अग्नि पुराण/अध्यायः ३२०

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अग्नि_पुराण (१९७०) , translated by कल्याण(गीताप्रेस, गोरखपुर)वर्ष ४४

320 तीन सौ बीसवाँ अध्याय

सर्वतोभद्र आदि मण्डलों का वर्णन

भगवान शिव कहते हैं-स्कन्द | अब मैं सर्वतोभद्र नामक आठ प्रकार के मण्डलों का वर्णन करता हूँ । पहले शङ्कु या कील से प्राची दिशा का साधन करे। इस प्राची का निश्चय हो जाने पर विद्वान् पुरुष विषुवकाल में चित्रा और स्वाती नक्षत् रके अन्तर से, अथवा प्रत्यक्ष सूत को लेकर पूर्व से पश्चिम तक उसे फैलाकर मध्य में दो कोटियों को अङ्कित करे । उन दोनों के मध्यभाग से उत्तर-दक्षिण की लंबी रेखा खींचे । दो मत्स्यों का निर्माण करे तथा उन्हें दक्षिण से उत्तर की ओर आस्फालित करे । क्षतपद क्षेत्र के आधे मान से कोण सम्पात करे । इस तरह चार बार सूत्र के क्षेत्र में आस्फालन से एक चौकोर रेखा बनती है। उसमें चार हाथ का शुभ भद्रमण्डल बनाये । आठ पदों में सब ओर से विभक्त चौसठ पदवाले में से बीस पदवाले क्षेत्र में बाहर की ओर एक वीथी का निर्माण करे । यह वीथी एक मन्त्र की होगी । कमलके मान से दो पदों का द्वार बनाये । द्वार कपोलयुक्त होना चाहिये । कोणबन्ध के कारण उसकी विचित्र शोभा हो, ऐसा द्विपद का द्वार-निर्माण में उपयोग करे । कमल श्वेतवर्ण का हो, कर्णिका पीतवर्ण से रंगी जाय, केसर चित्रवर्ण का हो, अर्थात् उसके निर्माण में अनेक रंगोंका उपयोग किया जाय । वीथी को लाल रंग से भरा जाय । द्वार लोकपालस्वरूप होता है। नित्य तथा नैमितिक विधि में कोणों का रंग लाल होना चाहिये । अब कमल का वर्णन सुनो । कमलके दो भेद हैं- असंसक्त तथा संसक्त । असंसक्त मोक्ष की तथा संसक्त भोग की प्राप्ति कराने वाला है । असंसक्त कमल मुमुक्षुओं के लिये उपयुक्त है। संसक्त कमलके तीन भेद हैं - बाल, युवा तथा वृद्ध । वे अपने नाम के अनुसार फलसिद्धि प्रदान करने वाले हैं । १-९ ॥

कमलके क्षेत्र में दिशा तथा कोणदिशा की ओर सूत-चालन करे तथा कमल के समान पाँच वृत्त निर्माण करे । प्रथम वृत्त में नौ पुष्करों से युक्त कर्णिका होगी, दूसरे में चौबीस केसर रहेंगे, तीसरे में दलों की संधि होगी, जिसकी आकृति हाथी के कुम्भस्थलके सदृश होगी, चौथे वृत्त में दलों के अग्रभाग होंगे तथा पाँचवें वृत्त में आकाशमात्र शून्य रहेगा। इसे संसक्त कमल कहा गया है। असंसक्त कमले में दलाग्रभाग पर जो दिशाओं के भाग हैं, उनके विस्तार के अनुसार दो भाग छोड़कर आठ भागों से दल बनाये । संधि-विस्तारसूत्र से उसके मान के अनुसार दल की रचना करे । इसमें बायें से दक्षिण के क्रम से प्रवृत होना चाहिये। इस तरह यह वृद्ध संसक्त कमल बनता है। १०-१४ ॥ अथवा संधि के बीच से सूत को अर्धचन्द्राकार घुमाये या दो संधियों के अग्रवर्ती सूत को ( अर्धचन्द्राकार ) घुमाये । ऐसा करने से बालपद्म बनता है। संधिसूत्र के अग्रभाग से पृष्ठभागकी ओर सूत घुमाये। वह तीक्ष्ण अग्रभाग वाला युवा संज्ञक है। ऐसे कमल से भोग और मोक्ष की उपलब्धि होती है । सम (छह) मुख वाले स्कन्द, मुक्ति के उद्देश्य से किए जाने वाले आराधनात्मक कर्म में वृद्ध कमल का उपयोग करना चाहिये तथा वशीकरण आदि में बालपद्म का। नवनाभ कमलचक नौ हाथों का होता है। उसमें मन्त्रात्मक नौ भाग होते हैं। उसके मध्यभाग में कमल होता है। उस कमल के ही मान के अनुसार उसमें पट्टिका, वीथी और द्वार के साथ कण्ठ एवं उपकण्ठ के निर्माण की बात भी कही गयी है। उसके बाह्यभाग में वीथी की स्थिति मानी गयी है। पाँच भाग में तो वीथी होती है और अपने चारों ओर वह इस भाग का स्थान लिये रहती है । उसके आठ दिशाओं में आठ कमल होते हैं तथा वीथी सहित एक द्वारपद्म भी होता है। उसके बाह्यभाग में पाँच पदों की वीथी होती है, जो लता आदि से विभूषित हुआ करती है। द्वार के कण्ठ में कमल होता है। द्वार का ओष्ठ और कण्ठभाग एक-एक पद का होता है। कपोल-भाग एक पद का बनाना चाहिये । तीन दिशाओं में तीन द्वार स्पष्ट होते हैं । कोणबन्ध तीन पट्टियों, दो पद तथा वज्र-चिह्न से युक्त होता है। मध्यकमल शुक्लवर्ण का होता है तथा शेष दिशाओं के कमल पूर्वादिक्रम से पीत, रक्त; नील, पीत, शुक्ल; धूम्र, रक्त तथा पीतवर्ण के होते हैं। यह कमलचक्र मुक्तिदायक है। १५-२२ ॥

