैमलेट (Hamlet), किंग लीअर (King Lear) और मैकबेथ (Macbeth), अंग्रेज़ी भाषा साहित्य के कुछ बेजोड़ नमूने माने जाते हैं. अपनी साहित्य यात्रा के अन्तिम पड़ाव में उन्होंने दुखांत हास्य रचनाएँ (tragicomedies)लिखी, जिन्हें रोमांसस के नाम से जाना जाता है और अन्य नाटककार के साथ सहयोग / मिलकर काम किया.उनके बहुत से नाटक, उनके जीवनकाल में ही कई संस्करण गुणवत्ता व विवरण की यथार्थता की दृष्टि से अलग अलग रूपों में प्रकाशित हुए और 1623 ईसवी में उनके थिएटर / नाट्य समूह के पुराने साथियों ने फर्स्ट फोलियो (First Folio) प्रकाशित किया, जिसके अंतर्गत उनकी नाट्य कृतियों, जिसमे उनके दो नाटकों, जिन्हें अब उनके द्वारा लिखित मान लिया गया, को छोड़कर शेष सभी नाटक संगृहीत थे.

शेक्सपियर अपने समय के एक सम्मानित कवि और नाटककार थे. परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के पहले तक उनकी प्रतिष्ठा अपने वर्त्तमान स्वरुप को प्राप्त नहीं कर पायी थी. विशेष रूप से, रोमांटिक्स (Romantics) ने शेक्सपीयर की प्रतिभा को प्रशंसा दिलाई, और दी विक्टोरिंस ( Victorians) के हीरो-श्रद्धा के साथ शेक्सपियर की पूजा करते हैं जिसके साथ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने "बर्दोलाट्री (bardolatry)" को बुलाया था.[४]बीसवीं शताब्दी में उनकी कृतियाँ विद्वत्ता और निष्पादन के क्षेत्रों में होने वाले नए आंदोलनों के द्वारा बार बार अपनाई और पुनार्न्वेषित की गयीं . उनके नाटक आज भी बहुत लोकप्रिय हैं पूरी दुनिया में विभिन्न सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सन्दर्भों में निरंतर मंचित और पुनर्व्याख्यायित हो रहे हैं.

अनुक्रम [छुपाएँ] १ जीवन १.१ प्रारंभिक जीवन १.२ लंदन और नाटकीय कैरियर/ जीवन १.३ अन्तिम वर्ष और मृत्यु २ नाटक २.१ प्रदर्शन २.२ टेक्स्ट के स्रोत ३ कविता ३.१ सोंनेट्स ४ शैली ५ प्रभाव ६ नाजुक प्रतिष्ठा ७ शेक्सपियर के बारे में अटकलें ७.१ ग्रन्थकारिता ७.२ धर्म ७.३ लिंग आधार ८ कार्यों की सूची ८.१ नाटकों का वर्गीकरण ८.२ कार्य ९ साहित्यिक प्रशंसा १० नोट्स ११ सन्दर्भ १२ अग्रगामी पठन/ अध्ययन १३ वाह्य संपर्क / कड़ी

[संपादित करें] जीवन [संपादित करें] प्रारंभिक जीवन

स्ट्रैटफ़ोर्ड अपोन एवोन (Stratford-upon-Avon) में जॉन शेक्सपियर के घर शेक्सपियर के कोट ऑफ़ आर्म्सविलियम शेक्सपियर जॉन शेक्सपियर (John Shakespeare) के बेटे थे, जो एक सफल दस्तानेवाला (glove) और पुराध्यक्ष (alderman) था, वो मूल रूप से स्निटरफील्ड (Snitterfield) का था और एक संपन्न जमींदार किसान की बेटी मरियम आर्डेन (Mary Arden) से शादी की थी.[५]उसका जन्म एवोन नदी के तट पर बसे स्ट्रेफोर्ड में हुआ था. और उनका बप्तिस्मा / दीक्षा संस्कार 26 अप्रैल , सन 1564 ईसवी को हुआ. उनका अज्ञात जन्मदिन परंपरागत रूप से 23 अप्रैल, सेंट जॉर्ज दिवस (St George's Day) को मनाया जाता है.[६]यह तारीख, जो अठारहवी सदी के एक विद्वान की गलती मानी जा सकती है, ध्यान खींचती है क्यूंकि शेक्सपियर 23 April 1616 को मरा था.[७]वह आठ संतानों में तीसरे स्थान पर और जीवित रहने वाले ज्येष्ठ पुत्र थे.[८]

यद्यपि उस युग कस कोई भी प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नही है, लेकिन फ़िर भी अधिकतर जीवनी लेखक इस पर सहमत हैं कि शेक्सपियर की शिक्षा स्ट्रेटफोर्ड,[९] के किंग्स न्यू स्कूल (King's New School) में हुई थी, जो की एक 1553 [१०]में एक चार्टर्ड मुक्त विद्यालय था और उनके घर से एक चौथाई मील दूर था.एलिजाबेथ युग के दौरान व्याकरण पाठशालायें (Grammar school) कई प्रकार की होती थीं, लेकिन पूरे इंग्लैंड में [११]पाठ्यक्रम कानून द्वारा निश्चित होता था और विद्यालयों में लैटिन व्याकरण व प्राचीन साहित्य ( classics) गहन अध्ययन होता था.[१२] 18 वर्ष की आयु में , शेक्सपियर ने 26 वर्षीया अन्ने हैथवे (Anne Hathaway)से विवाह किया. वॉर्सेस्टर के धर्मप्रदेश (Diocese of Worcester) के परिषद् न्यायलय (consistory court) ने 27 नवम्बर 1582 को विवाह लाइसेंस जारी किया. हैथवे के दो पड़ोसियों ने अगले दिन बांड जारी किए इस बात की सुनिश्चितता के लिए कि विवाह में कोई बाधा नहीं है. [१३]युगल ने यह विवाह समारोह संभवतः जल्दी जल्दी में आयोजित किया होगा , क्योंकि वॉर्सेस्टर के कुलपति (chancellor)ने आमतौर पर तीन बार पढ़े जाने वाले विवाह निषेधों ( marriage banns)को एक ही बार पढ़े जाने कि अनुमति दी थी.[१४]इसका कारण एन्ने की गर्भावस्था रही होगी. शादी के छः महीने के बाद, उसने एक पुत्री सुजैन (Susanna) को जन्म दिया, जिसका बप्तिस्मा 26 मई 1583 ईसवी को किया गया.[१५] जुड़वा पुत्र हम्नेट (Hamnet) और पुत्री जुडिथ (Judith)इसके दो वर्षों के बाद दुनिया में आए और 2 फरवरी 1585 को उनका बप्तिस्मा / दीक्षा संस्कार किया गया.[१६]अज्ञात कारणों से 11 वर्षा कि अवस्था में हम्नेट कि मृत्यु हो गई और उसका अन्तिम संस्कार 11 अगस्त (11 August) , 1596[१७] को किया गया.

जुड़वा संतानों के जन्म के बाद, कुछ ही ऐतिहासिक सूत्र उपलब्ध हैं, उस वक्त तक के जब तक कि उनका उल्लेख लन्दन थियेटर के दृश्य के एक भाग के रूप में नही होता है.इस व्यवधान के कारन विद्वान् सन 1585 ईसवी से 1592 ईसवी के मध्य के कालखंड को " खोये हुए वर्षों" [१८]के नाम से संबोधित करते हैं. इस कालखंड के विवरण एकत्र कराने का प्रयास करने वाले जीवन वृत्त अनेक अप्रमाणिक / संदिग्ध कहानियों से पूर्ण हैं. निकोलस रो (Nicholas Rowe), शेक्सपियर के पहले जीवनीकार स्ट्रैटफ़ोर्ड कि एक किंवदंती का उल्लेख करते हैं कि अवैध रूप से किए गए हिरन के अवैध शिकार (poaching) के अभियोग से बचने के लिए शेक्सपियर लन्दन भाग गए थे. [१९]अठारहवीं शताब्दी कि एक अन्य कथा के अनुसार शेक्सपियर ने अपने नाट्य / थिएटर के जीवन कि शुरुआत लन्दन में थिएटर के मालिकों के घोडों कि देखभाल का काम करने से शुरू कि थी. [२०]जॉन ऑब्रे (John Aubrey) उल्लेख करते हैं कि शेक्सपियर एक ग्रामीण स्कूल में मास्टर [२१]रहे थे. बीसवीं सदी के कुछ विद्वानों के मतानुसार शेक्सपियर को लंकाशायर के कैथोलिक जमींदार अलेक्जेंडर होटन के द्वारा स्कूल के अध्यापक के रूप में नियुक्त किए गए होंगे, जिसने अपनी वसीयत में किसी "विलियम शेक्सशाफ्त" का उल्लेख किया है. [२२]इस प्रकार की दंतकथाओं के पीछे कोई प्रमाण नही है, सिवाय उनकी मृत्यु के बाद सुनी गई अफवाहों के अतिरिक्त.[२३]

[संपादित करें] लंदन और नाटकीय कैरियर/ जीवन इस बारे में स्पष्ट रूप से ज्ञात नही है कि शेक्सपियर ने लेखन कब शुरू किया, लेकिन समकालीन हवाले और नाटकों के विवरण ये सूचित करते हैं कि उनके अनेक नाटक सन 1592 ईसवी तक लन्दन में मंचित किए जा चुके थे. [२४]लेकिन वे तब तक लन्दन में इतने जाने जा चुके थे कि नाटककार रॉबर्ट ग्रीन (Robert Greene) अपनी लेखनी के द्वारा उन पर आक्षेप / हमला करने लगे थे.

... एक नवोदय कौआ है, हमारे पंख से सजा हुआ, की अपने खिलाडी के रूप में लिपटे बाघ के हृदय ले साथ, वह भी लम्बी चौडी बातचीत करके आपके सर्वोत्तम रूप से एक रिक्त पद्य बाहर लाने में सक्षम है: और सिर्फ़ एक जोहन्नेस का नौकर होना ही, उसके अभिमान में देश को हिलाने वाला अकेला दृश्य है.[२५]

विद्वानों में इन शब्दों के यथार्थ मतलब को लेकर मतभेद है,[२६] लेकिन अधिकांश इस बात पर सहमत हैं कि यहाँ ग्रीन शेक्सपिअर को अपने स्तर से ऊपर उठकर विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त लेखकों, जैसे क्रिस्टोफर मार्लो (Christopher Marlowe), थॉमस नाश (Thomas Nashe) और स्वयं ग्रीन की बराबरी करने का आरोप लगा रहे हैं.[२७]मज़ाक उडाते इस इटालिक लिपि में लिखे वाक्यांश पंक्ति "ओह, बाघ का दिल एक औरत में छिपा है" शेक्सपियर की हेनरी VI, भाग 3 (Henry VI, part 3)में है, "हिलाने के दृश्य" के साथ, शेक्सपियर को ग्रीन के लक्ष्य के रूप में पहचानती है.[२८]

" ये पूरी दुनिया एक रंगमंच है,

और सभी स्त्री और पुरूष अभिनेता मात्र हैं.

उनके अपने प्रवेश और निकास हैं;

और एक व्यक्ति अपने आवंटित समय में बहुत सी भूमिकायें अदा करता है...."

एज यू लाइक इट (As You Like It), अंक द्वितीय, दृश्य 7, 139 - 42.[२९]

ग्रीन का यह ज़बानी हमला शेक्सपियर के नाट्य जीवन के सन्दर्भ में प्रथम दर्ज उल्लेख है. जीवनीकारों का मानना है कि शेक्सपियर के कैरियर / नाट्य जीवन का आरम्भ, सन 1580 ईसवी के मध्य किसी समय, ग्रीन की टिप्पणी के ठीक पहले हो चुका था.[३०] सन 1594 ईसवी से शेक्सपियर के नाटक केवल लौर्ड चेम्बेर्लिंस मेन (Lord Chamberlain's Men) नामक नाट्य समूह, जिसकी बागडोर अभिनेताओं के एक समूह , जिसमे शेक्सपियर भी शामिल थे के हाथ में थी, के द्वारा मंचित किए जाते थे, और जो शीघ्र ही लन्दन की एक प्रमुख नाटक कंपनी (playing company) बन गई.[३१]सन 1603 ईसवी में महारानी एलिजाबेथ की मृत्यु के बाद, नाटक कम्पनी, नए शासक जेम्स प्रथम (James I) के द्बारा एक शाही सनद / अधिकार पत्र / पेटेंट से सम्मानित की गई और इसका नाम बदलकर किंग्स मेन (King's Men) हो गया.[३२]

सन 1599 ईसवी में कम्पनी के भागीदार सदस्तों ने मिलकर, थेम्स नदी के दक्षिणी किनारे पर एक अलग रंगशाला/ थिएटर का निर्माण किया, जिसे उन्होंने ग्लोब (Globe)नाम दिया. सन 1608 ईसवी में, ब्लाक्क्फ्रिअर्स इनडोर थिएटर (Blackfriars indoor theatre)को भी भागीदारों के इस समूह द्वारा अधिकृत कर लिया गया. शेक्सपियर के जायदाद की ख़रीदी और निवेश से सम्बंधित दस्तावेज़ बताते हैं कि कम्पनी से उन्हें बहुत आर्थिक लाभ हुआ था.[३३]सन 1597 ईसवी में उन्होंने स्ट्रैटफ़ोर्ड, न्यू प्लेस (New Place) का दूसरा सबसे बड़ा घर खरीद लिया और सन 1605 ईसवी में उन्होंने स्ट्रैटफ़ोर्ड में तिथेस (tithes) मोहल्ले (parish) में निवेश किया.[३४]

शेक्सपियर के कुछ नाटक सन 1594 ईसवी से क्वार्टो (quarto)संस्करण में प्रकाशित हुए. सन 1598 ईसवी तक उनका नाम बिकने लगा और अब उनका नाम किताबों के मुख्य पृष्ठों (title page) [३५]पर छपने लगा. एक नाटककार के रूप में अपनी सफलता के बाद भी उन्होंने अपने नाटकों व अन्य नाटकों में अभिनय करना जारी रखा. बेन जोनसन की (Ben Jonson) कृतियों के सन १६१६ ईसवी में प्रकाशित संस्करण में उनका नाम एवरी मन इन हिज़ हुमर (Every Man in His Humour) (१५९८) और सेजानस, हिज़ फाल (Sejanus, His Fall) (१६०३) [३६] के कलाकारों की सूची में मिलता है. जोंसन लिखित वोल्पोन (Volpone) के कलाकारों की सूची में शेक्सपियर के नाम की गैरमौजूदगी को कुछ विद्वान् उनके अभिनय जीवन के अन्त्प्रय होने का संकेत मानते हैं. [३७]यद्यपि 1623 का प्रथम अध्याय (First Folio) शेक्सपियर की गिनती इन सभी नाटकों के प्रमुख नायकों में करता है. जिनमे से कुछ वोल्पोन के बाद पहली बार मंचित किए गए. तथापि निश्चित रूप से यह नही कहा जा सकता की उन्होंने कौन से पात्र अभिनीत किए. [३८]1610 में, जॉन डेविस ऑफ हियरफोर्ड (John Davies of Hereford) ने लिखा की "गुड विल" ने "राजकीय" भूमिका निभाई.[३९]सन १७०९ ईसवी में रो के कथनानुसार शेक्सपियर ने हैमलेट के पिता के भूत / आत्मा की भूमिका निभाई.[४०]बाद के विवरण यह बताते हैं कि उन्होंने एज यूं लाइक ईट (As You Like It)में ऐडम और हेनरी पंचम (Henry V)[४१]में कोरस कि भूमिकाएं भी निभाई थीं, यद्यपि विद्वान् इन सूचनाओं के स्त्रोत को पूरी तरह विश्वसनीय नही मानते. [४२]

अपने कैरियर के दौरान शेक्सपियर ने अपने समय को लन्दन और स्ट्रैटफ़ोर्ड के बीच में बाँट रखा था. सन 1596 ईसवी, स्ट्रैटफ़ोर्ड में न्यू प्लेस को अपने पारिवारिक घर के रूप में खरीदने से पहले शेक्सपियर सेंट हेलन मुहल्ले (parish) में बिशपगेट (Bishopsgate), जो थेम्स नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है में रहते थे. [४३]सन 1599 ईसवी में वह नदी के दूसरी ओर साऊथवार्क में आ गए , यह वही साल था जिस साल उनकी कंपनी ने वहां ग्लोब थियेटर का निर्माण किया था. [४४] सन 1604 ईसवी तक एक बार फिर वे नदी के उत्तरी किनारे की तरफ़ आ गए और सेंट पॉल गिरजा (St Paul's Cathedral)के उत्तर में स्थित एक इलाके में जहाँ पर कई आलीशान मकान थे को अपना बसेरा बनाया. यहाँ पर उन्होंने फ्रांस के प्रोटेस्टेंट समुदाय के अनुयायी (Huguenot) , जिसका नाम क्रिस्टोफर माउन्टजोय था और जो औरतों के विग तथा अन्य केशसज्जा सामग्री का निर्माता से कमरा किराये पर लिया.[४५]

[संपादित करें] अन्तिम वर्ष और मृत्यु

शेक्सपियर की कब्र / स्मारक (Shakespeare's funerary monument) एवोन नदी के किनारे बसे स्ट्रैटफ़ोर्ड /स्ट्रैटफ़ोर्ड अपोन एवोन में है.सन 1606 - 1607 ईसवी के बाद शेक्सपियर ने बहुत ही कम नाटक लिखे और सन 1613 ईसवी के बाद उन्हें किसी भी नाटक को लिखने का श्रेय नही दिया जाता. [४६]उनके पिछले तीन नाटकों सहयोग थे, संभवतः जॉन फ्लेत्चेर (John Fletcher) के साथ थे,[४७] जो घरेलू नाटककार के रूप में "किंगस मेन" के लिए उत्तराधिकारी बना.[४८]

रो वह पहले जीवनीकार हैं , जिन्होंने यह मत पारित किया कि शेक्सपियर अपनी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व[४९] स्ट्रैटफ़ोर्ड चले गए थे परन्तु यह नही कहा जा सकता कि उन्होंने उस समय तक पूरी तरह सांसारिक जीवन से सन्यास ( retirement) ले लिया था,[५०] और शेक्सपियर लन्दन आते जाते रहते थे.[४९]सन 1612 ईसवी में उन्हें माउन्टजोय कि बेटी मेरी के विवाह सम्बन्धी मामले के निपटारे से सम्बंधित, अदालत के एक मामले में गवाह के तौर पर बुलाया गया था. [५१]मार्च, सन 1613 ईसवी में उन्होंने ब्कैक्फ्रिअर्स मठ (priory);[५२]में एक मकान (gatehouse)खरीदा और नवम्बर, 1614 ईसवी से वह अपने दामाद जोन हाल (John Hall)[५३]}के साथ कई हफ्तों तक लन्दन में थे.

23 अप्रैलसन 1616 ,[५४] को शेक्सपियर की मृत्यु हो गई और वे अपने पीछे अपनी पत्नी और दो पुत्रियाँ छोड़ गए. सन 1607 ईसवी में,[५५] सुज़न ने एक डॉक्टर जोन हाल से विवाह किया और जुडिथ ने शेक्सपियर की मृत्यु से दो महीने पूर्व थॉमस क्विनी (Thomas Quiney), जो की एक शराब व्यवसायी (vintner) थे से विवाह किया.[५६]

गुड फ्रेंड लेस्व्स सेक फोरबिअर,

यहाँ संकलित डिवीएसटी को खोदने के लिए

ब्लेस्ट बे ये मन यत स्पर्स ठेस स्टोंस,

एंड क्व्र्स्त बे हे यत मोवेस माय बोनस.

शेक्सपियर की कब्र पर अंकित लेख

अपनी वसीयत में शेक्सपियर ने अपनी अगाध संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपनी बड़ी पुत्री सुसंना को दिया. [५७]जिसमे यह कहा गया था की वह इसे पूरे का पूरा "अपने स्व उत्पन्न बड़े पुत्र" को देगी.[५८]क्विनी की तीन संताने थीं और इन सभी की बिना विवाह किए ही मृत्युं हो गई.[५९]हॉल की एक संतान थी, एलिजाबेथ, जिसने दो बार विवाह किया लेकिन सन 1670 ईसवी में बिना किसी संतान प्राप्ति के ही उसकी मृत्यु हो गई और इसके साथ ही शेक्सपियर से सीधे रूप में जुड़े उनके वंश का अंत हो गया. [६०]शेक्सपियर की वसीयत में मुश्किल से ही उनकी पत्नी एन्ने का उल्लेख मिलता है, जो की स्वतः ही शेक्सपियर की संपत्ति के तिहाई हिस्से की वारिस बन गई थीं.शेक्सपियर ने विशेष रूप से अपनी वसीयत में एनी के लिए " माई सेकंड बेस्ट बेड" देने के उल्लेख किया है , जिसके बारे में तरह तरह के अनुमान लगाये जाते हैं. [६१]कुछ विद्वान् इस वसीयत को एन्ने के अपमान के रूप में देखते हैं. जबकि अन्य का मानना है कि उल्लिखित "सेकेण्ड बेस्ट बेड" से तात्पर्य वैवाहिक बेड से रहा होगा और इसका अभिप्राय धनाढ्यता से है.[६२]

शेक्सपियर को उनकी मृत्यु के दो दिन बाद पवित्र ट्रिनिटी गिरजे (Holy Trinity Church) के चंसल (chancel) में दफनाया गया. [६३]सन 1623 ईसवी से कुछ पहले, नॉर्थ वाल में शेक्सपियर कि स्मृति में लिखने की मुद्रा में उनकी प्रतिमा के साथ एक स्मारक ( monument)का निर्माण किया गया. इसके फलक पर अंकित लेख में एक तुलना नेस्टर (Nestor), सुकरात (Socrates)और वर्जिल से की गई है. [६४]उनकी कब्र को ढकने वाली एक शिला पर उनकी अस्थियों को वहाँ से हटाने के ख़िलाफ़ एक अभिशाप लिखा हुआ है.