पूर्व आदि दिशाओं में आठ कमलों का तथा शिव-विष्णु आदि देवताओं का यजन करे । विष्णु आदि का पूजन प्रासाद के मध्यवर्ती कमल में करके पूर्वादि कमलों में इन्द्र आदि लोकपालों की पूजा करे। इनकी बाह्यवीथी की पूर्वादि दिशा में उन-उन इन्द्र आदि देवताओं के वज्र आदि आयुधों की पूजा करे । वहाँ विष्णु आदि की पूजा करके साधक अश्वमेध यज्ञ के फल का भागी होता है । पवित्रारोपण आदि में महान मण्डल की रचना करे । आठ हाथ लंबे क्षेत्र का छब्बीस से विवर्तन ( विभाजन } करे । मध्यवर्ती दो पदों में कमल-निर्माण करे । तदनन्तर एक पद की वीथी हो । तत्पश्चात् दिशाओं तथा विदिशाओं में आठ नीलकमलों का निर्माण करे । मध्यवर्ती कमल के ही मान से उसमें कुल तीस पद्म निर्मित किये जायें । वे सब दलसंधि से रहित हों तथा नीलवर्ण के इन्दीवर संज्ञक कमल हों । उसके पृष्ठभाग में एक पदक वीथी हो । उसके ऊपर स्वस्तिक चिह्न बने हों । तात्पर्य यह कि वीथी के ऊपरी भाग या बाह्यभाग में दो-दो पदों के विभक्त स्थानों में कुल आठ स्वस्तिक लिखे जावें । तदनन्तर पूर्ववत् बाह्यभाग में वीथिका रहे। द्वार, कमल तथा उपकण्ठ सब कुछ रहने चाहिएं। कोण का रंग लाल और वीथी का पीला होना चाहिये । मण्डल के बीच का कमल नीलवर्ण का होगा । कार्तिकेय ! विचित्र रंगों से युक्त स्वस्तिक आदि मण्डल सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाला I २३-२९.५

पञ्चाब्ज-मण्डल पाँच हाथ के क्षेत्र को सब ओर से दस से विभाजित करके बनाया जाता है। इसमें दो पदों का कमल, उसके बाह्यभाग में वीथी, फिर पट्टिका, फिर चार दिशाओं में चार कमल होते हैं। इन चारों के बाद पृष्ठभाग में वीथी हो, जो एक पद अथवा दो पदों के स्थान में बनायी गयी हो । कण्ठ और उपकण्ठ से युक्त द्वार हों और द्वार के मध्यभाग में कमल हो । इस पश्चाब्ज-मण्डल में पूर्ववर्ती कमल श्वेत और पीतवर्ण का होता है। दक्षिणदिग्वर्ती कमल वैदूर्यमणि के रंग का; पश्चिमवर्ती कमल कुन्दके समान श्वेतवर्ण का तथा उत्तरदिशा का कमल शङ्ख के सदृश उज्ज्वल होता है। शेष सब विचित्र वर्ण के होते हैं। ३०-३३ ॥