[संपादित करें] नाटक शेक्सपियर के लेखकीय जीवन को विद्वानों ने प्रायः चार कालखंडों के रूप में देखा है. [६५]सन १५९० ईसवी के मध्य तक उन्होंने लोकप्रिय वृत्तान्त परम्परा में मुख्यतः हास्य प्रधान रचनाएं लिखीं , जो की रोमन और इटैलियन मोडल्स व ऐतिहासिक नाटकों से प्रभावित थीं. उनका दूसरा कालखंड लगभग सन १५९५ ईसवी से उनकी दुखांत रचना रोमियो और जूलियट (Romeo and Juliet) के सृजन से आरम्भ होकर जुलिअस केसर (Julius Caesar) नामक दुखांत कृति पर आकर सन १५९९ ईसवी में समाप्त होता है.इस दौरान उन्होंने जो भी लिखा उन सभी की गिनती महानतम हास्य प्रधान व ऐतिहासिक रचनाओं में होती है. लगभग सन 1600 से 1608 ईसवी तक का समय शेक्सपियर का "दुखांत युग" माना जाता है. इस दौरान शेक्सपियर ने मुख्यतः दुखांत रचनाओं का ही सृजन किया और लगभग सन 1608\ ईसवी से 1613 ईसवी तक उन्होंने हास्य प्रधान दुखांत रचनायें (tragicomedies) लिखीं, जिन्हें रोमान्सेज़ (romances)के नाम से भी जाना जाता है.

रिचर्ड तृतीय (Richard III) औरहेनरी षष्ठ ( Henry VI) के तीन भाग , शेक्सपियर द्वारा रचित प्रथम दर्ज कृतियाँ हैं, जो सन १५९० ईसवी के आरम्भ में , ऐतिहासिक नाटकों के चलन के दौर में लिखी गई थीं. शेक्सपियर के नाटकों की तिथि निर्धारित करना मुश्किल है तथापि, [६६]मूल ग्रंथों के अध्ययन से यह पता चलता है कि टाइटस एंड्रोनिकस (Titus Andronicus), कॉमेडी ऑफ़ एरर्स (The Comedy of Errors),द टेमिंग ऑफ़ द श्रीऊ (The Taming of the Shrew) और टू जेंटलमैन ऑफ़ वेरोना (Two Gentlemen of Verona) भी शेक्सपियर के आरंभिक काल से सम्बद्ध हो सकते हैं. [६७]उनका पहला इतिहास ( histories), जो बड़ी मात्रा में 1587 के राफेल होलिंशेद'स ( Raphael Holinshed's) च्रोनिक्लेस ऑफ़ इंग्लैंड, स्कॉट्लैंड, और आयरलैण्ड के संस्करण में प्रकाशित हुआ था,[६८] कमजोर या भ्रष्ट शासन के विनाशकारी परिणाम को नात्यांतरित किया था और ट्यूडर वंश (Tudor dynasty) की उत्पत्ति के लिए एक औचित्य के रूप में व्याख्या की गई थी.[६९]उनके संघटन अन्य एलिज़बेथान नाटककारों के कार्यों से प्रभावित था, खासकर थॉमस क्य्द (Thomas Kyd) और क्रिस्टोफर मारलोवे (Christopher Marlowe) से, मध्ययुगीन नाटक की परंपराओं, और सेनेका ( Seneca) के नाटकों द्वारा.[७०] कॉमेडी ऑफ़ एरर्स भी क्लासिकल मॉडल पर आधारित थी , लेकिन टेमिंग ऑफ़ द श्रयु का कोई भी स्त्रोत अभी तक जानकारी में नही है, यद्यपि इसका सम्बन्ध इसी नाम के एक अन्य नाटक से स्थापित किया जाता है और इसे किसी लोककथा से व्युत्पन्न माना जाता है. [७१]टू जेंटलमेन ऑफ़ वेरोना की तरह, जिसमे दो दोस्त एक बलात्कार का अनुमोदन करने के लिए आए थे,[७२] दी श्रेव'स स्टोरी ऑफ़ टैमिंग एक औरत की स्वतंत्र आत्मा को एक आदमी द्वारा कभी कभी आधुनिक आलोचकों और निर्देशकों को मुसीबत देता है.[७३]


बोबेरॉन, टितानिया और परियों के नृत्य के साथ पुक.विलियम ब्लेक (William Blake)के द्वारा , सी. 1786.टेट ब्रिटेन . (Tate Britain)

शेक्सपियर की प्रारंभिक शास्त्रीय और इतालवी हास्य रचनाएँ , जिसमें चुस्त दोहरे कथानक और सटीक हास्य दृश्यों को 1590 तरह के मध्य में अपने वातावरण को रोमांटिक हास्य सबसे बड़ी है .[७४] मिडसमर नाईट ड्रीम (A Midsummer Night's Dream)एक हास्य की झलक लिए प्रेम, परियों के जादू और जीवन के हास्यप्रद दृश्यों का मिश्रण है.[७५]शेक्सपियर की अगली हास्य रचना जो की उतनी ही रोमांटिक है, वेनिस का सौदागर (The Merchant of Venice), जेविश साहूकार के बदले की रचना समाये हुए, शायलॉक (Shylock), जो के एलिज़बेथान के विचारों को दर्शाती है परन्तु आधुनिक दर्शकों के लिए पक्षपातपूर्ण हो सकता है.[७६]मच अदो अबाउट नथिंग (Much Ado About Nothing) का ज्ञान और शब्दों से खेलने की कला,[७७] एज यू लाइक इट (As You Like It) का आकर्षक ग्रामीण सजावट, औरट्वेल्फ़्थ नाईट (Twelfth Night) की जीवंत क्रीड़ा शेक्सपियर के महान हास्य के अनुक्रम को पूरा करते हैं.[७८]इस गीतात्मक रिचर्ड द्वितीय (Richard II) के बाद, लगभग पूरी तरह पद्य में लिखा, शेक्सपियर ने 1590 के अंत में हेनरी IV, भाग 1 ( Henry IV, parts 1) और 2 ( 2) , और हेनरी वी (Henry V) के इतिहास में गद्य कॉमेडी शुरू कीउसके पात्र और अधिक जटिल और नर्म होते गए जैसे जैसे वो हास्य से गंभीर दृश्यों की ओर सहजता से बढता गया, गद्य और कविता, उसका परिपक्व काम है, और उसके विभिन्न प्रकार के काम की परिपक्वता को पाता है.[७९] यह युग खत्म और शुरू होता है दो त्रासदियों से: रोमियो और जूलियट (Romeo and Juliet), जो यौन आरोपित किशोरावस्था, प्यार और मौत की प्रसिद्ध रोमांटिक त्रासदी है;[८०] और जूलियस सीज़र ( Julius Caesar)—जो सर थॉमस नॉर्थ'स (Thomas North's) के 1579 के प्लुतार्च'स (Plutarch's) परल्लेल लिवेस (Parallel Lives)— के अनुवाद पर आधारित है, जिसने एक नए तरह के नाटक की शरुआत की.[८१]शेक्सपियर के महान विद्वान जेम्स शापिरो के अनुसार, जूलियस कैसर में, "राजनीति, चरित्र, अंदर की ओर, समसामयिक घटनाओं, यहाँ तक कि शेक्सपियर की अपनी कुछ लिखने की कला के विभिन्न पहलू एक दूसरे से मिलने लगे".[८२]


हेमलेट, होरातियो, मर्सल्लुस, और घोस्ट ऑफ़ हम्लेट'स फादर.हेनरी फुसेली (Henry Fuseli), 1780-5. कुंस्थौस ज्यूरिख (Kunsthaus Zürich).शेक्सपियर का तथाकथित "त्रासदीक समय" 1600 से 1608 तक चला, जबकि उसने उस समय में तथाकथित "प्रॉब्लम प्लेज" ( "problem plays") मेजर फॉर मेजर (Measure for Measure), त्रोइलुस एंड क्रेस्सिदा (Troilus and Cressida), और अल'स वेल ठाट एंड्स वेल (All's Well That Ends Well) भी लिखे और ट्रेजिडिज़ (tragedies)उसके पहले लिखा.[८३]कई आलोचकों का मानना है कि शेक्सपियर की सबसे बड़ी त्रासदियों उसकी कला के शिखर का प्रतिनिधित्व करते हैं.पहले, हेमलेट (Hamlet) के नायक, शायद और अधिक किसी भी अन्य शेक्सपियर के चरित्र की तुलना में, विशेष रूप से चरचित हुआ है, खासकर अपने प्रसिद्द सोलिलोकुय (soliloquy) "टु बी और नॉट टु बी; देट इस दी कुएस्शन (To be or not to be; that is the question). "[८४]अंतर्मुखी हेमलेट के विपरीत, जिसका मिथ्या दोष उसकी हिचकिचाहट थी, उन त्रासदियों के हीरो जो, ओथेल्लो और किंग लेअर की थी, जल्बाजी की त्रुटियों से बिगड़ गए.[८५] शेक्सपियर की त्रासदी के कारण अक्सर इस तरह के घातक त्रुटियों या दोष हैं, जो आदेश उलट कर नायक को और जिन्हें वह प्यार करता है को नष्ट कर देते हैं.[८६]ओथेल्लो (Othello), थे विल्लैन लागो (Iago)में, ओथेल्लो की यौन ईर्ष्या को इस तरह भड़काता है की वो अपनी निर्दोष पत्नी की हत्या कर देता है जो उसे प्यार करती थी.[८७]किंग लेअर (King Lear) में, बूढ़ा राजा, अपनी शक्तियों को देने की त्रासद त्रुटि करता है, और इन घटनाओं की शुरूआत करता है जो उसकी बेटी की हत्या कर देते हैं और अर्ल ग्लौसस्टर को प्रताडित कर अँधा कर देते हैं.आलोचक फ्रैंक केर्मोडे के अनुसार, "नाटक अपने अच्छे पात्रो से कुछ प्रस्तुत करता है और ना ही अपनी क्रूरता से अपने दर्शकों को कोई राहत".[८८]माकबेथ (Macbeth)में, जो शेक्सपियर की त्रासदियों में सबसे छोटी और ज्यादा दबी हुई है,[८९] जो ना संभाली जा सके वो महत्वाकांक्षा माकबेथ और उसकी पत्नी को उकसाती है, लेडी माकबेथ (Lady Macbeth) को, राजा की हत्या और सिंहासन हड़पने के लिए, जब तक उनके अपने अपराधबोध बदले में उन्हें नष्ट नही कर देता है.[९०]इस नाटक में, शेक्सपियर के त्रासद संरचना करने के लिए एक अलौकिक तत्व जोड़ता है.उनकी कुछ पिछली प्रमुख त्रासदियाँ, एंटनी और क्लेओपत्र (Antony and Cleopatra) और कोरिओलानुस (Coriolanus) में, शेक्सपियर की बेहतरीन कविता शामिल है और आलोचक द्वारा कवि की सबसे सफल त्रासदियों कही गई थी टी. एस एलियट (T. S. Eliot).[९१]