अब मैं दस हाथ के मण्डल का वर्णन करता हूँ, जो सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला है। उसको विकार-संख्या ( २४ ) द्वारा सब ओर विभक्त करके चौकोर क्षेत्र बना ले । इसमें दो-दो पदों का द्वार होगा । पूर्वोक्त चक्रों की भाँति इसके भी मध्यभाग में कमल होगा । अब मैं विघ्नध्वंस-चक्र' का वर्णन करता हूँ। चार हाथ का पुर ( चौकोर क्षेत्र ) बनाकर उसके मध्यभाग में दो हाथ के घेरे में वृत्त ( गोलाकार चक्र ) बनाये । एक हाथ की वीथी होगी, जो सब ओर से स्वस्तिक-चिह्नों द्वारा घिरी रहेगी । एक-एक हाथ में चारों ओर द्वार बनेंगे । चारों दिशाओं मे वृत्त होंगे, जिनमें कमल अङ्कित रहेंगे । इस प्रकार इस चक्र में पाँच कमल होंगे, जिनका वर्ण श्वेत होगा । मध्यवर्ती कमल में निष्कल (निराकार परमात्मा ) का पूजन करना चाहिये । पूर्वादि दिशाओं में हृदय आदि अङ्गों की तथा विदिशाओं में अस्त्रों की पूजा होनी चाहिये। पूर्ववत् ‘सद्योजात आदि पाँच ब्रह्ममय मुखों का भी पूजन आवश्यक है ॥ ३४-३७ ॥

अब मैं बुद्ध्याधार-चक्र का वर्णन करता हूँ । सौ पदों के क्षेत्र में से मध्यवर्ती पंद्रह पदों में एक कमल अङ्कित करे । फिर आठ दिशाओं में एक-एक करके आठ शिवलिङ्गों की रचना करे । मेखलाभाग सहित कण्ठ की रचना दो पदों में होगी । आचार्य अपनी बुद्धि का सहारा लेकर यथास्थान लता आदि की कल्पना करे। चार, छ:, पाँच और आठ आदि कमलों से युक्त मण्डल होता है। बीस-तीस आदि कमलों वाला भी मण्डल होता है। १२१२० कमलों से युक्त भी सम्पूर्ण मण्डल हुआ करता है। १२० कमलों के मण्डल का भी वर्णन दृष्टिगोचर होता है । श्रीहरि, शिव, देवी तथा सूर्यदेवके १४४० मण्डल हैं । १७ पदों द्वारा सत्रह पदों का विभाग करने पर २८९ पद होते हैं। उक्त पदों के मण्डल में लतालिङ्ग का उद्भव कैसे होता है, यह सुनो। प्रत्येक दिशा में पाँच, तीन, एक, तीन और पांच पदों को मिटा दे। ऊपर के दो पदों से लिङ्ग तथा पार्श्ववर्ती दो-दो कोष्ठकों से मन्दिर बनेगा । मध्यवर्ती दो पदों का कमल हो । फिर एक कमल और होगा । लिङ्ग के पार्श्व भागों में दो ‘भद्र बनेंगे । एक पद का द्वार होगा; उसका लोप नहीं किया जायगा । उस द्वार के पार्श्वभागों में छ:-छ: पदों का लोप करने से द्वारशोभा बनेगी । शेष पदों में श्रीहरि के लिये लहलहाती लताएँ होंगी । ऊपर के दो पदों का लोप करने से श्रीहरि के लिये भद्राष्टक बनेंगे । फिर चार पदों का लोप करने से रश्मिमालाओं से युक्त शोभास्थान बनेगा । पचीस पदों से कमल, फिर पीठ, अपीठ तथा दो-दो पदों को रखकर ( एकत्र करके) आठ उपशोभाएँ बनेंगी । देवी आदि का सूचक भद्रमण्डल’ बीच में विस्तृत और प्रान्तभाग में लघु होता है । बीच में नौ पदों का कमल बनता है तथा चारों कोणों में चार भद्रमण्डल बनते हैं । शेष त्रयोदश पदों का बुद्धयाधार-मण्डल है । इसमें एक सौ साठ पद होते हैं। ‘बुद्धयाधार-मण्डल” भगवान् शिव आदि की आराधना के लिये प्रशस्त है ।। ३८-४८ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में मण्डलविधान का वर्णन नामक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥

संस्कृत मूल पाठ

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सामग्री स्रोत - अग्निपुराण, गीताप्रेस, गोरखपुर