अपनी अंतिम अवधि में, शेक्सपियर रोमांस ( romance) या ट्रेजीकामेडी (tragicomedy) करने लगे थे और तीन और प्रमुख नाटकों: क्य्म्बेलिने (Cymbeline), दी विंटर'स टेल (The Winter's Tale) और दी टेम्पेस्ट (The Tempest), और साथ ही साथ सहयोग से, पेरिक्लेस, प्रिन्स ऑफ़ ट्य्रे (Pericles, Prince of Tyre) पूरा किया.कम त्रासदियों से बेरंग, ये चार नाटक 1590 के हास्य की टोन में गंभीर हैं, लेकिन सुलह और सम्भावित त्रासद त्रुटियों की क्षमा के साथ वे अंत होते हैं.[९२]कुछ टिप्पणीकारों मूड में यह परिवर्तन निर्मल को देखने के साक्ष्य के रूप में शेक्सपियर के जीवन के भाग में देखा है, लेकिन यह केवल दिन के नाटकीय फैशन प्रतिबिम्बित हो सकते हैं.[९३]शेक्सपियर दो और नाटकों पर सहयोग लियाहेनरी VIII (Henry VIII) और दी टू नोबल किन्स्में (The Two Noble Kinsmen), संभवतः जॉन फ्लेत्चेर (John Fletcher) के साथ.[९४]

[संपादित करें] प्रदर्शन यह स्पष्ट नहीं है की किन कंपनियों के लिए शेक्सपियर ने अपने शुरुआती नाटकों को लिखा .टाइटस एंड्रोनिकस का 1594 के संस्करण का शीर्षक पृष्ठ यह दिखता है कि नाटक तीन अलग अलग समूह द्वारा किया गया था.[९५]1592-3 के बाद की विपत्तियों (plagues) के बाद, शेक्सपियर के नाटकों का अपनी ही कंपनी द्वारा प्रदर्शन किया गया था दी थिएटर (The Theatre) और दी कर्टेन (Curtain) शोरेदित्च (Shoreditch) में, थम्स के उत्तर में.[९६]लन्दनवासी वहाँ हेनरी IV का पहला भाग देखने के लिए टूट पड़े, लियोनार्ड दिग्गेस (Leonard Digges) ने रिकॉर्डिंग की, "लेकिन फल्स्ताफ्फ़ आओ हैल, पोंस, बाकी ... और तुम्हारा एक कमरे होगा".[९७]जब कंपनी ने ख़ुद को अपने मकान मालिक के साथ विवाद में पाया, तो उन्होंने इस थिएटर नीचे खींच लिया और ग्लोब थिएटर (Globe Theatre) का निर्माण करने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल किया है, पहला रंगमंच अभिनेताओं द्वारा कलाकारों के लिए साउथवर्क के दक्षिणी तट पर निर्मित किया गया.[९८]ग्लोब 1599 की शरद ऋतु में, जूलियस कैसर पहले नाटकों में से एक के मंचन, के साथ खोला शेक्सपियर के 1599 के बाद के अधिकांश महान नाटकों को ग्लोब के लिए लिखा गया था, जिनमे हेमलेट, ओथेल्लो और राजा लेअर.[९९]


फ़िर से बनाग्लोब थिएटर (Globe Theatre)लंदन.लोर्ड चम्बेर्लें'स मेन के बाद का किंग'स मेन (King's Men)1603 में नामित हुआ, वे नएराजा जेम्स (King James)के साथ एक खास रिश्ते में प्रविष्ट हुए.हालांकि प्रदर्शन रिकॉर्ड टुकडों में हैं, राजा के पुरुषों ने दरबार के बीच सात शेक्सपियर के नाटकों का प्रदर्शन किया1 नवंबर1604 और 31 अक्टूबर (31 October)1605 के बीच, वेनिस के व्यापारी के दो प्रदर्शन के सहित.[१००]1608 के बाद, उन्होंने ब्लाक्क्फ्रिअर्स थिएटर (Blackfriars Theatre) के अन्दर प्रदर्शन किया, सर्दियों के दौरान और ग्लोब गर्मियों के दौरान.[१०१]यह आतंरिक सज्जा, जकोबेँ (Jacobean) फैशन सहित मस्कुएस (masques) के शाही मंचन के लिए, शेक्सपियर को और अधिक व्यापक स्तर पर शाही मंचन को लेन की अनुमति दी.क्य्म्बेलिनेमें, उदाहरण के लिए, ज्यूपिटर एक ईगल पर बैठकर "गर्जन और बिजली में : वह एक वज्रपात फेंकता है.भूत अपने घुटनों पर गिर गए."[१०२]

शेक्सपियर की कंपनी में कलाकारों में प्रसिद्ध रिचर्ड बुर्बगे (Richard Burbage), विलियम केम्पे (William Kempe), हेनरी कंडेल (Henry Condell) और जॉन हेमिन्गेस (John Heminges) शामिल हैं.शेक्सपियर के कई पहले के नाटकों में बुर्बगे ने प्रमुख भूमिका निभाई है, जिनमे रिचर्ड III, हेमलेट, ओथेल्लो, और राजा लेअर शामिल हैं.[१०३]लोकप्रिय हास्य अभिनेता विल केम्पे ने पीटर नौकर की भूमिका निभाई रोमियो और जूलियट और डॉगबेरी (Dogberry) मच अदो अबाउट नोथिंग में, अन्य कलाकारों के बीच में.[१०४]वह सोलहवीं शताब्दी के अंत के आसपास रॉबर्ट आर्मिन (Robert Armin)द्वारा बदला गया, जो इस तरह की भूमिकाओं को निभाता था जैसे टचस्टोन (Touchstone) में अज यू लइके इट और किंग लेअर में मूर्ख.[१०५] 1613 में, सर हेनरी वोत्तों (Henry Wotton) द्वारा दर्ज किया गया है कि हेनरी VIII "धूमधाम और समारोह के कई असाधारण परिस्थितियों के साथ आगे लाया गया था".[१०६]29 जून को, हांलाकि, एक तोप का ग्लोब के छप्पर को आग लगा दी और थियेटर को ज़मीन तक जला दिया, एक घटना जो शेक्सपियर के नाटक की दुर्लभ परिशुद्धता को इंगित करता है.[१०६]

[संपादित करें] टेक्स्ट के स्रोत thumb|right|शीर्षक पृष्ठ, 1623. मार्टिन ड्रोएशौट (Martin Droeshout)के द्वारा शेक्सपियर की कॉपर उत्कीर्णन .

1623 में, जॉन हेमिन्गेस (John Heminges) और हेनरी कंडेल (Henry Condell), शेक्सपियर के दो मित्र जो कि किंग्स मेन से थे ने, फर्स्ट फोलियो (First Folio), शेक्सपियर के नाटकों का एक एकत्र संस्करण, प्रकाशित किया.इसमे 36 ग्रन्थ हैं, जिसमे पहली बार मुद्रित 18 ग्रन्थ भी शामिल हैं.[१०७]कई नाटक पहले ही क्वार्टो (quarto) के संस्करणों में आये थे, -झीना पुस्तकें दो बार चार पत्तियां बनाने के लिए मुदे कागज की चादरों से बने.[१०८]कोई सबूत नहीं है कि शेक्सपियर ने इस संस्करण को मंजूरी दी है, जिसे "फर्स्ट फोलियो" स्टोल'न और छल प्रतियां के रूप में वर्णित करता है.[१०९]अल्फ़्रेड पोल्लार्ड ( Alfred Pollard) उनमें से कुछ को "बेड कुँरतो (bad quarto)" की संज्ञा दे चुके हैं. उनके एक सम्मान, व्याख्या, या भ्रष्ट ग्रन्थ, जो कुछ जगह से स्मृति से निकाले गए हो.[११०]जहाँ नाटक के कई संस्करण बच जाते हैं, हर कोई एक दूसरे से अलग होता है (differs from the other).यह मतभेद कॉपी या मुद्रण (printing) से उग सकते हैं, अभिनेता या दर्शकों के लेख द्वारा, या शेक्सपियर के अपने कागजात ( papers) से.[१११] कुछ मामलों में, उदाहरण के लिए हेमलेट, त्रोइलुस और क्रेस्सिदा (Troilus and Cressida) और ओथेल्लो, शेक्सपियर कुँरतो और फोलियो संस्करणों के बीच ग्रंथों को संशोधित कर सकता था.किंग लेअर का फोलियो संस्करण 1608 कुँरतो से इतना अलग है कि ऑक्सफोर्ड शेक्सपियर ने उन दोनों को प्रकाशित किया, जबकि वे भ्रम के बिना सम्मिश्रण नहीं किए जा सकता है.[११२]

[संपादित करें] कविता 1593 और 1594 में, जब सिनेमाघर प्लेग की वजह से बंद रहे थे, शेक्सपियर ने, कामोत्तेजक विषयों पर दो वर्णनात्मक कविताओं को प्रकाशित कियावीनस और अदोनिस (Venus and Adonis) और दी रैप ऑफ़ लुक्रेस (The Rape of Lucrece).उसने उन्हेंहेनरी रिओथेस्लेय, साउथेम्प्टन के अर्ल (Henry Wriothesley, earl of Southampton) को समर्पित किया.वीनस और अदोनिस में, एक निर्दोष अदोनिस (Adonis) वीनस (Venus) के यौन अग्रिमों को खारिज कर देता है; जबकि दी रैप ऑफ़ लुक्रेसमें, पतिव्रता लुक्रेस (Lucrece) का कामातुर तर्कुं (Tarquin) द्वारा बलात्कार किया जाता है.[११३] ओविड की (Ovid's) मेटामोर्फोसेस (Metamorphoses) से प्रभावित ,[११४] ये कविता अनियंत्रित कामुकता के परिणाम स्वरूप उपजे अपराधबोध और नैतिक भ्रम दिखाती है.[११५]शेक्सपियर के जीवनकाल के दौरान दोनों लोकप्रिय साबित हुए और अक्सर दुबारा प्रकाशित होते थे.तीसरी वर्णित कविता, ए लोवर'स कंप्लेंट (A Lover's Complaint), जिसमें एक जवान औरत एक ठोस आवेदक द्वारा अपने प्रलोभन को रोकर देती है, 1609 में सोंनेट्स के पहले संस्करण में छपी थी.कई विद्वान अब स्वीकार करते हैं कि ए लवर'स कंप्लेंट शेक्सपियर ने लिखा.आलोचकों का मानना है कि इसके अच्छे गुणों को सीसे के प्रभाव द्वारा हानि पहुंचाई गई है[११६] दी फिनिक्स और दी टर्टल (The Phoenix and the Turtle), 1601 में रॉबर्ट चेस्टर के लोवर'स मरत्यर में प्रकाशित हुई थी, महान फिनिक्स (phoenix) और उसके प्रेमी तथा वफ़ादार टर्टल दोव (turtle dove) का मृत्यु शोक व्यक्त किया .1599 में, सोंनेट्स के दो जल्दी ड्राफ्ट 138 और 144 दी पेशोनेट पिलग्रिम (The Passionate Pilgrim)में, शेक्सपियर के नाम के अंतर्गत प्रकाशित हुए थे लेकिन उसकी अनुमति के बिना.[११७]

[संपादित करें] सोंनेट्स "क्या मैं तुम्हें एक गर्मी के दिन की तुलना दूँ?

तुम्हारी कला अधिक प्यारे और अधिक शांत हो... "

शेक्सपियर की सोंनेट 18 (Sonnet 18) से लाईने.[११८]

1609, में प्रकाशित सोंनेट्स (Sonnets) प्रकाशित होने वाले शेक्सपियर के गैर-नाटकीय काम थेविद्वानों द्वारा निश्चित नही हैं की प्रत्येक 154 सोंनेट्स कब लिखे गए थे, लेकिन सबूत कहते है कि शेक्सपियर ने एक निजी पाठक के लिए अपने कैरियर के दौरान सोंनेट्स लिखा है.[११९]पहले भी दो अनधिकृत सोंनेट्स दी पेशोनेट पिलग्रिम 1599 में छपे थे, फ्रांसिस मेरेस (Francis Meres) ने 1598 में शेक्सपियर को "अपने निजी दोस्तों के बीच में सोंनेट्स सुग्रेड करने के लिए" भेजा था.[१२०]कुछ विशलेषकों का मानना है कि प्रकाशित संग्रह शेक्सपियर के नियत प्रकार के अनुक्रम थे.[१२१]ऐसा लगता हैं की उसने दो विषम श्रृंखला रची: एक, काले रंग की एक विवाहित महिला की अनियंत्रित कामुकता के बारे में (दी "डार्क लेडी"), और एक, एक निष्पक्ष जवान आदमी के विरोधाभासी प्यार के बारे में (दी "फेयर यूथ").यह अस्पष्ट बना हुआ है की ये आंकड़े असली व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं या कहानीकार के "मैं" को शेक्सपियर खुद का प्रतिनिधित्व करते है, हालांकि वोर्द्स्वोर्थ का विश्वास है कि सोंनेट्स के साथ "शेक्सपियर ने अपना दिल खोल दिया है.[१२२]1609 के संस्करण एक "श्रीमान डबल्यू. एच." को समर्पित किए गए थे, इस कविता के "केवल एक पिता" के रूप में.यह ज्ञात नही है की शेक्सपियर ने खुद या प्रकाशक द्वारा ये लिखा गया था, थॉमस थोर्प (Thomas Thorpe), जिनकी इनीशियल्स समर्पण पृष्ठ के नीचे की ओर दिखाई देते हैं; और न ही कोई यह जानता है की मिस्टर डबल्यू. एच. कौन था, कई सिद्धांतों के बावजूद, और ये कि शेक्सपियर ने प्रकाशन अधिकृत किया था.[१२३]आलोचकों Sonnetsकी प्रशंसा, गहरा ध्यान के रूप में प्यार की प्रकृति पर, यौन जुनून, उत्पत्ति, मृत्यु, और समय के रूप में की है.[१२४]

[संपादित करें] शैली शेक्सपियर के पहले नाटक दिन के परंपरागत शैली में लिखे गए थे.उसने एक बनी ठनी भाषा में उन्हें लिखा कि हमेशा वसंत स्वाभाविक रूप से वर्ण या नाटक की जरूरतों से नही निकलता है.[१२५]यह कविता विस्तार पर निर्भर करती है, कभी कभी, और भाषा प्राय: आलंकारिक और रूपको को विस्तृत करती है, और भाषा ज्यादातर आलंकारिक है- जो अभिनेताओं को बोलने के मुकाबले व्याख्या करवाती है.टाइटस एंड्रोनिकस (Titus Andronicus) के कुछ भव्य भाषणों में, कुछ आलोचकों की दृष्टि में, अक्सर, उदाहरण के लिए, पद्य में की गई कार्रवाई को रोका गया है टू जेंटलमेन ऑफ़ वेरोना (Two Gentlemen of Verona) में अस्वभाविक रूप से वर्णित किया गया है.[१२६]

जल्दी ही, लेकिन, शेक्सपियर ने अपने खुद के प्रयोजनों के लिए पारंपरिक शैली अनुकूलित करना शुरू किया.रिचर्ड III (Richard III) के प्रारंभिक आत्मभाषण (soliloquy) की अपनी जड़ें मध्ययुगीन नाटक में वाइस (Vice) की स्व-घोषणा में है. इसी समय, रिचर्ड का विशद स्वयंभू जागरूकता आगे शेक्सपियर के परिपक्व नाटकों की आत्मभाश्ना करने के लिए लगता है.[१२७] कोई एकल नाटक पारंपरिक से एक आजाद शैली के लिए परिवर्तन के निशान नही बनाता.शेक्सपियर ने अपने कैरियर में दो संयुक्त किए हैं रोमियो और जूलियट (Romeo and Juliet) शायद मिश्रित शैलियों का सबसे अच्छा उदाहरण है.[१२८] रोमियो और जूलियट, रिचर्ड II (Richard II), और ए मिडसमर नाईट'स ड्रीम (A Midsummer Night's Dream) के समय तक 1590 के मध्य में, शेक्सपियर ने प्राकृतिक कविता लिखना शुरू कर दी थी.वह लगातार अपने रूपकों और छवियों को अपने नाटकों की जरूरतों के हिसाब से रूप देता गया.

विलियम ब्लेक (William Blake), 1795, टेट ब्रिटेन (Tate Britain) के द्वारा

चित्र:Pity.jpg पिटी, माकबेथ में दो सिमिलेस का चित्रण है: "और अफ़सोस की बात है, एक नग्न नवजात शिशु के जैसे, / विस्फोट को फलांगना, या स्वर्ग के करूबों, होर्स'डी / हवा के अंधे दूतों पर".शेक्सपियर के मानक काव्य शैली थी ब्लांक वेर्से (blank verse), इंबिक पेंतामीटर (iambic pentameter) में संकलित.अभ्यास में, यह माना जाता है कि उनकी कविता आमतौर पर लयहीन थी और दस शब्दांशों को एक पंक्ति में शामिल किया गया था, हर दूसरा शब्दांश एक तनाव के साथ बोला जाता था.उसके शरुआती नाटकों के ब्लांक वेर्से उसके बाद वाले नाटकों से काफ़ी अलग हैं.यह अक्सर सुंदर है, लेकिन इसके वाक्य शुरू होते हैं, रोकते हैं, और लाइनों के अंत (end of lines) पर ही खत्म कर देते हैं, एकरसता के जोखिम के साथ.[१२९]एक बार जब शेक्सपियर ने पारंपरिक ब्लांक वेर्से में महारत हासिल कर ली, तो वह उसके प्रवाह को बीच में रोकने और भिन्न करने लगे.यह तकनीक, नई शक्ति और कविता का लचीलापन जूलियस कैसर (Julius Caesar) और हेमलेट (Hamlet) जैसे नाटकों में दिखती है.उदाहरण के लिए, इसे शेक्सपियर, हेमलेट के मन में इस तूफान को संप्रेषित करने के लिए उपयोग करता है:[१३०]

महोदय, मेरे दिल में लड़ाई का स्वभाव था जो मुझे सोने भी नहीं देती थीमुझे लगता है मुझे लेटे रहना चाहिए बिल्बोएस में मुतिनेस से भी बदतर.बेतहाशा - और इसके लिए आतुरता की प्रशंसा हो-हमें बताएँ हमारा अविवेक कभी-कभी हमारा अच्छा साथ देता है.... हेमलेट के बाद, शेक्सपियर ने अपनी काव्यात्मक शैली को विविधता दी, विशेष रूप से बाद की त्रासदियों के अधिक भावुक भागों में.साहित्यिक आलोचक ए सी. ब्राडली (A. C. Bradley) ने इस शैली का वर्णन "अधिक केंद्रित, विविध, विस्तृत, और, निर्माण में, कम नियमित, घुमावदार या वक्राकार के रूप में की.[१३१]अपने कैरियर के अंतिम चरण में, शेक्सपियर ने इन प्रभावों को प्राप्त करने के लिए कई तकनीकों को अपनाया.इनमे शामिल हैं लाइन की तर्ज पर (run-on lines), अनियमित रुकाव और ठहराव है, और वाक्य संरचना और लंबाई में चरम भिन्न रूप.[१३२]माकबेथ (Macbeth)में उदाहरण के लिए, एक असंबंधित रूपक या किसी अन्य के लिए उपमा से भाषा डार्ट्स: "को आशा है कि पी रखी थी / जिसमें तुम खुद तैयार हो?"(1.7.35-38); "... अफ़सोस की बात है, एक नग्न नवजात लड़की की तरह / विस्फोट, या स्वर्ग के करूबों, होर्स'डी / हवा के अंधे दूतों पर ..."(1.7.21-25).सुनने वाले को भाव को पूरा करने की चुनौती दी है. [१३२]बाद के रोमांस में, अपने समय के बदलाव और कथावस्तु में आश्चर्यजनक मुड़ाव के साथ, आखिरी काव्य शैली को प्रेरित किया जिसमे लंबे और छोटे वाक्य एक दूसरे के विपरीत स्थापित किए गए हैं, उपवाक्य जमा किए गए विषय और वस्तु उल्टे गए हैं, और शब्द मिटा दिए गए हैं, स्वाभाविक प्रभाव देते हुए.[१३३]

शेक्सपियर की काव्यात्मक प्रतिभा थिएटर की एक व्यावहारिक भावना के साथ सम्बंधित थी.[१३४]समय के सभी नाटककारों की तरह, शेक्सपियर ने अपनी कहानियों का नाट्यांतर पेट्रार्च (Petrarch) और होलिंशेड (Holinshed) जैसे स्रोतों से लिया.[१३५]उसने हर टुकड़े को नया रूप दिया दिलचस्पी के कई केंद्रों बनाने के लिए और जितना संभव हो सका दर्शकों को एक कथा में कई पक्षों को दिखायाडिजाइन की ताकत यह सुनिश्चित करती है कि शेक्सपियर के नाटक, अनुवाद, कटाव और विस्तृत व्याख्या से अपने मूल नाटक की हानि के बिना जीवित रह सकते हैं.[१३६]जैसे जैसे शेक्सपियर की महारत बढती गई, उसने अपने पात्रों को स्पष्ट और अधिक विविध प्रोत्साहन और भाषण का विशिष्ट पैटर्न दिया था.उसने बाद में नाटकों में तथापि अपनी पहले की शैली के पहलुओं को संरक्षित रखा.अपने बाद के रोमांस (late romances) में, वो जानबूझकर अधिक कृत्रिम शैली की ओर लौट गया, जिसने थिएटर के भ्रम पर जोर दिया.[१३७]

[संपादित करें] प्रभाव माकबेथ को विसिओन ऑफ़ दी आर्म्ड हेड के परामर्श पर


.हेनरी फुसेली (Henry Fuseli), 1793-94 bके द्वारा. फोल्गेर शेक्सपियर पुस्तकालय (Folger Shakespeare Library)वाशिंगटन.शेक्सपियर के काम ने बाद के थियेटर और साहित्य एक स्थायी छाप बना दी हैविशेष रूप से, उसने लक्षण वर्णन (characterisation), कथानक (plot), भाषा, और शैली (genre) की नाटकीय क्षमता का विस्तार किया.[१३८]उदाहरण के लिए रोमियो और जूलियट (Romeo and Juliet) तक, रोमांस को त्रासदी के योग्य विषय के रूप में देखा देखा नहीं गया था.[१३९]आत्मभाषण मुख्य रूप से वर्ण या घटनाओं के बारे में जानकारी संप्रेषित करने के लिए इस्तेमाल किए गए थे, लेकिन शेक्सपियर उन्हें पात्रों के दिमाग को तलाशने के लिए इस्तेमाल करता था.[१४०] उसके काम ने बाद की कविताओं को काफी ज्यादा प्रभावित किया.रोमांटिक कवियों (Romantic poets) ने शेक्सपियर पद्य नाटक को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया था, भले ही छोटी सफलता के साथ.आलोचक जॉर्ज स्टेनर्स (George Steiner) ने कोलेरिद्गे से तेंन्य्सों (Tennyson) तक सभी अंग्रेजी पद्य नाटकों का वर्णन किया है "शेक्सपियर के विषयों पर मंद रूपांतरों के रूप में."[१४१]

शेक्सपियर नेथॉमस हार्डी (Thomas Hardy),[१४२]विलियम फौल्क्नेर,[१४३] और चार्ल्स डिकेंस (Charles Dickens) जैसे उपन्यासकारों को प्रभावित किया.डिकेंस ने अक्सर शेक्सपियर को उद्धृत किया, अपने 25 खिताब को शेक्सपियर के कार्यों से लेते हुए.[१४४]अमेरिकी उपन्यासकार हर्मन मेलविल्ले के (Herman Melville's) आत्मभाषणों का शेक्सपियर से बहुत कुछ लेना देना है, उसके कप्तान अहाब मोबी-डिक (Moby-Dick) में एक क्लासिक त्रासद नायक (tragic hero) है, किंग लेअर से प्रेरित है.[१४५] विद्वानों ने संगीत के 20000 टुकडों के शेक्सपियर के कार्यों से जुड़े होने की पहचान की है.इन में शामिल हैं ग्यूसेप वेर्दी (Giuseppe Verdi) द्वारा दो ओपेरा (opera), ओतेल्लो (Otello) और फल्स्ताफ्फ़ (Falstaff), जिनकी महत्वपूर्ण स्रोत के साथ तुलना निभाता है.[१४६]शेक्सपियर ने, प्रे- राफेलितेस ( Pre-Raphaelites) और दी रोमान्टिक्स सहित कई चित्रकारों को प्रेरित किया है.[१४७]स्विस रोमांटिक कलाकार हेनरी फुसेली (Henry Fuseli)ने, विलियम ब्लेक (William Blake) के एक दोस्त, माकबेथ का जर्मन में अनुवाद किया है.[१४८]मनोविश्लेषक (psychoanalyst)सिग्मुंड फ्रयूद ने आकर्षित किया शेक्सपियर के मनोविज्ञान पर, विशेष रूप से हेमलेट की, मानव प्रकृति के अपने सिद्धांतों के लिए कि.[१४९]

शेक्सपियर के दिन में, अंग्रेजी व्याकरण और वर्तनी कम है, और मानकीकृत थे भाषा के अपने उपयोग आधुनिक अंग्रेजी आकार में मदद मिली.[१५०]सैमुएल जॉनसन (Samuel Johnson) किसी अन्य लेखक से अधिक बार उसे उद्धृत किया अपने एक शब्दकोश अंग्रेजी भाषा के (A Dictionary of the English Language) में, अपने प्रकार के पहले गंभीर काम में.[१५१]भाव जैसे की "विद बेटिद ब्रेथ" (मर्चंट ऑफ़ वेनिस ) और " ए फोर्गोन कोन्क्लुज़ोन" (ओठेल्लो ) ने रोज़मर्रा के अंग्रेजी भाषण में अपना स्थान बना लिया.[१५२]

[संपादित करें] नाजुक प्रतिष्ठा "वो सिर्फ़ एक उम्र का नही था, बल्कि हर समय का था."

बेन जोंसन (Ben Jonson)[१५३]

शेक्सपियर अपने जीवनकाल में कभी प्रतिष्ठित नहीं था, लेकिन उसने अपने हिस्से की प्रशंसा प्राप्त कर ली.[१५४]1598 में, मौलवी और लेखक फ्रांसिस मेरेस (Francis Meres) अंग्रेजी लेखकों के एक समूह से उसे "एक सबसे ज्यादा उत्कृष्ट", हास्य और त्रासदी दोनों में, के रूप में बाहर निकाला.[१५५]और सेंट जॉन्स कॉलेज, कैम्ब्रिज (St John's College, Cambridge) में पर्नास्सुस नाटकों के लेखक ने उसे, चौसर (Chaucer), गोवेर (Gower) और स्पेंसर (Spenser) समकक्ष आँका .[१५६]फर्स्ट फोलियो (First Folio) में, बेन जोंसन (Ben Jonson) ने शेक्सपियर को "उम्र की आत्मा, वाहवाही, प्रसन्नता, हमारे मंच का आश्चर्य" कहा है, हालांकि उसने कहीं और टिप्पणी की थी कि "शेक्सपियर कला चाहते थे".[१५७]


"ओफेलिया" ( Ophelia) (विस्तार). जॉन एवेरेट मिल्लैस (John Everett Millais), 1851-५२ के द्वारा. टेट ब्रिटेन (Tate Britain).1660 में राजशाही की बहाली (the Restoration) और सत्रहवाँ सदी के अंत के बीच में, शास्त्रीय विचार प्रचलन में थे.परिणामस्वरूप, उस समय के ज्यादातर आलोचकों ने शेक्सपियर को जॉन फ़्लेचर (John Fletcher) और बेन जोंसन (Ben Jonson) के नीचे का दर्जा दिया.[१५८]उदाहरण के लिए थॉमस रेमर (Thomas Rymer) ने, त्रासद के साथ हास्य मिलाने के लिए शेक्सपियर की निंदा की.फिर भी, कवि और आलोचक जॉन ड्रायडेन (John Dryden) ने शेक्सपियर को उच्च दर्जा दिया, जोंसन के कथनानुसार, "मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ, लेकिन मैं शेक्सपियर से प्यार करता हूँ".[१५९]कई दशकों के लिए, रेमर की दृष्टि का बोलबाला रहा, लेकिन अठारहवें शताब्दी के दौरान, आलोचकों ने शेक्सपियर पर अपनी शर्तों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करनी शुरू की और वे उसे प्राकृतिक प्रतिभा का मालिक कहा.उसके विद्वानी संस्करणों की एक श्रृंखला, खासकर सैमुएल जॉनसन (Samuel Johnson) की 1765 में एडमोंड मेलोन (Edmond Malone) की 1790 में, ने उनकी बढ़ती प्रतिष्ठा में योगदान दिया.[१६०]1800 तक, वह मजबूती से राष्ट्रीय कवि के रूप में निहित हो गया था.[१६१]अठारहवें और उन्नीसवीं सदी में, उनकी प्रतिष्ठा विदेशों में भी फैल गई.जो लोग उससे आगे निकल गए उन लेखकों में थेवोल्तैरे (Voltaire), गेटे, स्टेंडहल (Stendhal) और विक्टर ह्यूगो.[१६२]

रूमानी युग (Romantic era) के दौरान, शेक्सपियर की कवि और साहित्यिक दार्शनिक शमूएल टेलर कोलेरिद्गे द्वारा की सराहना की गई थी ; और आलोचक अगस्त विल्हेम स्च्लेगेल (August Wilhelm Schlegel) ने अपने नाटकों का अनुवाद जर्मन स्वच्छंदतावाद (German Romanticism) की भावना में किया.[१६३]उन्नीसवीं सदी में, शेक्सपियर की प्रतिभा के लिए महत्वपूर्ण प्रशंसा ने अक्सर चाटुकारिता का घेराव किया.[१६४]"देट किंग शेक्पीयर," 1840 में निबंधकार थॉमस कार्ल्य्ले (Thomas Carlyle) ने लिखा, "क्या वो चमकता नही है, ताज संप्रभुता में, एक श्रेष्ठ, सौम्य, फ़िर भी प्रबल चिह्न के रूप में; अविनाशी".[१६५] विक्टोरिंस ( Victorians) ने एक भव्य पैमाने पर भव्य दिखावे के रूप में अपने नाटकों का उत्पादन किया.[१६६]नाटककार और आलोचक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने शेक्सपियर की पूजा के मत का बर्डोलाट्री (bardolatry) के रूप में मज़ाक उडाया". उन्होंने दावा किया कि इब्सेन के नए प्रकृतिवाद (naturalism) के नाटकों ने शेक्सपियर को अप्रचलित किया था.[१६७]

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के दौरान कला में आधुनिकतावादी क्रांति, शेक्सपियर की निकालने से दूर, एवंट गर्डे (avant garde) में उसके कार्य को उत्सुकता से श्रेणित किया.दी अभिव्यंजनावादी (Expressionists) ने जर्मनी में और दी फुतुरिस्ट्स (Futurists) ने मास्को में उसके नाटकों का निर्माण किया.मार्क्सवादी नाटककार और निर्देशक बेर्टोल्ट ब्रेच्ट (Bertolt Brecht) ने एक महाकाव्य रंगमंच (epic theatre) शेक्सपियर से प्रभावित होकर तैयार किया.कवि और आलोचक टी. एस एलियट (T. S. Eliot) ने शॉ के खिलाफ बहस की कि वास्तव में शेक्सपियर के "प्राचीनतावाद" उसे सही मायने में आधुनिक बनाया.[१६८] एलियट, जी के साथ विल्सन नाइट (G. Wilson Knight) और दी स्कूल ऑफ़ न्यू क्रितिसिस्म (New Criticism), ने शेक्सपियर की कल्पना को पढ़ने की एक करीबी दिशा में एक आंदोलन का नेतृत्व किया.1950 के दशक में नए महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों की एक लहर ने आधुनिकता की जगह ली और "आधुनिकता के बाद" ("post-modern")शेक्सपियर के अध्ययन के लिए रास्ता बनाया.[१६९]अस्सी के दशक से, शेक्सपियर का अध्ययन इस तरह के आंदोलनों जैसे संरचनावाद (structuralism), नारीवाद, अफ्रीकी अमरीकी अध्ययन (African American studies), और समलैंगिक अध्ययन (queer studies) के लिए खुल चुका था.[१७०]

[संपादित करें] शेक्सपियर के बारे में अटकलें [संपादित करें] ग्रन्थकारिता शेक्सपियर की मृत्यु के लगभग 150 वर्षों के बाद, शेक्सपियर के कार्यों की ग्रन्थकारिता के बारे में संदेह उभरने शुरू हुए.[१७१]वैकल्पिक उम्मीदवारों में फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon), क्रिस्टोफर मारलोवे (Christopher Marlowe), और एडवर्ड डी वेरे (Edward de Vere), दी अर्ल ऑफ़ ऑक्सफोर्ड का प्रस्ताव शामिल है.[१७२]यद्यपि सभी वैकल्पिक उम्मीदवारों लगभग सार्वभौमिक अकादमिक हलकों में खारिज हो चुके हैं, इस विषय में लोकप्रिय रुचि, विशेष रूप से ऑक्सफ़ोर्डियन सिद्धांत (Oxfordian theory), 21 वीं सदी में जारी रखा गया है.[१७३]

[संपादित करें] धर्म कुछ विद्वानों का दावा है कि शेक्सपियर के परिवार के सदस्य कैथोलिक (Catholics) थे, एक समय में जब कैथोलिक अभ्यास कानून के खिलाफ था.[१७४]शेक्सपियर की माँ, मरियम आर्डेन (Mary Arden), निश्चित रूप से एक धार्मिक कैथोलिक परिवार से आयी थी.सबसे सशक्त साक्ष्य एक विश्वास का कैथोलिक बयान जॉन शेक्सपियर (John Shakespeare) द्वारा हस्ताक्षर किया हो सकता है, 1757 में हेनले स्ट्रीट में अपने पूर्व घर की छत में पाया जाता है. दस्तावेज़ अब खो दिया है, तथापि, और विद्वानों अपनी प्रामाणिकता पर भिन्न होते हैं.[१७५]1591 में, अधिकारियों ने सूचना दी कि जॉन "कर्ज के लिए प्रक्रिया के डर से" चर्च छोड़ दिया है, एक आम कैथोलिक बहाना.[१७६]1606 में, विलियम की बेटी सुसन्ना को उन में सूचीबद्ध किया गया जो लोग स्ट्रैटफ़ोर्ड में ईस्टर भोज (communion) में शामिल होने में विफल रहे थे.[१७६]विद्वानों ने शेक्सपियर के नाटकों में उनके रोमन कैथोलिक ईसाई के पक्ष और विपक्ष दोनों के सबूत ढूंढ लिए थे, पर सच किसी भी तरह से साबित करना नामुमकिन है.[१७७]

[संपादित करें] लिंग आधार शेक्सपियर के लिंग का कुछ विवरण में जाना जाता है.18 वर्ष की उम्र में उसने, 26 साल की ऐनी हथावय, जो गर्भवती थी, से शादी कर ली.अपने तीन बच्चों में पहली सुसंना का, छह महीने बाद 26 मई1583 में जन्म हुआ था.हालाँकि, सदियों से पाठकों ने शेक्सपियर की सोंनेट्स को एक जवान आदमी के लिए उसके प्यार का सबूत के रूप में इंगित किया है.कुछ लोग उसी कथा को यौन प्रेम के बजाय दोस्ती (friendship) की भावना के रूप में पढ़ते हैं.[१७८]उसी समय पर, छब्बीस तथाकथित "डार्क लेडी" ("Dark Lady") सोंनेट्स को, जो एक शादीशुदा औरत को संबोधित हैं, विषमलैंगिक संबंधों के साक्ष्य के रूप में लिया जाता है.[१७९]

[संपादित करें] कार्यों की सूची [संपादित करें] नाटकों का वर्गीकरण चित्र:Gilbert Shakespeares Plays.jpg विलियम शेक्सपियर के नाटक. सर जॉन गिल्बर्ट (Sir John Gilbert), 1849 के द्वारा.शेक्सपियर के 1623 के फर्स्ट फोलियो (First Folio) में 36 मुद्रित नाटक भी शामिल हैं, उनके फोलियो वर्गीकरण के अनुसार नीचे सूचीबद्ध के अनुसार हैं हास्य (comedies), इतिहास (histories) और त्रासदियां (tragedies).[१८०]शेक्सपियर ने नाटकों के हर शब्द को अपने लिए नही लिखे थे, और कई सारे तो सहयोग के चिह्न दिखाते है जो उस समय की आम बात थी.[१८१]फर्स्ट फोलियो में दो नाटक शामिल नही हैंद टू नोबल किंसमेन (The Two Noble Kinsmen) और पेरिक्लेस, प्रिन्स ऑफ़ टायर (Pericles, Prince of Tyre), अब कैनन के भाग के रूप मे स्वीकार किए जाते, विद्वानों के साथ सहमति व्यक्त की है कि शेक्सपियर ने उनकी रचना के लिए एक प्रमुख योगदान दिया हैं.[१८२]फर्स्ट फोलियो में कोई कविता शामिल नहीं थी.

उन्नीसवी सदी के अंत में,एडवर्ड डोडेन (Edward Dowden)ने चार लेट हास्य कोरोमांस (romances), के रूप में वर्गीकृत किया और कई विद्वानों द्वारा उन्हें ट्रेजिककॉमेडिज़ (tragicomedies), उनके द्वारा अक्सर उपयोग किया जाने वाला, के नाम से पुकारा जाने लगा[१८३]यह नाटक और संबद्ध टू नोबल किंसमेन एक अस्तेरिस्क (*) से नीचे चिह्नित हैं.1896 में, फ्रेडरिक एस बोअस (Frederick S. Boas) ने शब्द "प्रॉब्लम प्लेस (problem plays)" चार नाटकों को वर्णित करने के लिए किया है: अल'स वेल देट एंड्स वेल (All's Well That Ends Well), मेजर फॉर मेजर (Measure for Measure), त्रोइलुस एंड क्रेस्सिदा (Troilus and Cressida) और हैमलेट (Hamlet).[१८४]उन्होंने लिखा कि "किसी एक विषय और ध्येय / मिजाज से प्रेरित नाटकों को पूर्ण रूप से हास्य या दुखांत रचनायें नहीं कहा जा सकता.""हम इसलिए से एक सुविधाजनक वाक्यांश उधार ले सकते हैं थिएटर आज क्लास और उन्हें एक साथ शेक्सपियर की समस्या के रूप में की निभाता है."[१८५]शब्द, बहुत भाषनीय और कभी कभी अन्य नाटकों के लिए भी लागू, उपयोग में बना हुआ है, यद्यपि हेमलेट बिल्कुल एक त्रासदी के रूप में वर्गीकृत है.[१८६]दूसरी समस्या नाटकों (‡) एक डबल चाकू के साथ नीचे चिह्नित हैं.

नाटक जो केवल आंशिक रूप से शेक्सपियर के द्वारा लिखे गए हैं एक चाकू (†) के साथ नीचे चिह्नित हैं.अन्य कार्य कभी कभी उसे भावित हैं खो गए नाटक या एपोक्रायफ़ा के नाम से सूचिबद्ध है.


[संपादित करें] कार्य हास्य आल्स वेल देड एंड्स वेल (All's Well That Ends Well)‡ एज यू लाइक ईट (As You Like It) दी कॉमेडी ऑफ़ एरर्स (The Comedy of Errors) लव्स लेबर्स लोस्ट (Love's Labour's Lost) मेज़र फॉर मेज़र (Measure for Measure)‡ द मर्चेंट ऑफ़ वेनिस (The Merchant of Venice) दी मेर्री वइवेस ऑफ़ विंडसर (The Merry Wives of Windsor) ए मिडसमर नाईट'स ड्रीम (A Midsummer Night's Dream) मच एडो अबाउट नोथिंग (Much Ado About Nothing) पेरिक्लेस, प्रिन्स ऑफ़ टायर (Pericles, Prince of Tyre)* † द टेमिंग ऑफ़ द श्रीऊ (The Taming of the Shrew) दी टेम्पेस्ट (The Tempest)* ट्वेल्थ नाईट, और व्हाट यू विल (Twelfth Night, or What You Will) दी टू जेंटलमैन ऑफ़ वेरोना (The Two Gentlemen of Verona) दी टू नोबल किंसमेन (The Two Noble Kinsmen)* † दी विंटर्स टेल (The Winter's Tale)*


इतिहास


किंग जॉन (King John) रिचर्ड II (Richard II) हेनरी IV, भाग 1 (Henry IV, part 1) हेनरी IV, भाग 2 (Henry IV, part 2) हेनरी V (Henry V) हेनरी VI, भाग 1 (Henry VI, part 1)† हेनरी VI, भाग 2 (Henry VI, part 2) हेनरी VI, भाग 3 (Henry VI, part 3) रिचर्ड III (Richard III) हेनरी VIII (Henry VIII)†


त्रासदियों


रोमियो और जूलियट (Romeo and Juliet) कोरिओलानुस (Coriolanus) टाइटस एंड्रोनिकस (Titus Andronicus)† टिमोन ऑफ़ एथेंस (Timon of Athens)† जूलियस सीसर (Julius Caesar) मैकबेथ (Macbeth)† हैमलेट (Hamlet) त्रोइलुस और क्रेसिडा (Troilus and Cressida)‡ किंग लीअर (King Lear) ओथेल्लो (Othello) एंटनी और क्लेओपात्रा (Antony and Cleopatra) क्यम्बेलिने (Cymbeline)*




कविता शेक्सपियर के सोंनेट्स (Shakespeare's Sonnets) वीनस और एडोनिस (Venus and Adonis) दी रैप ऑफ़ लुक्रेस (The Rape of Lucrece) दी पेशॉनेट पिलग्रिम (The Passionate Pilgrim) दी फिनिक्स एंड दी टर्टल (The Phoenix and the Turtle) ऐ लवर्स कंप्लेंट (A Lover's Complaint)


खोए हुए नाटक लव्स लेबर्स वन (Love's Labour's Won) कार्डेनिओ (Cardenio)†


अपोक्रिफा


आर्डेन ऑफ़ फेवार्शैम (Arden of Faversham) दी बर्थ ऑफ़ मर्लिन (The Birth of Merlin) लोक्रिने (Locrine) दी लन्दन प्रोडिगल (The London Prodigal) दी पुरितन (The Puritan) दी सेकंड मैडेन'स ट्रेजेडी (The Second Maiden's Tragedy) सर जॉन ओल्डकास्टेल (Sir John Oldcastle) थॉमस लोर्ड क्रॉमवेल (Thomas Lord Cromwell) ए यार्कशिरे ट्रेजेडी (A Yorkshire Tragedy) एडवर्ड III (Edward III) सर थॉमस मोरे (Sir Thomas More)


[संपादित करें] साहित्यिक प्रशंसा शेक्सपियर के काम ने अंग्रेज़ी भाषा भाषी दुनिया में साहित्य पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला है.शेक्सपियर के दिन के बाद से महत्वपूर्ण साहित्यिक आंकड़ों से स्तुति के निम्नलिखित शब्दों जिसमें उन्होंने आयोजित किया गया है कि उच्च संबंध के कुछ छोटे संकेत दे:

इनमें से कई तो समझ रहे थे उसे और बेन जोंसन के बीच, जो कि एक स्पैनिश महान गल्लों और युद्ध का एक अंग्रेज़ी मनुष्य है, की तरह यादों में बसे हैं.मास्टर जोंसन, पूर्व की तरह, दूर सीखने में उच्च बनाया गया था; ठोस लेकिन उनके प्रदर्शन में धीमी गति थी.शेक्सपियर, दी इंग्लिश मेन ऑफ़ वार, अपने कार्य को बहुत हल्के से लेते थे, वे अपनी अपने नवीन विचारों और बुद्धि के द्वारा सभी तकलीफ़ो को बहुत ही बखुबी से अंजाम देते थे! थॉमस फुलर (Thomas Fuller) (1608-1661), हिस्ट्री ऑफ़ दी वोर्थिएस वह जो सभी आधुनिक का है, और शायद प्राचीन कवि है, और सबसे व्यापक और सबसे बड़ी आत्मा थी. जॉन ड्रायडेन (John Dryden) (1631-1700) नाटकीय कविता पर निबंध अमूल्य शेक्सपियर प्रकृति का मुफ्त उपहार था; पूरी तरह से चुपचाप दिया गया - कुल मिलाकर चुपचाप प्राप्त है, जैसे कि यह छोटी खाते में एक चीज़.और फिर भी, बहुत वस्तुतः, यह एक अमूल्य चीज है. थॉमस कार्ल्य्ले (Thomas Carlyle) (1795-1881) हीरोज, हीरो वरशिप एंड दी हेरोइक इन हिस्ट्री हमारे असंख्य-दिमागी शेक्सपियर. शमूएल टेलर कोलेरिद्गे (1772-1834), जीवनी.चाप. xv और न ही तर्कसंगत सदियां मिटा सकती है शेक्सपियर की बुद्धि की राशि और कक्षा. राल्फ वाल्डो एमरसन (Ralph Waldo Emerson) (1803-1882), मई-दिवस और अन्य भाग वहाँ शेक्सपियर, जिसके माथे पर सजा हुआ है द क्राउन ऑफ़ द वर्ल्ड; ओह, हर समय के लिए विस्मयकारी आखें आँसूओं और हंसी के साथ! एलिजाबेथ बर्रेट्ट ब्राउनिंग (Elizabeth Barrett Browning) (1806-1861), कवियों को दृष्टिकोण इसी कुंजी के साथ शेक्सपियर एक बार और अपने दिल को खोला! क्या शेक्सपियर?यदि ऐसा है, तो वह शेक्सपियर से कम होगा! रॉबर्ट ब्राउनिंग (Robert Browning) (1812-1899), मकान (और शेक्सपियर के द्वारा, और अधिक प्रसिद्ध शब्दों के लिए देखे विकिकोट (Wikiquote)[१])

[संपादित करें] नोट्स ए. तिथियाँ उपयोग की गई है जो जूलियन कैलेंडर, इंग्लैंड में शेक्सपियर के जीवन भर इस्तेमाल हुई थी.सन १५८२ ईसवी में कैथोलिक देशों अपनाए गए ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार शेक्सपियर की मृत्यु ३ मई (May 3)[१८७]को हुई थी. बी० . सही आकड़े अज्ञात है.और अधिक जानकारी के लिए शेक्सपियर के कोलैबोरेशन (Shakespeare's collaborations)और शेक्सपियर अपोक्रिफा (Shakespeare Apocrypha) को देखें. सी०. हेरॉल्ड ब्रुक्स द्वारा लिखित एक निबंध इस बात की ओर इशारा करता है कि शेक्सपियर की रचना रिचर्ड तृतीय[१८८], मार्लो द्वारा लिखित एडवर्ड द्वितीय से प्रभावित है.अन्य विद्वान इस बात को इस बात से नकारते हैं की समकक्ष एक ही जगह पर हैं.[१८९] डी० कई विद्वानों का मानना है कि प्रईजलेस जॉर्ज विल्किंस (George Wilkins) के साथ मिलकर लिखा गया था.[१९०] ई० द टू नोबल किंसमेन जॉन फ्लेचर (John Fletcher) के साथ मिलकर लिखा गया था. [१९१] फ. हेनरी VI, भाग एक को प्रायः कई लेखकों का सामूही प्रयास मन जाता है, लेकिन कुछ विद्वानों, जैसे माइकल हट्टावे का मत है कि यह नाटक संपूर्ण रूप से शेक्सपियर द्वारा लिखित है.[१९२] जी0 हेनरी VIIIजॉन फ्लेचर (John Fletcher) के साथ मिलकर लिखा गया था.[१९३] एच० . ब्रायन विकर्स सुझाते हैं की टाइटूस एंड्रोनिकस जॉर्ज पीले (George Peele) के साथ मिलकर लिखा गया था, हांलाकि जोनाथन बाते जो अर्दें शेक्सपीयर (Arden Shakespeare) के सबसे नवीनतम सम्पादक हैं, का मानना है की वो पूरी तरह से शेक्सपीयर का कार्य था.[१९४] आई. ब्रायन विकर्स और दूसरों का विश्वास है कि टीमों एथेंस का थॉमस मिड्डेलेटॉन (Thomas Middleton) के साथ लिखा गया है, यद्यपि कुछ टिप्पणीकारों असहमत हैं.[१९५] जे माकबेथ का मूल पाठ जो बचा हुआ साधारण रूप से बाद के हाथों बदला गया है.सबसे उल्लेखनीय थॉमस मिड्डेलेटॉन के नाटकों दी वीत्च (The Witch) (1615) से दो गीत शामिल है .[१९६] के. दी पेशोनेट पिलग्रिम, जो शेक्सपीयर के नाम के अंतर्गत उनकी अनुमति के बिना प्रकाशित हुआ था 1599 में, उसके शुरूआती दो सोंनेट्स हैं उसमे, तीन लव्स लेबर्स लोस्ट से निकाले हैं, कई कविता और कवियों के नाम से जानी जाती हैं, और ग्यारह कविताएं प्रमाणित नही है.[१९७] एल कार्डेनिओ को जाहिरा तौर पर जॉन फ्लेचर के साथ लिखा गया था.[१९८] [संपादित करें] सन्दर्भ [संपादित करें] अग्रगामी पठन/ अध्ययन ग्रीनब्लाट्ट, स्टीफन (Greenblatt, Stephen) ( 2005 ).विल इन द वर्ड :शेक्सपियर, शेक्सपियर कैसे बने.लंदन : पिमलिको .ISBN 0-7126-0098-1. होनान, पार्क (1998). शेक्सपियर: एक जीवन.ऑक्सफोर्ड , न्यूयॉर्क : ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस .ISBN 0-19-811792-2. वेल्स , स्टैनले (Wells, Stanley), एट अल ( 2005 ).द ऑक्सफोर्ड शेक्सपियर: संपूर्ण कृतियाँ / द कम्प्लीट वर्क्स , दूसरा संस्करण ऑक्सफोर्ड : ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस .ISBN 0-19-926717-0. वेंडलर, हेलन (Vendler, Helen) (1997). शेक्सपियर के सोंनेट्स की कलात्मकता हार्वर्ड विश्वविद्यालय प्रेस ISBN 0-674-63712-7 1.↑ ग्रीन्ब्लात्त, स्टीफन (Greenblatt, Stephen) (2005). विल इन द वर्ड :शेक्सपियर, शेक्सपियर कैसे बने .लन्दन : पिमलिको,11. आईएसबीएन 0712600981. बेविन्गतोन डेविड ( Bevington, David) 2002 शेक्सपियर, 1–3.ऑक्सफोर्ड : ब्लैकवेल.आईएसबीएन 0631227199. वेल्स, स्टेनली (Wells, Stanley) (1997). शेक्सपियर: ऐ लाइफ इन ड्रामा.न्यूयॉर्क: डब्ल्यूडब्ल्यूनोर्टन, 399.आईएसबीएन 0393315622. 2.↑ 3.↑ , , 4.↑ बेर्तोलिनी, जॉन एंथोनी (1993). शॉ और अन्य नाटककार.पेनसिल्वेनिया : राज्य पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय प्रेस , 119 .आईएसबीएन 027100908X. 5.↑ स्कोएंबम (1987), विलियम शेक्सपियर : एक संक्षिप्त जीवनवृत्त , संशोधित संस्करण , ऑक्सफोर्ड : ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस , 14-22.आईएसबीएन 0195051610. 6.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 24-6. 7.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 24, 296. • होनान, 15-16. 8.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 23-24. 9.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 62-63. आकरौयद , पीटर (Ackroyd, Peter)(2006) . शेक्सपियर : जीवनवृत्त लंदन : विंटेज , 53आईएसबीएन 0749386558. वेल्स , स्टैनले (Wells, Stanley), ऐट अल ( 2005 ) . द ऑक्सफोर्ड शेक्सपियर: संपूर्ण कृतियाँ , द्वितीय संस्करण .ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस, एक्स० वी० - एक्स० वी० आई० आईएसबीएन 0199267170. 10.↑ 11.↑ बाल्डविन, 164-84. • क्रेस्स्य, डेविड (1975). ट्यूडर और स्टुअर्ट इंग्लैंड में शिक्षा.न्यूयॉर्क: सेंट मार्टिन प्रेस, 28, 29.ओसीएलसी (OCLC)2148260. 12.↑ बाल्डविन, 164-66. • क्रेस्स्य, 80-82. • ऑक्रोय्द, 545. • वेल्स, ऑक्सफोर्ड शेक्सपियर, Xvi. 13.↑ स्कोएंबम,कम्पैक्ट, 77–78. 14.↑ वुड माइकल (Wood, Michael) ( 2003 ) . शेक्सपियर.न्यूयॉर्क: मूल पुस्तकें, 84.आईएसबीएन 0465092640. स्कोएंबम,कम्पैक्ट, 78–79. 15.↑ स्कोएंबम,कम्पैक्ट, 93 16.↑ स्कोएंबम,कम्पैक्ट, 94 17.↑ स्कोएंबम,कम्पैक्ट, 224 18.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 95. 19.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 97-108. निकोलस रो ( Rowe, Nicholas)रो निकोलस (1709). मिस्टर / श्रीमान विलियम शेक्सपियर के जीवन और चरित्र से जुड़े कुछ विवरण टेरी ए द्वारा पुनर्त्पादित ग्रे ( 1997) में :श्रीमान विलियम शेक्सपियर और इंटरनेट. 30 जुलाई (30 July)2007 को पुनः प्राप्त. 20.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 144-45. 21.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 110-11. 22.↑ होंनिग्मन, ई०. ए.जे .(1999). शेक्सपियर : खोये हुए वर्ष/ गुमनामी के वर्ष / अन्धकार वर्ष . संशोधित संस्करणमैनचेस्टर : मैनचेस्टर विश्वविद्यालय प्रेस , 1 .आईएसबीएन 0719054257. • वेल्स, ऑक्सफोर्ड शेक्सपियर, Xvii. 23.↑ स्चोएंबौम, कॉम्पैक्ट, 95-117. वुड, 97–109. 24.↑ चेम्बर्स , ई० के०. 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